महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को लेकर जहां बीजेपी खेमे में उत्साह का माहौल है, वहीं कांग्रेस-एनसीपी खेमे में निराशा छाई हुई है। विरोधी दलों के ज्यादातर दिग्गज नेता या तो कमल के साथ हो लिए हैं, या शिवसेना के बंधन में बंध गए हैं। एनसीपी प्रमुख शरद पवार राज्य में घूम रहे हैं, लेकिन खेमों में बटी कांग्रेस अभी भी भ्रम की स्थित में है। इस बार का चुनाव कांग्रेस और एनसीपी के लिए राज्य में अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई है।
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मुख्यमंत्री फडणवीस के लिए अधिक सीटें जीतने की चुनौती
महाराष्ट्र की राजनीतिक में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बेहद मजबूत होकर उभरे हैं। पिछले पांच साल में उन्होंने अपनी पार्टी के दिग्गजों को जहां चित कर दिया, वहीं विरोधी दल कांग्रेस-राकांपा को भी धूल चटा दी। विधानसभा में विरोधी पक्ष नेता राधाकृष्ण विखे पाटील जैसे दिग्गज नेता को सरकार में शामिल कर लिया। शिवसेना के लिए भी एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है। आलम यह है कि मुख्यमंत्री जिसे भाजपा में शामिल नहीं कर सके, उसे शिवसेना में एडजस्ट करा दिया। मुख्यमंत्री ने औरंगाबाद से कांग्रेस के दिग्गज विधायक अब्दुल सत्तार के साथ बैठक की, लेकिन उन्हें शिवसेना में भर्ती करा दिया। अब मुख्यमंत्री के लिए चुनौती है कि वे भाजपा के लिए पिछले विधानसभा चुनाव से ज्यादा सीटें जीतकर लाएं। पिछले चुनाव में भाजपा ने 122 सीटों जीती थी।
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-राकांपा का गठबंधन टूट गया था। सभी दलों ने अपने-अपने दम पर चुनाव लड़ा था। भाजपा ने 260 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 122 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा ने को 27.81 प्रतिशत वोट हासिल मिला था। वहीं शिवसेना ने 282 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे 19.35 प्रतिशत वोट के साथ 63 सीटें जीती। कांग्रेस ने राज्य की एक सीट छोड़कर 287 सीटों पर चुनाव लड़ा और 42 सीटों पर जीती। कांग्र्रेस को 17.95 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं राकांपा ने 278 सीटों पर उम्मीदवार उतारा और 41 सीटों पर जीती। राकांपा को 17.24 प्रतिशत वोट मिले थे।
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