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कुशीनगर। जहरीली शराब यानी मौत के कारोबार से कुशीनगर जनपद और खासकर तमकुहीराज पुलिस सर्किल का पुराना नाता रहा है। जब कुशीनगर जिला बना तो इसकी पहचान गन्ना, गंडक और गुंडा के तौर पर ज्यादे प्रचलित रही। समय के रफ्तार के साथ तस्वीरे जरूर बदली, लेकिन …………?
कई दशक के पहले एक समय ऐसा था कि उसकी कल्पना शोले फ़िल्म का डायलॉग याद दिला देता है,जिसमें गब्बर अपने आतंक की दास्तां बताता है। ठीक उसी तरह जंगल पार्टी का गांव में फेंके जाने वाला धमकी भरा पत्र….?
समय ने करवट लिया,आज के एडीजी दावा शेरपा कुशीनगर में पुलिस कप्तान के रूप में आये। अपनी योजना,जवाज पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली ने जंगल पार्टी के दुर्दांत डकैतों को मौत से ऐसे परिचय कराया, की आज बुजुर्गों को छोड़ दे तो नयी पीढ़ी जंगल पार्टी की चर्चा होने पर पूछ बैठती है कि यह क्या कह रहे है।
जनपद को जंगल पार्टी नामक संक्रामक रोग से मुक्ति तो मिल गयी, लेकिन उसका जगह मादक द्रव्यों ने ले लिया। दोनों में अंतर मात्र इतना है कि जंगल पार्टी के सरगना धनाढ्य लोगों का अपना शिकार बनाते थे,लेकिन मादक द्रव्य गरीब व अशिक्षित लोगों को, और राजनैतिक लोग सरकार बदलने के साथ अपना विचार बदल देते है।
तमकुहीराज पुलिस सर्किल का दियरा क्षेत्र पड़ोसी देश नेपाल से मादक द्रव्य की तस्करी के लिए विख्यात रहा है। लेकिन बीते दो दशक से यहां जहरीली शराब यानी मौत का कारोबार बढ़ता गया, लेकिन इसमें सबसे अधिक इजाफा बिहार में शराब बंदी के बाद हुई है।
तमकुहीराज पुलिस सर्किल के थाने पटहेरवा,सेवरही और विशुनपुरा में जहरीली शराब का कारोबार अब भी फल फूल रहा है। यह दीगर बात है कि तरयासुजान थाना क्षेत्र में जहरीली शराब के मौत के खेल ने बदनाम कर दिया,और जहां कुछ नही हुआ, वे सरदार बनाने से नही चूक रहे।
पिछली शराब बरामदगी पर नजर दौड़ाये तो यह सारी बाते साफ हो जाएगी कि किस किस थाने में शराब के रूप में मौत का खेल निरन्तर चला आ रहा है। सूत्रों की माने तो जब देवरिया जनपद हुआ करता था, तब तरयासुजान थाने पर सबसे जवाज थानेदार की तैनाती होती थी,उसका कारण गुंडा (जंगल पार्टी) हुआ करता था।, लेकिन आज राजस्व ……..? समय के परिवर्तन के साथ राजनैतिक विचार यहां बदलते रहते है,वजह समझ सकते है। वैसे जहरीली शराब ने जो मौत का तांडव मचाया था, उसके बाद प्रशासन चाहे जिस भी तरह का कदम उठा रहा हो,लेकिन इसके भीतर भी खेल चल रहा है।
जानकर बताते है, की जब तक प्रशासन मौत के इस कारोबार के असली गुनाहगार तक नही पहुँचता,तब तक यह मौत का कारोबार कैसे बंद होगा। कारण पुलिस जिस हरेंद्र यादव को पकड़ जहरीली शराब के कारोबार पर विराम लगाने का दावा कर रही है,वैसे दर्जनों हरेंद्र यादव इस सर्किन के विभिन्न थाना क्षेत्रों में अब भी अपने कारोबार को अंजाम दे रहे है। जानकारों के अनुसार मौत के ये सौदागर मैनेज के खेल में माहिर है,सरकार किसी की हो,अधिकारी कोई कितना भी सख्त हो,वे अपने मैनेज के खेल में कामयावी का झंडा लहराकर ही रहते है।
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हर थानेदार को प्रिय क्यों होते है दागी
पिछले एक दशक में विभिन्न थानों का चार्ज मिलने के बाद, थाना प्रभारियों द्वारा पुलिस कप्तान से जिन पुलिस कर्मियों की मांग की जाती रही है, उनके इतिहास को देखे तो उनके सम्बन्ध गौवंश तस्करों, अपराधियों, शराब तस्करों के साथ हाइवे से जुड़े मिलेंगे। यानी मैनेज का खेल …….?
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सरकार और विपक्ष
नेता जब सरकार में होते है, तो हर खेल पर पर्दा डालने, तस्करों की मदद करने से गुरेज नही करते। और सरकार से हटते ही गला फाड़ इन्कलाब की आवाज बुलंद करने लगते है। मतलब…… मैनेज।
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मौतों का खेल……
जहरीली शराब से मौतों का खेल यह नया नही है, यहाँ कच्ची शराब के सेवन से मौते होती रहती है,लेकिन मौतों की संख्या एक, दो और वह भी विभिन्न गांवों में। तब दबी जुबान चर्चा होती है। मरने वाले गरीब और अशिक्षित होते है, लिहाजा प्रशासन तक बात पहुँचे, कारोबारी ही उन्हें प्रशासन का भय दिखा, बाजी पलट देते है।
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कप्तान साहब ……..
कप्तान साहब आप की चर्चा एक ईमानदार अधिकारी के रूप में हो रही है। लिहाजा आप को अपना तीसरा नेत्र भी खोलना होगा। आप अपने तीसरे नेत्र के सहारे पौनी नजर नहीं रखे तो, नहीं तो यहाँ मैनेज का खेल से जहरीली शराब का कारोबार अपने मौत का तांडव का खेल खेलते रहेगा। चर्चा है कि पूर्व के कप्तान रहे, अब के एडीजी दावा शेरपा ने जिस तरह जंगल पार्टी का सफाया किया था,आप उसी तरह मौत के इस कारोबार को……
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काश एडीजी साहब,जंगल पार्टी….?
काश एडीजी गोरखपुर दावा शेरपा साहब जंगल पार्टी के तरह अवैध शराब के कारोबार के चुनौती को स्वीकार कर अपने निर्देशन में अभियान चलाते तो यहाँ के बुजुर्गों के तरह जनपद के नौजवान भी उन्हें सैलूट करता।
जानकर बताते है,एडीजी साहब ने यहां पुलिस कप्तान के रूप में लम्बी पारी खेली है। उनका अनुभव मौत के इस खेल को जड़ से उखाड़ देगा।
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