मुस्लिम ब्राह्मणों की अनोखी कहानी: जौनपुर का रहस्य

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में स्थित डेहरी गांव के निवासियों ने एक अनोखी परम्परा का पालन किया है जो सदियों पुरानी उनकी पहचान को दर्शाता है। यह कहानी है नौशाद अहमद दुबे, अशरफ दुबे, और शिराज शुक्ला जैसे लोगों की, जो मुस्लिम होते हुए भी अपने नामों के साथ ब्राह्मण उपाधियाँ जोड़ते हैं। यह परम्परा उनके पूर्वजों द्वारा धर्म परिवर्तन करने के बावजूद जीवित रही है।

मुस्लिम ब्राह्मणों की अनोखी कहानी: जौनपुर के डेहरी गाँव का रहस्य

यह परिवार कई पीढ़ियों से जौनपुर में रहते आ रहे हैं, और उन्होंने अपने पूर्वजों की विरासत को संजो कर रखा है। इनके पूर्वजों ने कई सदियों पहले हिंदू धर्म से इस्लाम धर्म अपनाया था। लेकिन, अपने मूल को भुलाए बिना, आज भी वह अपने उपनामों के साथ अपनी ब्राह्मण विरासत को प्रदर्शित करते हैं।

परिवार की कहानी:

नौशाद अहमद दुबे ने बताया कि सात पीढ़ियाँ पहले उनके पूर्वज लाल बहादुर दुबे थे, जिन्होंने लाल मोहम्मद शेख और लालम शेख नाम अपनाया था। उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन फिर भी ब्राह्मणों की अपने संस्कृति और मूल से जुड़ाव कायम रहा। नौशाद बताते हैं कि उनके परिवार ने अपनी जड़ों को खोजने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया और आज वह अपनी विरासत पर गर्व करते हैं।

विरासत की पहचान:

उनके इस कदम ने समाज में चर्चा का विषय बनने के साथ साथ लोगों के विचारों को नया आयाम दिया। कई लोग उनके इस फैसले को नहीं समझ पाते हैं लेकिन यह परम्परा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी जिंदा है।

गौ सेवा और धार्मिक समरसता

नौशाद दुबे और उनके परिवार का मानना है कि धर्म का पालन मानवता के साथ होना चाहिए। वे गौ सेवा करते हैं और कहते हैं कि यह भारतीयता का हिस्सा है। उनकी गायें उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। दूध पीना, घी का सेवन करना उनके लिए पवित्र और स्वास्थ्यवर्धक है।

ईश्वर में आस्था और तिलक:

नौशाद दुबे तिलक भी लगाते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें इस्लाम को मानने में और तिलक लगाने में कोई विरोधाभास नज़र नहीं आता। उनके लिए, ईश्वर एक ही है, चाहे उसे किसी भी नाम से जाना जाए। उनके विचार सांप्रदायिक सद्भावना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने के प्रतीक हैं।

आधुनिक दौर में परंपरा की चुनौतियाँ

नौशाद और उनके परिवार को अपने फैसले के चलते कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसमें विरोध और समाज का तिरस्कार शामिल है। हालांकि, उन्होंने अपनी मान्यताओं को मजबूत बनाए रखा और समाज में अशिक्षा के साथ धार्मिक मतभेदों को मिटाने की अपनी भूमिका निभाई।

शिक्षा और समाज सेवा:

अपनी बेटियों को शिक्षा दिलवाने में भी नौशाद ने इस्लाम और परम्पराओं से नहीं भटकने का काम किया। उनहोंने कुरान और मोहम्मद साहब की शिक्षाओं का पालन करते हुए समाज के हित के काम किए। उनका मानना है कि शिक्षा धार्मिक पहचान से ज्यादा महत्त्व रखती है और उन्हें अपनी बेटियों की शिक्षा में बेहद गर्व महसूस होता है।

नाम में दुबे जोड़ने पर प्रतिक्रिया:

नौशाद कहते हैं, लोग उनसे नाम के आगे दुबे जोड़ने का कारण पूछते हैं। लेकिन वो खुद सवाल करते हैं की अरबी, तुर्की या मंगोल उपाधियाँ क्यों अपनाई जाती हैं। उनके पास अपनी जड़ों से जुड़ी हुई अपनी उपाधि है। वो इस विरासत पर गर्व करते हैं।

समाज का संदेश: समरसता और सद्भाव

यह परिवार अपने तरीके से, धार्मिक और सामाजिक सद्भाव के संदेश को आगे बढ़ाते हुए अपनी विरासत और पहचान को मजबूत बनाए रखा है। यह एक उदाहरण है कैसे समाज में अलग-अलग संस्कृति और परंपराएं एक साथ रह सकती हैं। यह विचारधारा ही उनके लिए इस्लाम की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है।

निष्कर्ष:

यह परिवार अपनी अनोखी कहानी के साथ सदियों पुरानी पहचान को न केवल संजोए हुए हैं, अपितु एक साथ धर्म, संस्कृति और सामाजिक समरसता का एक अनोखा संदेश देते हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक पहचान हमेशा विपरीत नहीं होते, बल्कि एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं।

Take Away Points:

  • जौनपुर के मुस्लिम परिवारों ने पीढ़ियों से अपने पूर्वजों के ब्राह्मण उपनामों को सहेजा है।
  • वे गौ सेवा, तिलक, और अन्य रस्मों को करते हुए सांप्रदायिक सद्भाव का परिचय देते हैं।
  • शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए अपनी मान्यताओं पर कायम हैं।
  • उनकी कहानी समाज में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ रहने के संदेश को दर्शाती है।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *