सीएम योगी के दावों को पलीता लगा रहे अफसर

मुरादाबाद। 
 योगी सरकार भले ही शिक्षा व्यवस्था की बेहतरी की बात कर रही हो। लेकिन ठंड में बिना स्वेटर
 के गरीब बच्चों के साथ बड़ा ही शर्मनाक मजाक किया जा रहा है। जी हां! दिसम्बर बीतने को है लेकिन अभी तक सरकारी प्राइमरी स्कूलों के बच्चों को स्वेटर इसलिए नहीं बंट पाये क्योंकि अभी उसका टेंडर ही नहीं पड़ा है। जब तक टेंडर और दूसरी प्रक्रिया होगी तब तक शायद इन मासूमों को इसकी जरुरत होगी भी या नहीं ये देखने वाली बता होगी। हैरानी तब है जब योगी सरकार ने आते ही सब कुछ बदलाव की बात की है। ऐसे में इन नौनिहालों को ठंड में ठिठुरते देखना इन्हें कैसे भा रहा है ये समझ से परे हैं।जबकि जिम्मेदार अधिकारी सारा जिम्मा शासन पर डाल मुतमुइन हुए जा रहे हैं।
ठंड में बिना स्वेटर कैसे पढ़ाई करें बच्चे?
दिसंबर के महीने में जब दिन का तापमान दस से बारह डिग्री और रात के पांच या सात है। तब जनपद के प्राइमरी स्कूलों में बच्चे बिना स्वेटर के नीचे बैठने को मजबूर हैं। योगी सरकार ने सभी को मुफ्त ड्रेस और किताबें देने का वादा किया था। जो अभी तक आधा ही परवान चढ़ पाया है।
ठंड में बिना स्वेटर जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर बच्चे
ठंड किस कदर है ये जताने की किसी को जरुरत नहीं है। लेकिन बावजूद इसके बिना स्वेटर या अपने स्तर से पहनकर इन बच्चों का जज्बा देखते ही बनता है। पाकबाड़ा के सरकारी प्राथमिक विद्यालय के प्रिंसिपल अनिल शर्मा कहते हैं कि विभाग द्वारा 25 दिसम्बर तक स्वेटर बांटने की बात हुई थी। लेकिन अभी तक उन्हें नहीं मिले हैं इसलिए अभी नहीं बंट पायें हैं।
सीएम योगी के दावों को पलीता लगा रहे अफसर
उधर इस मामले में जब बीएसए संजय कुमार सिंह से पूछा गया। तो उन्होंने कहा कि अभी शासन स्तर से स्वेटर के लिए टेंडर ही नहीं पड़ा है। जब वहां से टेंडर पड़ेगा और उसके बाद फाइनल होने पर स्वेटर मिल पायेंगे। इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा ये सामान्य आदमी भी समझ सकता है। लेकिन ठंड में बिना स्वेटर के इन हालातों को देखकर लगता यही है कि व्यवस्था बदलने के भले ही कितने दावे किये जाते रहे हों, लेकिन सूरत अभी नहीं बदल पाई है। सबसे ज्यादा हैरानी खुद सीएम योगी के दावों पर है। जिन्होंने ड्रेस वितरण को जल्द से जल्द निपटाने को कहा था। ना जाने इस कागजी वयस्था में कब तक टेंडर पास होंगे। लेकिन तब तक गरीबों के बच्चों की हड्डियां ठंड से लोहा लेने को मजबूर हैं। बस इस सब में अगर कुछ सबसे ज्यादा अच्छा लगा वो ये था कि अभावों और गरीबी के बाद भी बच्चे स्कूल आ रहे हैं।

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