जानें क्या है सामाजिक-आर्थिक सर्वे की साइकिल

देश- वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को आम बजट पेश करने जा रहीं हैं। आम आदमी से लेकर व्यापारी वर्ग तक के सभी लोगों के मन मे बजट से काफी उम्मीदें हैं। वही इस समय नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) काफी सुर्खियां बटोर रहा है। असल मे यह देशभर में कई नमूना आंकड़े जुटाता है।
इसे अलग-अलग राउंड में जुटाया जाता है. अलग-अलग सामाजिक मुद्दों और पृष्ठभूमि से जुटाए जाने वाले इन आंकड़ों के दो राउंड के बीच की अवधि करीब 6 महीने से 1 साल होती है। इससे अलग-अलग समय पर देश में आर्थिक हालात क्या हैं और उसका सामाजिक स्तर पर क्या असर पड़ रहा है। ये समझने में मदद मिलती है। इसी के बलबूते सरकार अलग-अलग तबकों के लिए नीतियां बनाती हैं।
देश में इस तरह का पहला सर्वे 1950-51 के दौरान किया गया. तब एनएसएसओ का नाम नेशनल सैंपल सर्वे ही था. एनएसएसओ जिन मुद्दों को लेकर सर्वे करता है, इनके राउंड को 10 साल की साइकिल में किया जाता है.

सामाजिक-आर्थिक सर्वे की साइकिल:-

एनएसएसओ अपने सामाजिक-आर्थिक सर्वे में एक साल भूमि और पशुधन होल्डिंग्स एवं कर्ज और निवेश की साइकिल होती है. इसी तरह सामाजिक उपभोग (शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल इत्यादि) के लिए 1 साल, हाउसहोल्ड कंज्यूमर एक्सपेंडिचर, रोजगार और बेरोजगारी के हालात के लिए 2 साल से 5 साल एवं गैर-कृषि उद्योग, मैन्युफैक्चरिंग, संगठित क्षेत्र में ट्रेड एवं सर्विसेस इत्यादि के लिए 4 साल की साइकिल होती है।
इसके अलावा एनएसएसओ केंद्र सरकार के मंत्रालयों, राज्य सरकारों और शोध संस्थानों की मांग पर भी एनएसएसओ विशेष सर्वे करता है. बाकी अन्य तरह के ओपन राउंड के लिए उसकी साइकिल 2 साल की होती है।

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