कल्याणकारी एवं शांति प्रदान करने वाला स्वरूप है माता चन्द्रघण्टा

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नवरात्र की तृतीया तिथि को देवी के चन्द्रघंटा स्वरूप की पूजा होगी। नव दुर्गाओं में तृतीय माता है-माता चन्द्रघण्टा। माता चन्द्रघण्टा का यह स्वरूप कल्याणकारी एवं शांति प्रदान करने वाला है। इनके मस्तिष्क पर घंटे के आकार का अद्धचन्द्र शोभायमान रहता है इसीलिए इन्हें चन्द्रघण्टा कहा जाता है।

चन्द्र में सूर्य से मांगा हुआ प्रकाश है। उसमें मूल प्रकाश नहीं है। उसमें जलती हुई अग्नि नहीं है। परन्तु गुप्त अग्नि है। ‘घण्टा’ अर्थात् अग्नि है, पर दिखती नहीं है। उसमें पृथक्करण की शक्ति है। इसलिए ‘चन्द्रघण्टा’ प्रकृति का ‘क्रियात्मक’ है। जो अग्नि तत्वात्मक है।

चन्द्र घण्टायां यस्यां सा आहलादकारी। चन्द्रमा जिनके घण्टे की घोर ध्वनि से दसों दिशाये कम्पायमान हो उठीं थी। असुर हृदय विदीर्ण हो रहे थे माता अपनी घण्टाध्वनि के द्वारा असुरों की शक्ति क्षीण कर रही थीं। देवी के इस स्वरूप के स्तवन मात्र से ही – भयाद मुच्यते नरः।

अर्थात् मनुष्य भय से मुक्त होकर शक्ति प्राप्त करता है। इस स्वरूप का पूजन समस्त संकटों से मुक्त करता है। मान्यता है कि जब असुरों के बढ़ते प्रभाव से देवता त्रस्त हो गये। तब देवी चन्द्रघण्टा रूप में अवतरित हुई। देवी के इस स्वरूप की आराधना इस मंत्र से की जा सकती है।

ऐं कारी सृष्टि रूपाय हलींकारी प्रतिपालिका।
क्लांकारी काम रूपण्ये बीच रूपे नमोस्तुते।।

घण्टा माता ब्रह्मचारिणी का रूप स्वर्ण के सदृश्य चमकीला एवं इनके दस हाथ हैं। खड्ग, शस्त्र तथा बाण इत्यादि अस्त्र इनके दसाों हाथों में शोभायमान हैं। सिंह इनकी सवारी है। इनकी चण्डध्वनि घंटे के सदृृश्य भयानक है जिससे दानव, दैत्य तािा राक्षस सदैव भयभीत रहते हैं।

सदैव युद्ध के लिये उद्यत रहने वाली इनकी मुद्रा है। नवरात्रि के तीसरे दिन पूजा का अत्यधिक महत्व है। इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है। अलौकिक सुगंधियों की अनुभूति होती है। नाना प्रकार की दिव्य ध्वनियां सुनायी पड़ती है। इस समय साधक को सावधान रहने की आवश्यकता होती है। सदैव युद्ध के लिये उद्यत रहने वाली इनकी मुद्रा है।

मां चन्द्राघण्टा की पूजा अर्चना के फलस्वरूप साधक पर मां चन्द्रघण्टा की कृपा होती है। जिससे साधक के समस्त पाप व बाधाएं नष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सदा फलदायी है।

सिंह वाहन होने के कारण इनका भक्त सिंह की ही भांति वीर , पराक्रमी तथा भयहीन होता है। माता चन्द्रघण्टा अपने घण्टे की ध्वनि से अपने भक्तों को प्रेत बाधादि से दूर रखती हैं। विपत्ति के समय जैसे ही साधक मां का स्मरण करता है। तुरन्त इस घण्टे की ध्वनि निनादित होने लगती है।

आततायीयों एवं पापियों के विनाश के लिये मां का यह स्वरूप सदैव तत्पर रहता है। इसके बाद भी मां का यह स्वरूप साधक के लिये सौम्यता एवं शांति की पूर्ति ही होता हैं मां चन्द्रघण्टा की भक्ति से आराधक में वीरता निर्भयता और सौम्यता एवं विनम्रता जैसे सद्गुणों का विकास होता है। भक्त की सम्पूर्ण काया में क्रंाति का उदभव व विकास होता है। भक्त के स्वर में दिव्यता , अलौकिकता, माधुर्य इत्यादि गुणों का उद्भव होता है।

इनके उपासकों को देखकर अन्य लोग शांति एवं सुख की सुखद अनुुभूति करते हैं। इन भक्तगणों के शरीर से दिव्य प्रकाशमय तेज का उद्भव होता रहता है। परन्तु यह सब कुछ साधारण मनुष्य नहीं देख पाते हैं। क्योंकि यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से नहीं देखी जा सकती है। लेकिन ऐसे भक्तगणों के सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों को इसकी अनुभूति हो जाती है। हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके मां चन्द्रघण्टा के शरणागत होकर उनकी उपासना आराधना मंे तत्पर हों।

उनकी उपासना से हम समस्त सांसरिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद केे अधिकारी बन सकते हैं। हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान मंे रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिये परमकल्याणकारी और सद्गति को देने वाला है।

पिण्ढाजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महृां चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

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