उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी: कांग्रेस का दांव क्या है?
क्या आप जानते हैं कि 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी का फोकस इतना ज़्यादा क्यों है? जबकि यूपी में कांग्रेस का वर्तमान हाल बेहद कमज़ोर है, फिर भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी यूपी को सबसे ज़्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। क्या इसके पीछे कोई ख़ास रणनीति है? इस लेख में हम इस रहस्य से पर्दा उठाएंगे और जानेंगे कि कांग्रेस के यूपी पर केन्द्रित होने के क्या मकसद हो सकते हैं।
1. अखिलेश यादव को घेरने की रणनीति?
कांग्रेस समझती है कि दिल्ली की सत्ता में पहुँचने के लिए यूपी में जीतना अनिवार्य है, और यूपी में जीत के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) को कमज़ोर करना बेहद ज़रूरी है। कांग्रेस का मानना है कि सपा आज भी कांग्रेस के पारम्परिक वोट बैंक पर ही राजनीति कर रही है, इसलिए अगर यूपी में कांग्रेस मज़बूत होती है, तो सपा का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाएगा। इसी वजह से उपचुनावों में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया, जिसका उसे नुकसान भी उठाना पड़ा।
कांग्रेस का दलित-मुस्लिम कार्ड?
यह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस मुसलमान और दलित वोटरों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है। आजम खान के सपा से दूर होने के संकेत इस ओर इशारा करते हैं। लोकसभा चुनावों से पहले भी कई कद्दावर मुस्लिम नेता सपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे। यह सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है।
2. संभल और हाथरस: संदेश क्या है?
कांग्रेस नेताओं द्वारा संभल और हाथरस में पीड़ितों से मिलने को भी एक रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है। राहुल गांधी का यह दौरा बताता है कि कांग्रेस मुसलमानों और दलितों की समस्याओं को गंभीरता से ले रही है, और अखिलेश यादव की सरकार इन मुद्दों पर नाकाम रही है। इस दौरे का असर सिर्फ़ यूपी तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी इसका असर देखने को मिलेगा।
कांग्रेस की हमदर्दी का प्रदर्शन
कांग्रेस की कोशिश है कि यह दिखाया जाए कि वह मुसलमानों और दलितों की सबसे बड़ी हमदर्द है। हाथरस कांड का मुद्दा उठाकर और संभल में पीड़ितों से मिलकर, कांग्रेस सीधे तौर पर सपा पर हमलावर है।
3. सपा की रणनीति और जवाबी कार्रवाई
सपा भी कांग्रेस की रणनीति को समझती है, और इसीलिए अखिलेश यादव ने उपचुनावों में कांग्रेस से दूरी बनाई रखी है। अडानी और सोरोस जैसे मुद्दों पर सपा ने कांग्रेस से दूरी बनाते हुए अपनी अलग पहचान बनाए रखने की कोशिश की है। इसके अलावा संसद में अवधेश प्रसाद की सीट को लेकर भी अखिलेश ने कांग्रेस नेताओं पर नाराज़गी ज़ाहिर की थी। यह सब कांग्रेस के राजनीतिक दाव-पेचों का ही एक जवाबी कार्रवाई है।
कांग्रेस बनाम सपा: राजनीतिक जुगतें
यह स्पष्ट है कि कांग्रेस और सपा के बीच राजनीतिक खेल चल रहा है, जहाँ दोनों पार्टियाँ एक दूसरे को घेरने की कोशिश कर रही हैं। इस राजनीतिक लड़ाई में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन अपनी रणनीति से सफलता हासिल करता है।
4. जमीनी स्तर पर मज़बूती: कांग्रेस की तैयारी
कांग्रेस यूपी में अपना संगठन मज़बूत करने में जुट गई है, और इसीलिए राज्य और जिला समितियों को भंग कर दिया गया है। यह क़दम 2027 के चुनावों में पार्टी को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत बनाने की दिशा में उठाया गया है। लोकसभा चुनावों में मिली 6 सीटों ने कांग्रेस को थोड़ी हौसला दिया है।
कांग्रेस का पुनरुत्थान?
कांग्रेस का यह संगठनात्मक बदलाव यह संकेत दे रहा है कि वह यूपी में पुनरुत्थान की ओर अग्रसर है। क्या वह इस कोशिश में कामयाब होगी यह तो वक़्त ही बताएगा।
Take Away Points
- कांग्रेस की यूपी में सक्रियता कई राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करती है, जिसमें अखिलेश यादव को घेरना, दलित-मुस्लिम वोट बैंक पर ध्यान देना, और पार्टी का संगठन मज़बूत करना शामिल हैं।
- सपा, कांग्रेस के दावों को समझते हुए, अपनी रणनीति से जवाबी कार्रवाई कर रही है।
- 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव कांग्रेस और सपा दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

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