लोक आस्था का महापर्व Chhath Puja 2019 : जानिए नहाए खाए, सूर्य को अर्घ्य देने तक का शुभ मुहूर्त और महत्व

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नई दिल्ली। Chhath Puja Date 2019 India: दीपावली के छठवें दिन से शुरू होने वाले सूर्य उपासना के महापर्व छठ पूजा की चर्चा इस वक्‍त काफी तेज है। चूंकि यह त्‍योहार पूरे परिवार के साथ धूमधाम से मनाया जाता है, इसलिए जो लोग नौकरी या व्‍यवसाय के सिलसिले में घर से दूर रहते हैं । वे अब छठ पूजा में घर जाने की तैयारी कर रहे हैं।

छठ पर्व 2019 का इंतजार हर सुहागिन महिलाएं दिल थाम कर इंतजार कर रही हैं। ये पर्व दिवाली 2019 के ठीक बाद में आता है। ये पर्व उत्तर भारत में काफी धूमधाम के साथ मनाया जाता है. इस पर्व की रौनक ज्यादातर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पड़ोसी देश नेपाल में मनाया जाता है।

ये पर्व 4 दिनों तक चलता है और इस बार ये पर्व 31 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा है, जो 3 नंबर तक चलेगा। इस पर्व को कार्तिक शुक्ल पक्ष की पष्ठी को मनाया जाता है, जिसकी शुरूआत छठ पर्व 2019 नहाए खाए से होती है और जितने दिन तक ये चलता है उतने दिनों तकछठ पर्व 2019 पूजा होती है।

पर्व  की शुरूआत सुबह नहाए खाए से होगी। सभी महिलाएं सुबह नहाने के बाद इसका व्रत रखेंगी और पूजा की सामग्री के लिए अनाज को अच्छे से साफ करेंगी। फिर साफ किए हुए अनाज को धूप में सुखाएंगी। इन सभी विधी के दौरान साफ-सफाई का खासा ध्यान रखा जाता है ।

इसके बाद व्रती महिलाएं एक बार फिर नहाएंगी और पूरे दिन में बस एक बार ही अनाज का सेवन करेंगी. इन दिनों में केवल व्रती महिलाएं ही नहीं बल्कि पूरा परिवार उसके साथ सात्विक अहार लेता है।

साथ ही इन दिनों में व्रती महिलाए कच्चे चुल्हे पर बनी रोटी और लौकी की सब्जी चने की दाल मिला कर खाती हैं । पूजा खत्म करने के बाद सभी व्रती महिलाएं एक बार खा सकती हैं और अगले दिन खरना का प्रसाद ले सकती हैं.

खरना छठ पूजा के अगले दिन को कहा जाता है. इस दिन व्रती महिलाएं नहाए खाए के बाद सुखाए गए अनाज को चक्की में पिसवाती हैं। इसे पिसवाने के दौरान खास बात यह है कि इस अनाज को मुंह पर पट्टी बांधकर पीसा जाता है, जिससे की यह पीसे हुए अनाज की पवित्रता बनी रहे।इस दिन गुड की खीर बनाई जाती है। साथ ही कच्चे चूल्हे पर रोटियां बनाई जाती हैं. फिर इस भोजन को छठ माइ की पूजा के बाद प्रसाद के तौर पर व्रती महिला खाती और ज्यादा से ज्यादा बंटवाती हैं।

पूजा के तीसरे दिन यानी की 2 नवंबर को व्रती महिलाएं नहा धोकर डाला (बांस की डलिया) तैयार करती हैं. इस डाले में पांच तरह के फल, सब्जियां, गन्ना, चुकंदर, शकरकंद, मूली, गाजर, अदरक को पूजा के प्रसाद को तौर पर रखा जाता है ।

इन सभी चीजों को मिला कर ही डाला तैयार किया जाता है. साथ ही दिन भर महिलाएं उस डाले और भी कई प्रकार की चीजें डालती रहती हैं और शाम होते ही किसी नदी और तालाब किनारे पहुंच जाती हैं ।

जैसे ही सूर्य ढलता है महिलाएं डाले की सभी सामग्री को चढाती हैं और सूर्य की पहली पत्नी देवी अस्ताचल की आराधना करती हैं. सूर्य के ढलने के बाद सभी महिलाएं अपने घर आ जाती हैं और रात भर भजन कीर्तन करती हैं।अस्ताचल की पूजा का समय 17:35:42 बेज है। इस दौकान ढलते सूर्य को अर्ध्य देना काफी शुभ माना जाता है. इस दिन सभी महिलाएं बिना खाए पिए निर्जला व्रत रखती हैं।

छठ पर्व के आखिरी दिन यानी 3 नवंबर को व्रती महिलाएं निकलते सूर्य को अर्ध्य देती हैं. इस दिन सूर्य उदय का समय होगा 06:34:11 बजे. इस दिन सूर्य की दूसरी पत्नी की पूजा की जाती हैं जो काफी फलदायी बताई जाती है। व्रत की आखिरी दिन महिलाएं 3 से 4 बजे की बीच उठती हैं और पूजा की तैयारियां शुरू कर देती हैं।

इस दिन व्रती महिलाएं निकलते सूर्य को अर्ध्य देती हैं. फिर उसके आधे घंटे बाद पहले ही कमर तक की गहरे पानी में खड़ी हो जाती हैं और सूर्य की पहली किरण के निकलने का इंतजार करती हैं. फिर उगते सूर्य को अर्ध्य देते ही इस पर्व का समाप्न हो जाता है, जिसके बाद व्रती महिलाए प्रसाद खाकर अपना व्रत खोलती हैं, जिससे पारण या परना कहते हैं।

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