बिहार: बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। अब तक जिसकी नीतियो से नीतीश को समस्या थी अब वह के घर का हिस्सा बन गए हैं। भाजपा गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने राजद से हाथ मिला लिया है और अब विरोध मित्र बनकर गुजरात मे नई सरकार का गठन कर चुके हैं। नई सरकार बनते ही नीतीश कुमार ने 8 वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण और तेजस्वी यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की।
लेकिन अब सवाल यह उठता है कि जो नीतीश कुमार भाजपा की तरीफ करते नही थकते थे। जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हर नीति की सराहना करने थे उन्हें अचानक से भाजपा कांटो की तरह क्यों चुभने लगी और उन्होंने भाजपा को छोड़कर क्यों राजद का दामन थाम कर बिहार की सरकार बदल दी।
यदि हम विशेषग्यों की माने तो नीतीश कुमार के लिये सत्ता सर्वोपरि है। वह हमेशा से सत्ता में उच्च पद प्राप्ति की अभिलाषा रखते थे। जब वह लालू प्रसाद के सलाहकार थे तब उन्हें मुख्यमंत्री बनने की ललक लगी थी, उन्होंने साल 2005 में लालू की लालटेन की लौ बुझा दी और बिहार के मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने उस समय भाजपा के साथ मिलकर अपनी सरकार बनाई थी और मुख्यमंत्री के पद पर बैठे थे। वही अब जब नीतीश कुमार ने साल 2022 में भाजपा गठबंधन को से दूसरी बार अलग होकर राजद से हाथ मिलाया है तो यह स्पष्ट है कि इसके पीछे उनके बड़े राजनीति इरादे है।
क्योंकि जब पहली बार नीतीश भाजपा के समर्थन में उतरे थे तो वह लालू प्रसाद को छोड़कर आये थे। लालू प्रसाद और नीतीश कुमार स्कूल के समय से मित्र थे। लेकिन सत्ता के मोह में उन्होंने दोस्ती को एक बार भी नही देखा और बिहार में गठबंधन की सरकार बना ली व मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वही अब नीतीश कुमार को अभिलाषा है प्रधानमंत्री बनने की। उन्होंने इस बात पर कभी अपना मुख नही खोला है कि वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं लेकिन उनके करीबियों ने इस बात पर मुहर लगाई है कि उनके मन मे प्रधानमंत्री बनने की चाहत है।
वही भाजपा में रहकर नीतीश कुमार कभी भी इस पद के उम्मीदवार नही बन सकते थे। क्योंकि भाजपा प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के अलावा किसी को नही देख सकती। मोदी भाजपा के लिये तुरुप का इक्का है भाजपा उनके अलावा किसी पर भी दांव लगाना उचित नही समझती क्योंकि भाजपा जानती है कि मोदी को जनता पसंद कर रही है और वह अपनी लुभावनी नीतियो से जनता को आकर्षित कर सकते हैं।
भाजपा की इस नीति से नीतीश कुमार भली भांति परिचित थे। लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनने की लालसा तो मन मे थी। इसलिए उन्होंने विकल्प के तौर पर भाजपा से अलग होना और विपक्ष के साथ मिलकर नई सरकार बनना उचित समझा। अब कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि नीतीश कुमार विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री का चेहरा हो सकते हैं। हालाकि यह बात अभी तक औपचारिक रूप से नही कही गई है।
जानकारी के लिये बता दें अभी हाल ही में नीतीश कुमार के करीबी रहे आरपीसी सिंह ने बयान दिया था कि नीतीश कुमार कभी भी मुख्यमंत्री नही बन सकते। वही भाजपा गठबंधन टूटने के बाद जदयू अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा की नीतीश कुमार में प्रधानमंत्री बनने के सभी गुण है। इन दोनों नेताओं के बयान से पता चलता है नीतीश का अगला निशाना प्रधानमंत्री की कुर्सी है वह मोदी से सत्ता छीनने की फिराक में है।
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