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पडरौना,कुशीनगर: एक पेड़ के नीछे छांव में रुका हुआ था कि एक छोटा सा मासुम बच्चा दिखा मुझे! बुलाकर नाम पूछा तो बताया कि सुहेल नाम है,खीरा बेच रहा हूँ गली चौराहे पर घूम कर, मेरे बाप यानी अब्बू को मजदुरी नही मिल रहा हैं,वैसे तो लाक डाउन के पहले मेरे अब्बू लोगो के कपड़ा सील कर करके परिवार में भोजन चलाते थे,लेकिन लाक डाउन होने की वजह से पिछले 25 दिनों से पैसे पैसे के मोहताज हो गए,फिर सुहेल ने कहा कि मैं बच्चा हूँ,इस लाक डाउन में शायद पुलिस मुझे नही मारेगी और मारेगी तो भी क्या हुआ दो पैसे तो मिलेंगे,और अब्बू से बोल कर साइकिल पर एक टोकरी में खीरा बेचने निकला गया हु ! मैं चुप चाप उसकी बात सुनता रहा था,लेकिन कुछ बोलने को नही था मेरे पास,10 की नोट निकालकर उसे देने लगा तो वो लेने से इनकार कर दिया बोला कि 5 के एक खीरे हैं,तभी हम दो वहां साथी मौजूद उस से खीरा लिया और उसने पैसा लेकर दुसरे गांव के चौराहे की ओर चला गया,हालांकि काफी देर से बैठे हम दोनों साथी उसी के बारे में सोच रहे थे,कि इतनी छोटी सी उम्र में पूरे परिवार का बोझ उठा रहे मासुमियत पर गांव प्रधान,कोटेदार के अलावा जिला प्रशासन ध्यान क्यों नहीं दे रही है।
बेशक : यह बता दे कि कुशीनगर जिले के पडरौना विकास खंड के कटकुइयां गांव निवासी सुहेल मात्र ग्यारह वर्ष के उर्म के पिता यानी अब्बू कि हालत कोरोना महामारी के बचाव के बीच लागु किए गए लाक डाउन के वजह से मज़दूरी नहीं नही मिल पा रहा है,जबकि उस परिवार में जहां कमाने वाले जिम्मेदार को काम न मिलने पर जिंदगी जैसे तैसे जीने को मजबूर हैं,वही ग्यारह वर्षीय मासूम सुहेल खीरा बेचकर अपने परिवार की जिंदगी संभाल रखा हुआ हैं l
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