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  • विडियो: अस्पताल के गेट पर ही कराया महिला का प्रसव

    विडियो: अस्पताल के गेट पर ही कराया महिला का प्रसव

     

     

    हरदोई। मानवीय संवेदना को तार तार करता हुआ एक वीडियो भारत खबर को हरदोई के जिला अस्पताल के बाहर से रिपोर्टिंग के दौरान आपके संवाद सूत्र के जरिए मिला। जहां सूबे में योगी सरकार जच्चा और बच्चा के लिए लगातार जननी सुरक्षा जैसी मातृत्व सेवा जैसी योजनाएं लगा रही हैं। लेकिन वास्तविक धरातल पर ये योजना सफेद हाथी साबित हो रही हैं।

    ताजा मामला जिला अस्पताल का सामने आया है । जहां एम्बुलेंस से लाई गई प्रसूता की जिला महिला अस्पताल गेट पर ही डिलीवरी करा दी गयी । अस्पताल के स्टाफ ने इतनी भी जहमत नही उठाई और लेबर में ले जाने का कष्ट उठाए। लेबर रूम ले जाने के बजाए गेट के बाहर ही डिलीवरी करा मानवीय़ संवेदना को तार-तार कर दिया। अब इसमें किसको जिम्मेदार माना जाए, हांलाकि इस मामले की जानकारी मिलने के बाद से जिला अस्पताल में हड़कंप मच गया है।

    सूबे में सीएम योगी ने सरकार सम्भालते हुए ही लगातार जिलों का दौरा किया। इस दौरे के दौरान उन्होने अस्पतालों का निरीक्षण किया। लेकिन हालते तस्वीर आपको इस वीडियो में साफ देखने को मिल जायेगी।

     

     





  • एडीशनल डीजी NCC मिले सीएम से, बताया साल में 32 कैंप चलाती है NCC

    एडीशनल डीजी NCC मिले सीएम से, बताया साल में 32 कैंप चलाती है NCC

     

     

    मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत से मंगलवार को सचिवालय में एडिशनल डायरेक्टर जनरल एनसीसी, मेजर जनरल सी मनी  ने मुलाकात की.

    मेजर जनरल सी मनी ने राज्य में एनसीसी द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलापों की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि राज्य के 370 विद्यालय एनसीसी से जुड़े हैं.

    उन्होंने बताया कि एनसीसी साल में 32 कैम्प चलाती है. वर्तमान में एनसीसी के 10 कैम्प चल रहे हैं. मेजर जनरल ने बताया कि एनसीसी कैडेट्स सामाजिक क्रियाकलापों में भी भाग लेते हैं.

    मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि राज्य सरकार रिस्पना के पुनर्जीवीकरण के लिए प्रयास कर रही है.इस अभियान के अंतर्गत रिस्पना के कैचमेंट एरिया में एक ही दिन में लाखों वृक्ष लगाए जाने हैं. हालांकि मुख्यमंत्री ने इस अभियान में सीधे-सीधे एनसीसी का सहयोग नहीं मांगा लेकिन कहा कि इसमें सभी के सहयोग की आवश्यकता है.

     

  • बहन की स्कॉलरशिप बनी हार्दिक की ज़िंदगी का ‘टर्निंग प्वाइंट’

    बहन की स्कॉलरशिप बनी हार्दिक की ज़िंदगी का ‘टर्निंग प्वाइंट’

     

     

    गुजरात विधानसभा चुनाव में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने कांग्रेस को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने का ऐलान किया है. जुलाई 2015 के पहले तक हार्दिक पटेल को कोई नहीं जानता था. लेकिन, इसके बाद आज वे पाटीदार नेता के तौर पर जाने जाते हैं. हार्दिक का पाटीदार नेता के तौर पर उभरना महज इत्तेफाक नहीं है. इसके पीछे उनके बहन के साथ हुई एक घटना बड़ी वजह रही.

