33 सालों से सारे ऐशो आराम छोड़कर झोपड़ी में रहते हैं आईआईटी के प्रोफेसर, जानिये क्यों जी रहे हैं ऐसी लाइफ

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Delhi, आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग। फिर अमेरिका के फेमस ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी से PHD की पढ़ाई। यही नहीं, RBI के गवर्नर रहे रघुराम राजन तक को पढ़ाया। यहां बात हो रही हैआईआईटी के प्रोफेसर रहे आलोक सागर की, जो बीते 33 सालों से मध्य प्रदेश के दूरदराज गांवों में आदिवासी जीवन जी रहे हैं। लेकिन जिंदगी के सारे ऐशो आराम छोड़कर वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, आइए जानते हैं इसके बारे में।

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आदिवासियों के बीच रह रहे आलोक सागर

क्या आप सोच सकते हैं कि आईआईटी दिल्ली जैसे बड़े संस्थान में प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर कोई शख्स आदिवासियों की तरह उनके ही बीच झोपड़े में रह सकता है। तमाम विदेशी और भारतीय भाषाओं के साथ आदिवासियों की बोली-बानी जानने-समझने और बोलने वाला यह शख्स उस समय सुर्खियों में आया, जब बैतूल जिले के शाहपुर में उसे जेल में डालने की धमकी दी गई। प्रोफेसर आलोक सागर नामक इस शख्स ने भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को पढ़ाया है और अपनी कई डिग्रियों को छिपाकर रखा है। आलोक सागर ने 1973 में आईआईटी दिल्ली से एमटेक किया था।

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आदिवासियों के बीच रह रहे आलोक सागर

वर्ष 1977 में ह्यूस्टनयूनिवर्सिटी टेक्सास से शोध की भी डिग्री ली थी। इसी विश्वविद्यालय से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डॉक्टरेट और समाजशास्त्र, डलहौजी विश्वविद्यालय कनाडा में फेलोशिप की। बहरहाल, वे  जंगल को हरा-भरा करने के अपने मिशन में लगे हुए हैं। प्रोफेसर सागर कहते हैं कि योग्यता छिपाने का मकसद इतना ही है कि वे दूसरों से अलग नहीं दिखना चाहते हैं। अपने जीवन का 67वां बसंत देख चुके आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर आलोक सागर ने अपनी पूरी जिंदगी आदिवासियों को उनका हक दिलाने में खपा दी। चेहरे पर लंबी सफेद दाढ़ी, सफेद हो चुके बाल, बदन पर खादी का कुर्ता और धोती। पहली नजर में देखने पर आलोक सागर किसी आम आदिवासी जैसे ही दिखते हैं। आलोक सागर के पास डिग्रियों का अंबार है।

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आदिवासियों के बीच रह रहे आलोक सागर

प्रतिभा ऐसी कि कभी अमेरिका ने भी उन्हें शोध के लिए बुलाया था। सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी ही नहीं, कई विदेशी भाषाओं का ज्ञान होने के बाद भी वे आदिवासियों से उनकी भाषा में ही बात करते दिख जाएंगे। आलोक का जन्म वर्ष 1950 में हुआ था। आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग के बाद अमेरिका और कनाडा के विश्वविद्यालयों में शोध और पोस्ट डॉक्टोरल शिक्षा-शोध के बाद वे स्वदेश लौटे और आईआईटी दिल्ली में ही प्रोफेसर बन गए। लेकिन उनका मन नहीं लगा। वे कुछ अलग करना चाहते थे, इसलिए नौकरी छोड़कर आदिवासियों के बीच मध्य प्रदेश चले गए।

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Padma-Award-Alok-Sagar-Betul

तबसे लगातार आलोक सागर आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। इसके अलावा गांव में फलदार पौधे लगाते हैं। अबतक हजारों फलदार पौधे लगाकर आदिवासियों में गरीबी से लड़ने की वे उम्मीद जगा रहे हैं। उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर चीकू, लीची, अंजीर, नींबू, चकोतरा, मौसंबी, किन्नू, संतरा, रीठा, मुनगा, आम, महुआ, आचार, जामुन, काजू, कटहल आदि के पेड़ लगाए हैं। टायर से बनी चप्पलें पहनने वाले प्रोफेसर सागर का हुलिया देखकर कोई नहीं कह सकता कि वे टेक्सास यूनिवर्सिटी से शोध कर चुके हैं और आईआईटी दिल्ली में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन तक के शिक्षक रह चुके हैं। उनके उलझे हुए बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी और कंधे पर लटका झोला देखकर वैसे भी कोई प्रभावित नहीं होता था। निर्धन लोगों की तरह एक झोपड़े में जैसे-तैसे गुजारा करने वाले प्रोफेसर सागर का हुलिया गरीब आदिवासियों की तरह ही है। वे इसीलिए आदिवासियों में रम गए हैं।

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आदिवासियों के बीच रह रहे आलोक सागर1

आदिवासियों को जिंदगी में परिवर्तन कराना सिखा रहे हैं, लेकिन वे अपनी पहचान छिपाकर रखते रहे हैं। जहांतक पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात है तो प्रोफेसर सागर के भाई और बहन भी उच्च शिक्षित हैं। उनके पिता सीमा व उत्पाद शुल्क विभाग में नौकरी करते थे। छोटा भाई अंबुज भी आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर है, जबकि एक बहन कनाडा में है तो दूसरी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में हैं। दरअसल, अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर आदिवासियों के बीच काम कर रहे प्रोफेसर आलोक सागर का भेद तब खुला, जब पुलिस ने उन्हें जेल में डाल देने की धमकी देकर थाने पर बुला लिया। समाजवादी जनपरिषद के अनुराग मोदी के मुताबिक, बैतूल जिले के शाहपुर ब्लॉक के कोचामऊ में  गुमनामी की जिंदगी जी रहे आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर आलोक सागर को पुलिस ने जेल में डालने की धमकी दी, क्योंकि पुलिस ने उन्हें उपचुनाव संपन्न होने तक गांव छोड़ देने को कहा था और वे नहीं माने।

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आदिवासियों के बीच रह रहे आलोक सागर1

पुलिस की धमकी के कारण प्रोफेसर सागर जेल जाने के लिए दो जोड़ी कपड़े लेकर शाहपुर थाने पहुंच गए। लेकिन जब थाने में उन्होंने अपने बारे में बताया तो वहां मौजूद सभी लोग हैरान रह गए। बाद में शाहपुर थाने के टीआई राजेंद्र धुर्वे ने सफाई दी कि चुनाव को लेकर ब्लॉक स्तरीय मीटिंग के दौरान कुछ लोगों ने एक बाहरी व्यक्ति के लंबे समय से गांव में होने की सूचना दी थी। हमने केवल जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से उन्हें बुलवाया था कि वे कौन हैं और क्यों यहां रह रहे हैं। उनसे परिचय प्राप्त करने के बाद उन्हें वापस भेज दिया गया।

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