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उपेंद्र कुशवाहा
पडरौना,कुशीनगर : जिला अस्पताल रविंद्रनगर धुस पडरौना जहां से सड़क हादसे के लगभग प्रतिशत मामले रेफर किए जाते हैं,उनमें से बहुत से पहुंच ही नहीं पाते सर्वाधिक मौतें जिला अस्पताल पर एम्बुलेंस के इंतजार और गोरखपुर तंक की यात्रा के दौरान ही हो जाती है, और जो यहां बच गए उनको मेडिकल कालेज की बेरुखी मार देती है।
बताते चलें कि कई एकड़ में फैले इस हॉस्पिटल करोड़ों की जमीन और करोड़ो रूपये मासिक खर्च पर सिर्फ पैरासिटामोल की गोली बांटने के लिए बन कर रह गया हैं। यहां जब डॉक्टर के भगवान बनने की जरूरत होती है,तब वो रेफर नाम का मंत्र फूंक देते हैं। मजे की बात यह है कि ये पूर्ण डॉक्टर वहां भेजते हैं,जहां कोई प्रशिक्षु अभी डॉक्टर बनने की राह पर है।
हालांकि आंकड़े कहते हैं हर 4 किलोमीटर के दायरे में,प्रति 2000 की आबादी में से रोज कोई न कोई दुर्घटना का शिकार होता है। यानी प्रत्येक 4 मिनट में एक आदमी सड़क दुर्घटना के कारण मौत के मुँह में समा जाता है। इनमें से 6 प्रतिशत को बचाया जा सकता है,अगर उन्हें शुरुआती 1घंटे में जिसे गोल्डन ऑवर कहते हैं, अगर इलाज मिल जाये तो,लेकिन इससे ज्यादा टाइम लोगों के तमाशा देखने,वीडियो बनाने,एम्बुलेंस आने,फिर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाने और वहां से जिला अस्पताल रेफर होने फिर मेडिकल कालेज पहुंचने में ही खत्म हो जाता है। कुछ बहुत भाग्यशाली लोग ही इतनी देर तक सरवाइव कर पाते हैं।
एसे में यहां ट्रामा सेंटर की मांग कर रहे हैं,जबकि वर्तमान जिला अस्पताल के पास मौजूद सुविधाएं ही काफी है,ट्रामा केयर करने के लिए इनके पास सर्जन हैं,(न्यूरो विभाग और विशेषज्ञ की जरूरत है) सीटी स्कैन मशीन है (बस ऑपरेटर की जरूरत है), ऑपरेशन थियेटर है (सिर्फ आधुनिक उपकरणों की जरूरत है) एक्स रे मशीन है ( रात में संचालन की आवश्यकता है) दवाईयां हैं,पोस्ट सर्जरी मेडिसिन्स की आवश्यकता है भर्ती वार्ड है आईसीयू में तब्दील करने की जरूरत है।
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