    हार्दिक पटेल अपनी बहन मोनिका पटेल के काफी करीब हैं. घटना तब की है, जब उनकी बहन ने इंटरमीडिएट पास किया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 12वीं में मोनिका पटेल के 84 फीसदी मार्क्स आए थे. उन्होंने राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली स्कॉलरशिप के लिए अप्लाई किया था, लेकिन उन्हें ये स्कॉलरशिप नहीं मिली.

    हार्दिक की बहन के दोस्त को मिली स्कॉलरशिप
    वहीं, मोनिका की एक दोस्त, जिसके 81 फीसदी मार्क्स आए थे, उसे ये स्कॉलरशिप मिल गई. बताया जाता है कि मोनिका के दोस्त को सिर्फ इसलिए स्कॉलरशिप मिली, क्योंकि वह आरक्षित वर्ग से थी. जबकि, मोनिका ने जिले में टॉप किया था. अपनी बहन के साथ हुई ज्यादती को बर्दाश्त करना हार्दिक पटेल के लिए बहुत मुश्किल था. ये घटना हार्दिक के लिए टर्निंग प्वॉइंट साबित हुई.17 साल में हार्दिक ने ज्वॉइन की थी SPG
    साल 2010 में हार्दिक ने सरदार पटेल ग्रुप (SPG) ज्वॉइन किया. तब उनकी उम्र महज 17 साल थी. हार्दिक के दोस्त बताते हैं कि वह बचपन से ही काफी शांत और अपने में सीमित रहने वाले थे. उन्हें क्रिकेट देखने और खेलने का शौक था. हार्दिक के दोस्तों के मुताबिक, उनमें काफी लीडरशिप क्वालिटी थी.

    लीडरशिप क्वालिटी से बन गए एसपीजी प्रेसिडेंट
    सरदार पटेल ग्रुप में हार्दिक पटेल ने इसी लीडरशिप क्वालिटी का फायदा उठाया. अपने विचारों से उन्होंने करीब एसपीजी के सदस्यों को काफी कम वक्त में प्रभावित कर लिया. एक महीने के दौरान हार्दिक एसपीजी के विरामगम ब्रांच के प्रेसिडेंट बन गए.

    आर्थिक उतार-चढ़ावों को करीब से देखा
    एसपीजी में रहते हुए हार्दिक पटेल ने आर्थिक उतार-चढ़ावों को करीब से देखा और समझा. उन्होंने महसूस किया कि कैसे आर्थिक उतार-चढ़ाव और सरकार की नीतियां पाटीदार युवाओं पर असर डाल रही है. खेतीबाड़ी पर असर पड़ रहा है. व्यापार चौपट हो रहे हैं. ऑनलाइन आउटले की वजह से कैसे पुश्तैनी व्यापार ठप हो रहे हैं. फिर एसपीजी के सदस्यों के साथ उनके मतभेद होने लगे. ऐसे में हार्दिक को एसपीजी से बेदखल कर दिया गया. इसी दौरान हार्दिक की बहन के साथ स्कॉलरशिप वाली घटना हुई.

    2015 में बनाई PAAS
    इसी घटना के बाद हार्दिक ने जुलाई 2015 में पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (PAAS) बनाई. इसका मकसद पाटीदारों के लिए सरकार से ओबीसी कोटे की मांग थी. राज्‍य से ये चिंगारी कब केंद्र तक आ पहुंची पता ही नहीं चला. फिर तो दूसरे राज्‍यों में भी लोग इस तरह की मांग करने लगे.

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  • कबीर, सूरदास, प्रेमचंद को पढ़ेंगे चीनी

    कबीर, सूरदास, प्रेमचंद को पढ़ेंगे चीनी

     

     

    बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर/ पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।। पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय/ ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय…।। संत कबीर के ऐसे ही हृदय परिवर्तन करने वाले दोहों को अब चीन सरकार चीनी भाषा में छपवाकर अपने नागरिकों तक पहुंचाना चाहती है.

