योगी के सामने ये ठहरते ही नहीं, यह है योगी का कमाल

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नोएडा। दरअसल नोएडा के कथित  ‘अपशकुनी’  इतिहास की कहानी यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के साथ हुई घटना से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि साल 1988 में नोएडा से लौटने के तुरंत बाद ही वीर बहादुर सिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ गई थी. केंदीय नेतृत्व ने वीर बहादुर के नोएडा से लौटने के तुरंत बाद ही इस्तीफा मांग लिया था. इसके बाद 1989 में नारायण दत्त तिवारी और 1999 में कल्याण सिंह की भी नोएडा आने के बाद कुर्सी चली गयी . साल 1995 में मुलायम सिंह को भी नोएडा आने के कुछ दिन बाद ही अपनी सरकार गंवानी पड़ गई थी. नोएडा यात्रा से नेताओं की मुख्यमंत्री यात्रा पर विराम लगने से नोएडा पर ‘अपशकुनी’ होने का कलंक लगता चला गया।
लेकिन अब नोएडा  यूपी सीएम योगी के लिए वरदान साबित हो रहा है। योगी आदित्यनाथ तकरीबन आधा दर्जन बार नोएडा आ चुके हैं और अरबों की योजनाओं का उद्घाटन-शुभारंभ कर चुके हैं, लेकिन न तो उनकी कुर्सी पर फर्क पड़ा और न कुछ बुरा हुआ, यह है योगी का कमाल। सोच से आधुनिक योगी आदित्यनाथ ने नोएडा आने के अंधविश्वास को पीछे छोड़ते हुए मायावती और मुलायम सिंह से बहुत आगे निकल गए हैं। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जो नोएडा के अंधविश्वास को अब भी सीने से लगाए हुए हैं, योगी के सामने ठहरते ही नहीं। योगी जहां आधुनिक सोच की बात करते हैं, वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव नोएडा को लेकर लकीर के फकीर बने हुए हैं और गाहे-बगाहे नोएडा के अंधविश्वास की बातें करते हैं।
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यह भी बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि नोएडा को लेकर पीएम और सीएम का इतनी दफा दौरा हुआ हो। पीएम ने स्टार्टअप योजना, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे का भी नोएडा से ही शुभारंभ किया था, जबकि इससे पहले श्मनहूस नोएडा  में सीएम-पीएम आने से डरते रहे हैं।  लंबे समय तक नोएडा के बारे में माना जाता रहा है कि इस शहर में प्रदेश का तत्कालीन सीएम आ जाए तो उसकी कुर्सी चली जाती है। इसके ठीक उलट योगी ने इस अंधविश्वास पर चोट करते हुए नोएडा शहर के पांच दौरे कर सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। तकरीबन 6 महीने के दौरान योगी पांच बार नोएडा आए। वहीं, पीएम नरेंद्र मोदी ने भी चार साल में चार बार नोएडा आकर ऐसा काम कर दिया, जो प्रदेश के इतिहास पहले कभी नहीं हुआ।
 यहां पर बता दें कि पिछले 30 साल से अधिक समय से खासतौर से बसपा और सपा के शासन के दौरान इस तरह का अंधविश्वास फैलाया जाता रहा है कि यूपी के मुख्यमंत्री का नोएडा आना अशुभ है। ऐसे में कोई सीएम नोएडा आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और यह महज इत्तेफाक है कि जो तत्कालीन सीएम आया उसकी कुर्सी चली गई। जानें कौन-कौन हुआ इस मिथक का शिकार…..
विश्वनाथ प्रताप सिंह
 1982 में तत्कालीन यूपी के सीएम विश्वनाथ प्रताप सिंह नोएडा में वीवी गिरी श्रम संस्थान का उद्घाटन करने आए थे। उसके बाद वह मुख्यमंत्री पद से हट गए। हालांकि, यह अलग बात है कि वे बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने।
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वीर बहादुर सिंह
बात 1988 की है। इस साल यूपी के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह फिल्म सिटी स्थित एक स्टूडियो में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आए। वहां से उन्होंने कालिंदी कुंज पार्क का भी उद्घाटन किया था। कुछ माह बाद ही उन्हें झटका लगा। वह मुख्यमंत्री पद से हट गए।
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नारायण दत्त तिवारी
 वीर बहादुर सिंह के बाद नारायण दत्त तिवारी यूपी के मुख्यमंत्री बने। वह भी नोएडा के सेक्टर 12 स्थित नेहरू पार्क का उद्घाटन करने वर्ष 1989 में आए थे। उसके कुछ समय बाद उनकी भी मुख्यमंत्री पद सकी कुर्सी जाती रही।
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मुलायम सिंह यादव
 वर्ष 1994 में नोएडा के सेक्टर 40 स्थित खेतान पब्लिक स्कूल का उद्घाटन करने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव आए थे। हैरानी की बात है कि मुलायम सिंह यादव ने मंच से कहा भी था कि मैं इस मिथक को तोड़ कर जाऊंगा कि जो मुख्यमंत्री नोएडा आता है उसकी कुर्सी चली जाती है। उसका कथन उल्टा साबित हुआ और उसके कुछ माह बाद ही वह मुख्यमंत्री पद से हट गए। इसका असर भी रहा और इसके बाद 6 सालों तक कोई नोएडा आया ही नहीं।
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मायावती
मुलायम के बाद नोएडा का मिथक तोड़ने का साहस मायावती ने जरूर दिखाया। यह अलग बात है कि वह मुख्यमंत्री रहने के दौरान चार बार नोएडा गईं और हर बार उन्हें कुर्सी गंवानी पड़ी। इसी कड़ी में 2011 में भी मायावती नोएडा आईं थी, लेकिन 2012 के चुनाव में उनकी सत्ता छिन गई।
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अखिलेश यादव
मुलायम सिंह और मायावती की तुलना में अखिलेश यादव ने साहस जुटाना तो दूर उन्होंने बतौर सीएम नोएडा की योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन लखनऊ से किया। हद तो तब हो गई जब राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के नोएडा जाने पर उनकी अगवानी के लिए खुद न जाकर उन्होंने मंत्री भेजे।

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