दरिद्र नारायण के घर भोजन करना चाहते थे अटल बिहारी बाजपेयी, अधूरी रह गयी इच्छा

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उपेन्द्र कुशवाहा
पडरौना ,कुशीनगर :  पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी की हालत नाजुक है। वह पिछले दो महीने से एम्स में भर्ती थे। देशभर में अटल जी के स्वस्थ्य होने की दुआएं मांगी जा रही थी। वहीं बीजेपी युवा मोर्चा कुशीनगर के जिलाध्यक्ष हिमांशु शेखरन गोपाल व वयोवृद्ध नेता रामचंद्र पांडेय से बातचीत में अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में बताते हुए कहा कि अटल जी को हमेशा मेरे पिता जनसंघ के जिलाध्यक्ष बनारसी गोपाल से एक खास भोजन के लिए कहते रहे। वह खास भोजन था खड्डा क्षेत्र के एक दरिद्रनारायण के घर का भोजन। जिस भोजन को खाने की इच्छा अटल जी जताते रहे पर अफसोस की वह दिन अब शायद ही आएगा।
बात जनसंघ के शुरूआती दिनों की है। जब कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। जनसंघ को खड़ा करने के लिए तमाम मनीषी लगे हुए थे। 62 का चुनाव चल रहा था। मेरे पिता जनसंघ के जिलाध्यक्ष बनारसी गोपाल ( तत्कालीन देवरिया जिला) थे। चुनाव का समय था। दीनदयाल उपाध्याय क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे। दोपहर का समय हो रहा था, सुबह से सब बिना खाये पिये प्रचार में लगे थे। खड्डा क्षेत्र के एक गांव में खाने की व्यवस्था थी लेकिन कांग्रेस के डर से ऐन वक्त पर वह बहाना बना गये थे इसकी सूचना क्षेत्र में ही एक कार्यकर्ता ने जिलाध्यक्ष को दे दी। वापस पड़रौना घर ले जाना संभव नहीं था क्योंकि तबतक शाम हो जाती।
अभी वह लोग कुछ सोच ही रहे थे तभी दीनदयाल जी ने खाने की इच्छा जता दी। सब पशोपेश में पड़ गए। एक जनसभा और निपटाने का आग्रह कर पिता जी एक दो कार्यकर्ताओं को लेकर जल्दी से कुछ इंतजाम को निकले। कुछ दूर जाने पर एक झोपड़ी के बाहर एक व्यक्ति मिला। वह व्यक्ति जिलाध्यक्ष जी को पहचान गया। क्योंकि वह जिलाध्यक्ष के साथ प्रत्याशी भी रहे थे। उसने रोककर पानी पीने का आग्रह किया। गुड़ व पानी पीने के बाद उन्होंने अपनी समस्या बताई। उस व्यक्ति ने कहा कि करीब एक सेर भुजिया चावल है और छान ( झोपडी की छत) पर नेनुआ थोड़ा है। एक दो लोगों की व्यवस्था एक घंटे में कर सकता हूं।
अब इनलोगों की जान में जान आई। ये लोग खाना बनवाये तबतक दीनदयाल जी भी पहुंच गए। खाना बन चुका था। सबने खाने का आग्रह किया। वह खाना खाने झोपड़ी में दाखिल हुए तो छोटी कद काठी वाले पंडित दीनदयाल जी को भी झुक कर अंदर जाना पड़ा। अंदर जमीन पर उनको उस व्यक्ति ने बड़े सम्मान से बिठाया। बड़ी सी थाली में भात, नेनुआ की सब्जी और दाल परोस कर लाया। खाना देखते ही दीनदयाल जी जोर से हंसे और खाने लगे। बड़े इत्मीनान से खाया। लोटा में पानी पीया। इस आवभगत से वह बहुत प्रभावित हुए। जब वह दिल्ली गए तो यह बात अटल जी समेत सभी अन्य नेताओं को बताया कि अगर पूरे हिंदुस्तान में दरिद्र नारायण के घर किसी ने भोजन कराया है तो वह गोपाल जी ने कराया है। इसके बाद अटल जी से जब भी पिताजी की मुलाकात होती तो हालचाल के बाद यह शिकायत करना नहीं भूलते कि आपने मेरे साथ नाइंसाफी की। केवल दीनदयाल जी को दरिद्र नारायण के घर भोजन कराया, मुझे कब कराएंगे। अब शायद ही यह संभव हो। जनसंघ की वह पीढ़ी अब बची ही नहीं। वह संघर्षों का दिन था।

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