    दोनों देशों में सीमा विवाद को लेकर होने वाले तनाव के बीच किताबों के जरिए एक दूसरे को समझने की कोशिश होगी. कबीर ग्रंथावली चीनी भाषा में ट्रांसलेट होगी. यही नहीं चीन के लोग सूरदास का सूर सागर, मुंशी प्रेमचंद का रचना संचयन, भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक संचयन, वृंदावनलाल वर्मा की मृगनयनी, जयशंकर प्रसाद का रचना संचयन और महादेवी वर्मा का रचना संचयन पढ़ेंगे.

    भारत-पाक बंटवारे की कहानी जानेंगे चीनी

    यशपाल का झूठा सच और भीष्म साहनी की तमस से चीन के लोग भारत-पाक बंटवारे की त्रासदी के बारे में जानकारी लेंगे. श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी, कमलेश्वर की कितने पाकिस्तान एवं सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय की शेखर एक जीवनी भी अपनी भाषा में पढ़ेंगे.

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    चीनी साहित्‍य.

    इसके अलावा फणीश्वर नाथ रेणु, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, मन्नू भंडारी, काशीनाथ सिंह, पीसी बागची, आरके नारायण, गुलजार, राजा राव, सुनील गंगोपाध्याय, यूआर अनंतमूर्ति एवं तकाजी शिवशंकर पिल्लै की रचनाएं भी चीन की सरकार ट्रांसलेट करवा रही है.

    चीन की 25 किताबों का हिंदी में होगा अनुवाद
    हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे को मजबूत करने के लिए दोनों देशों की सरकारें अपने-अपने यहां के बड़े लेखकों के विचार एक दूसरे को पढ़वाना चाहती हैं. इसके तहत भारत सरकार चीन लेखकों की किताबों का हिंदी में अनुवाद करवाएगी. भारत में यह काम नेशनल बुक ट्रस्ट कर रहा है. नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बल्देव भाई शर्मा ने इस प्रोजेक्ट पर कहा “भारत-चीन का प्राचीन सांस्कृतिक संबंध है. भारतीय संस्कृति के प्रति चीन का हमेशा रुझान रहा है. इसीलिए चीनी यात्री फाह्यान, ह्वेनसांग यहां आए थे. अब इस नई पहल से दोनों देशों के लोग एक-दूसरे को और अच्छे तरीके से समझ पाएंगे.”

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    नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बल्देव भाई शर्मा

    चीन की वो किताबें, जिन्हें आपको पढ़वाना चाहती है सरकार
    दोनों देशों में ट्रासंलेट होने वाली किताबों का चयन स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिट्रेचर एंड कल्चरल स्टडीज, जेएनयू में चाइनीज भाषा के प्रोफेसर बीआर दीपक ने किया है. न्यूज18 डॉटकॉम ने प्रोफेसर दीपक से पूछा कि इन चीन की जिन किताबों को भारत सरकार यहां के नागरिकों को पढ़वाना चाहती है उनमें है क्या?

    जवाब में प्रोफेसर दीपक ने कहा “चीन की चीन की संस्कृति और मानसिकता को जानने के लिए वहां के लेखकों को पढ़ना बहुत जरूरी है.  इस प्रोजेक्ट में ऐसी ही किताबों का चयन किया गया है, जिनसे हम चीन को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे. उससे लाभ ले पाएंगे. आज के दिन चीन के बारे में जो जानकारी भारतीय लोगों को है वह पश्चिमी देशों से ली गई है.”

    प्रोफेसर दीपक के अनुसार “कन्फ्यूशियस के सूक्ति संग्रह और मेनशियस की बुक से चीन की प्राचीन सभ्यता और सोच जानेंगे. सभ्यता एक निरंतरता है वह टूटती नहीं. इसलिए इस पर लिखी गई किताबों से हम यह समझ पाएंगे कि चीन भविष्य में क्या करना चाहता है. कन्फ्यूशियस कहता है कि जो आपको पसंद नहीं है उसको दूसरे पर थोपना नहीं चाहिए. जबकि मेनशियस सद्भाव की बात करता है.”

