सरकार के खिलाफ लामबंद अशासकीय कॉलेज शिक्षक, कर्मचारी और छात्र

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देहरादून। उत्तराखंड के सहायता प्राप्त 18 अशासकीय महाविद्यालय के शिक्षक, शिक्षणेत्तर कर्मचारी व करीब एक लाख छात्र सरकार के खिलाफ लामबंद हो रहे है। इन अशासकीय कॉलजों पर उच्च शिक्षा अधिनियम 1973 के तहत अनुदान राशि प्राप्त होती है। जिससे टीचर्स व नान टीचिंग स्टॉफ की सैलरी दी जाती है। इन कॉलेज में आज भी छात्रों को एक माह में 15 रुपये फीस पर उच्च शिक्षा दी जा रही है। अब सरकार ने इस अधिनियम में संशोधन कर अनुदान के बदले प्रोत्साहन राशि देने का निर्णय लिया है। कॉलेज संचालित करने के लिए छात्रों से फीस बढ़ाने को मजबूर होना पड़ेगा। जिससे शिक्षक व छात्र आक्रोशित है। शिक्षकों व कर्मचारियों ने एक संयुक्त संघर्ष मोर्चे का गठन किया है। जो अपनी चिंताओं से शासन व सरकार को अवगत करवाएगा।

अम्ब्रेला एक्ट में सरकार की ओर से परिवर्तन किए जाने के संदर्भ में शिक्षक व शिक्षणेत्तर कर्मचारी संघर्षरत हैं। उसी क्रम में संयुक्त रूप से अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। अशासकीय शिक्षक संघ के सचिव डॉ. डीके त्यागी व शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के संघ की तरफ से प्रदेश महासचिव गजेंद्र कुमार सिंह ने संयुक्त संघर्ष समिति बनाने का निर्णय लिया है। समिति ने अपने अधिकारों के रक्षा के लिए सतत संघर्षशील रहने का निश्चय किया गया है। साथ ही उच्च शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. धन सिंह रावत की ओर से कहा गया है कि अशासकीय महाविद्यालयों का वेतन भुगतान जारी रहेगा, इसका बैठक में स्वागत किया, परंतु बिल को तुरंत राजभवन से वापस मंगा कर, इसे संशोधित कर भेजने की मांग भी की गई। जिसमें विलुप्त किये, खंडों को पुनः जोड़ा जाए। और संशोधन ना होने तक संघर्ष जारी रखने को निर्णय किया। समाज के विभिन्न वर्गों राजनीतिक दलों, अभिभावकों, छात्रों द्वारा मिले समर्थन का का भी आभार किया गया। शिक्षकों व शिक्षणेत्तर वर्ग के हितो को संरक्षित करने के लिए सतत संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया गया। बैठक में आगे की क्रमबद रणनीति पर भी विस्तृत रूप से चर्चा हुई।

एसएफआइ ने किया शिक्षकों का समर्थन

स्टूडेंट्स फेडरेशन आफ इंडिया (एसएफआइ) की राज्य कमेटी ने अशासकीय महाविधालयों का अनुदान समाप्त करने की कडे़ शब्दों में निंदा की है। संगठन ने सरकार के इस फैसले को शिक्षा विरोधी करार दिया। एसएफआइ के राज्य महामंत्री हिमांशु चौहान ने कहा कि सरकार के इस फैसले का अशासकीय महाविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। शिक्षकों व शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के सामने आर्थिक संकट पैदा हो जाएगा। इस फैसले के परिणाम स्वरूप शिक्षकों की नौकरियों पर प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा। सरकार को तत्काल इस जनविरोधी फैसले को वापस लेना होगा अन्यथा छात्रों को आंदोलन के सड़कों में उतरना पड़ेगा।

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