बलात्कार केवल आज के युग का जघन्य अपराध नहीं है बल्कि वैदिक काल से इसे सबसे घृणित कार्य माना गया है। इसकी पुराणों में इसकी सजा भी इतनी कठोर सजा का उल्लेख मिलता है, जिसे सुनकर ही रूह कांप जाए। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा ने बताया कि सदाचरण मृत्यु के बाद उत्तम गति एवं दुराचरण दुर्गति प्रदान करता है। जानिए बलात्कार करने वाले और व्यभिचार करने वाले लोगों को गरुड़ पुराण के अनुसार क्या-क्या सजाएं दी जाती हैं l
गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य जैसे कर्म संसार में रहकर करता है उसका उसे पूर्ण फल प्राप्त होता है। वह यह समझता है कि उसे दुष्कर्म करते हुए किसी ने नहीं देखा तो यह उसकी भूल है। शरीर में मौजूद पांच तत्व एवं सूर्य, चंद्रमा के अलावा ब्रह्मा के पुत्र श्रवण एवं उनकी पत्नियां श्रावणी हर समय हर मनुष्य पर पर नजर रखती हैं।
बलात्कार या व्यभिचार को भी गरुड़ पुराण में नर्क में जाने का रास्ता बताया है। यमपुरी जाने के चार मार्ग हैं जो पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशा में स्थित है। इनमें से दक्षिण मार्ग सबसे ज्यादा पीड़ा देने वाला है। इसी मार्ग में वैतरणी नदी भी है। खून और पीब से लबालब भरी इस नदी में कई प्रकार के भयानक कीड़े एवं अन्य जल जीव होते हैं।
शास्त्रों में लिखा है कि-
कन्यायां कामुकश्चैव सतीनां दूषकश्चय:। विहितत्यागिनो मूढा वैतरिण्यां पंतति ते।।
इस श्लोक का अर्थ है कि बलात्कारी या व्यभिचारी को इसी नदी में से होकर यमपुरी मार्ग की और ले जाया है। व्यभिचार करने वाला स्त्री पुरुष कोई भी हो सभी को एक समान सजा मिलती है।
नर्क में ले जाकर यमराज इनकी सजा का निर्धारण करते हैं। इनको तामिस्त्र नामक नर्क में भेजा जाता है। जहां कई वर्षों तक लोहे के एक ऐसे तवे पर रखा जाता है। जो सौ योजन (चार सौ किमी) लंबा एवं इतना ही चौडा होता है। इस तवे के नीचे प्रचंड अग्रि प्रज्वलित होती है और ऊपर से सौ सूर्यों के समान तेज धूप आती है। इस तवे पर बलात्कारी को निर्वस्त्र कर छोड दिया जाता है।
जब बलात्कारी की सजा पूरी होती है उसके बाद उसे अन्य कई वर्ष तक तप्तसूर्मी नामक नर्क में ले जाकर लोहे से बनाई हुई एवं अग्रि में गर्म की हुई मूर्तियों से सौ वर्षो तक चिपका कर रखा जाता है। व्यभिचार यदि स्त्री ने किया है तो पुरुष प्रतिमा से और यदि पुरुष ने किया हैं तो स्त्री की प्रतिमा से चिपकाकर रखा जाता है।
बलात्कारी की आत्मा कई वर्षों की नरक यातना के बाद जब इनका पृथ्वी पर जन्म होता है तो इन्हें बैल या घोड़ा बनकर पृथ्वी पर रहना होता है। चौरासी लाख योनियों को भोगने के पश्चात फिर कही जाकर इनको मनुष्य शरीर मिलता किंतु वह भी स्त्री रूप में तथा सदा रोगी बना रहता है।

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