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    जेएनयू में चीनी भाषा के प्रो. बीआर दीपक

    हिंदी में आएगी चीन के राजवंशों की कहानी
    भारत-चीन संबंधों पर काम करने वाले जेएनयू के प्रोफेसर ने कहा “रोमांस ऑफ द थ्री किंगडम में वहां के तीन राजवंशों की कहानी है. इसी तरह से मोमेंट इन बीजिंग भी पढ़ेंगे. पेइचिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ची शेलिंग की भारत के बारे में लिखी गई एक पुस्तक का भी अनुवाद होगा. इसके अलावा वांगशू की लुक्स ब्यूटीफुल, यू हुया की टू लाइव, ल्यू झेन्यून की वन सेंटेंस वर्थ टेंन थाउजैंड, माओ डुन की मिडनाइट एवं ड्रीम ऑफ द रेड चैंबर नामक किताबें इस सूची में हैं, जिनसे हम चीन के प्राचीन इतिहास से आधुनिक समाज तक को जानेंगे.”

  • ……..तो पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता खत्म ! जानिए कैसे !

    पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता के चलते सरकारों का बजट बिगड़ जाता है। प्रदूषण भी इन जैविक इंधनों के इस्तेमाल से बेतहाशा बढ़ता है। इसलिए विकल्प की तलाश काफी समय से जारी है।

    नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी डिवाइस तैयार की है जिसका आने वाले समय में व्यापक तौर पर इस्तेमाल होने की उम्मीद है। अगर ऐसा होगा तो पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता खत्म या न्यूनतम हो जाएगी। खासतौर पर कारों में इस डिवाइस का इस्तेमाल होने से प्रदूषण के स्तर को भी नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। दरअसल वैज्ञानिकों ने जो डिवाइस तैयार किया है वह बेहद कम लागत में और कहीं अधिक दक्षता से सौर ऊर्जा का इस्तेमाल ऊर्जा को तैयार करने में और उसे स्टोर करने में कर सकती है। इस ऊर्जा का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चलाने में किया जा सकता है और इसके साथ ही इससे इको फ्रेंडली यानी पर्यावरण के अनुकूल हाइड्रोजन ईंधन भी तैयार किया जा सकता है। यह डिवाइस हाइड्रोजन कारों को सामान्य लोगों की पहुंच में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है, क्योंकि इससे निकेल, आयरन और कोबाल्ट जैसे तत्वों का इस्तेमाल कर हाइड्रोजन तैयार की जा सकती है। ये तत्व न केवल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, बल्कि कम लागत वाले भी हैं।
    इनके विपरीत जब प्लेटिनम और दूसरी कीमती धातुओं से हाइड्रोजन बनाई जाती है तो वह कहीं अधिक महंगी पड़ती है और इस लिहाज से सामान्य लोगों के लिए ऊर्जा के रूप में हाइड्रोजन का इस्तेमाल मुश्किल हो जाता है। एक बड़ी समस्या यह है कि मौजूदा तरीके से हाइड्रोजन बनाने में बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो कि पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है।

    हाइड्रोजन एक शानदार ईंधन
    कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड केनर के मुताबिक वाहनों के लिए हाइड्रोजन एक शानदार ईंधन है। यह वह सबसे साफ ईंधन है। यह सस्ता भी है और इससे कोई प्रदूषण पैदा नहीं होता। हम अगर सस्ती हाइड्रोजन का निर्माण कर सकें तो इससे चलने वाली कारों की लागत में नाटकीय कमी लाई जा सकती है। इस डिवाइस से संबंधित शोध का प्रकाशन एनर्जी स्टोरेज मैटीरियल जर्नल में हुआ है।

