नवरात्र उपवास का विधान शरीर को शुद्ध कर और ऋतु परिवर्तन के कारण होने वाले रोगों से मुक्ति पाने के लिए ही है। रामचरितमानस में स्पष्ट लिखा है ‘‘छिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पंचरचित यह अघम शरीरा ’’ अर्थात मानव शरीर धरती, जल, अग्नि, आकाश और वायु से बना है।
इनमें से चार तत्व हम भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं जबकि आकाश तत्व मात्र उपवास द्वारा ही शरीर ग्रहण करते है। जबकि आकाश तत्व उपवास द्वारा ही शरीर ग्रहण करता है।
नवरात्र ऋतु परिवर्तन के संधि काल पर पड़ता है। चैत्र माह में ऋतु शिशिर से ग्रीष्म की ओर आती है और आश्विन माह में ऋतु ग्रीष्म से शिशिर की ओर बढ़ती है। इस ऋतु परिवर्तन के कारण शरीर को रोग घेर लेते है।
यदि उपवास द्वारा शरीर का शोधन कर लिया जाए तो रोगों का आक्रमण अगले नवरात्र तक नहीं होगा। नवरात्र उपवासों का यही मूल उद्देश्य है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे धार्मिक रूप देकर हमारे संस्कारों में शामिल किया है।
नवरात्र में नौ दिनों का उपवास विधि विधान के अनुसार ही रखना चाहिए अन्यथा लाभ के बजाय हानि की संभावना रहती है।
पहले तीन दिन: – प्र्रातः 9 बजे फलों का रस अथवा पानी में नींबू शहद मिलाकर। दोपहर 12 बजे मौसमी फल।
रात्रि 8 बजे कच्ची व पकी हुई सब्जी खानी चाहिए।
अगले तीन दिन: – प्रातः कुछ भी नहीं खाना चाहिए। दोपहर 12 बजे फलों का जूस लेना चाहिए। सायंकाल की पूजा के पश्चात रात्रि में कच्ची खाई जाने वाली सब्जियों का रस पीना चाहिए।
अंतिम तीन दिन:- प्रातः काल फलों का रस अथवा नींबू पानी शहद के साथ पीना चाहिए। दोपहर 12 बजे मौसम के फल खाना चाहिए। रात्रि का कच्ची व पकी हुई सब्जियां ।
इन नौ दिनों में दूध या दूध से बने पदार्थ कदापि नहीं लेने चाहिए।
उपहास के अन्तिम दिन पर भोजन वितरण के बाद प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करना चाहिए। इन नौ दिनों के उपवास से शरीर की शुद्धि होगी, सुप्त जीवनी शक्ति का जागरण होगा।
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