    ग्रामीण क्षेत्रों में साबित होगी ज्यादा उपयोगी
    केनर कहते हैं कि हमारी तकनीक ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत अधिक उपयोगी साबित हो सकती है। इसी तरह दूरदराज के क्षेत्रों में तैनात सैन्य यूनिटें भी इससे लाभान्वित हो सकती हैं। लोगों को अपने वाहन चलाने के लिए ईंधन और उपकरणों के लिए बिजली की जरूरत होती है। अब आप एक ही डिवाइस से बिजली और ईंधन, दोनों बना सकते हैं।

    बिजली स्टोर करने की समस्या का होगा समाधान
    शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी डिवाइस से बड़े शहरों में बिजली स्टोर करने की समस्या का समाधान भी निकल सकता है। केनर के मुताबिक अगर आप बिजली को हाइड्रोजन में परिवर्तित कर सकें तो आप इसे अनंत काल के लिए स्टोर कर सकते हैं।

    यह है तकनीक

    परंपरागत हाइड्रोजन फ्यूल सेल और सुपर कैपिसेटरों में दो इलेक्ट्रोड होते हैं- एक पाजिटिव और दूसरा निगेटिव। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार की गई डिवाइस में एक तीसरा इलेक्ट्रोड भी है। यह एक सुपरकैपिसेटर (ऊर्जा के स्टोरेज के लिए) का भी काम करता है और एक ऐसे उपकरण का भी जो पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग-अलग कर सके। पानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग-अलग करने की प्रक्रिया को वाटर इलेक्ट्रोलिसिस कहा जाता है। सभी तीनों इलेक्ट्रोड एक सोलर सेल से जुड़े होते हैं, जो कि डिवाइस के लिए पावर सोर्स का काम करता है। सोलर सेल के जरिए एकत्र होने वाली विद्युत ऊर्जा को या तो सुपर कैपिसेटर में इलेक्ट्रोकेमिकल रूप में या फिर हाइड्रोजन के रूप में केमिकल तरीके से एकत्र किया जा सकता है।

  • ..इसलिए आपको अंडे खाने महंगे पड़ रहे हैं

    ..इसलिए आपको अंडे खाने महंगे पड़ रहे हैं

     

     

    सर्दी शुरू होते ही अंडे की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है, इस बार अंडे की कीमत करीब-करीब दोगुनी हो गई है. जानकारी के मुताबिक, मुर्गी पालन केंद्रों पर 100 अंडे की ट्रे करीब 585 रुपए में बेची जा रही है. ऐसे में रिटेल में एक अंडे की कीमत करीब 7 रुपए के आस-पास पहुंच गई है.

    हालांकि National Egg Co-Ordination Committee अंडों की मांग में 15 प्रतिशत के इजाफे का दावा कर रही है.

    चिकेन से महंगा हो गया अंडा

    एक अंडे का औसत वजन करीब 55 ग्राम होता है. इस लिहाज से देखें, तो एक किलो अंडे का मूल्य करीब 120 से 135 रुपए प्रति किलो के बीच पहुंच गया है. वहीं, बॉयलर का रेट करीब 62 रुपए किलो है यानी इस सर्दियों में अंडा चिकन से भी ज्यादा महंगा हो गया है. एक अंडे की कीमत 7.5 रुपये हो गई है. ट्रेडर्स और जानकारों की मानें तो कीमत 9-10 रुपये प्रति अंडे तक पहुंच सकती है.

    कीमतों के मामले में चिकन के लगभग बराबर चल रहा अंडा जल्‍द उससे आगे हो जाएगा. एक्‍सपर्ट और ट्रेडर्स के अनुसार अंडे की कीमत बढ़ने के मुख्‍य रूप से 5 कारण हैं

    नोटबंदी का असर
    अंडे की कीमतों में तेज इजाफे को नोटबंदी के असर के रूप में भी देखा जा रहा है. नेशनल एग कॉर्डिनेशन कमिटी के मैसूर जोन के चेयरमैन एम पी सतीश बाबू ने मीडिया से बताया कि नोटबंदी के कारण अंडों और मुर्गियों का प्रोडक्‍शन काफी कम हो गया था, क्‍योंकि डिमांड काफी कम हो गई थी. ऐसे में प्रोडक्‍शन की सुस्‍ती को वर्तमान डिमांड के अनुरूप लाने में समय लग रहा है.

    डिमांड बढ़ना
    ठंड धमकने के साथ ही अंडे की कीमत में हर साल उछाल आता है. इन दिनों ठंड के कारण मांसाहारी के साथ ही बड़ी संख्‍या में शाकाहारी लोग भी अंडे खाने लगते हैं. नेशनल एग कॉर्डिनेशन कमिटी के अनुसार डिमांड में 15 फीसदी का इजाफा हुआ है, जबकि मार्केट सूत्रों ने बताया कि डिमांड में 25 फीसदी से अधिक का इजाफा देखा जा रहा है.

    हैदर अली नामक एक व्‍यापारी ने बताया कि अंडे ही नहीं, ब्रॉयलर की डिमांड भी बढ़ गई है. उनके अनुसार, ठंड में 40 से 42 दिनों की जगह 37-38 दिनों में ही मुर्गी 2-2.5 किलो की हो जाती है. बीमारी की आशंका भी कम होती है, इसके बावजूद डिमांड बढ़ने से मुर्गी की कीमत भी बढ़ जाती है.

    सब्जियों की आसमानी कीमतें
    अंडों की डिमांड बढ़ने की एक बड़ी वजह सब्जियों की आसमान छूती कीमतें हैं. हरी सब्जियां 60 से 100 रुपये के बीच बिक रही हैं, जो सामान्‍य लोगों के लिहाज से काफी अधिक है. सब्जियों की कीमतें बढ़ने के कारण कहा जा रहा है कि खुदरा महंगाई दर और बढ़कर 4 फीसदी के ऊपर जा सकती है. ऐसे में फिलहाल सब्जियों के साथ ही अंडों की कीमतों में कमी की कम संभावना ही दिख रही है.

    कर्नाटक और तमिलनाडु में सूखा

    कर्नाटक और तमिलनाडु में सूखे की वजह से मक्‍के की फसल काफी बर्बाद हो गई, जो मुर्गियों का मुख्‍य आहार है. मक्‍के की कीमत प्रति क्विंटल 1900 रुपए के स्‍तर पर पहुंच गई. इससे पॉर्ल्‍टी बिजनेस और इससे जुड़े किसानों को बड़ा धक्‍का लगा. साफ तौर पर इसका असर भी उत्‍पादन पर हुआ है.

    कम वजन वाली मुर्गियों की बिक्री
    अजहर मियां नामक एक ट्रेडर ने बताया कि मुर्गियों को पर्याप्‍त खाना नहीं मिलने और देर से उत्‍पादन शुरू करने के कारण डिमांड पूरी करने में परेशानी आई. इस परेशानी को दूर करने के लिए किसानों और ट्रेडर्स ने कम वजन वाली मुर्गियां बेचनी शुरू कर दी, इससे डिमांड और सप्‍लाई की सामान्‍य प्रक्रिया प्रभावित हुई, जिसका असर अंडे की बढ़ी हुई कीमत के रूप में दिख रहा है.

     

     

     

  • राजस्थान में बच्‍चे पढ़ रहे पद्मिनी का वही इतिहास, जिस पर है ऐतराज

    राजस्थान में बच्‍चे पढ़ रहे पद्मिनी का वही इतिहास, जिस पर है ऐतराज

     

     

    फिल्म पद्मावती पर राजस्थान सरकार का दोहरा मापदंड समाने आया है. पद्मावती की जिस कहानी को काल्पनिक बताया जा रहा है, राजस्थान बोर्ड की 12वीं की किताबों में वही कहानी स्टूडेंट को पढ़ाई जा रही. जिसमें ये बताया गया है कि पद्मिनी को पाने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ पर आक्रमण किया था और खिलजी ने शीशे में पद्मिनी की झलक देखी थी.

    सरकार ने करणी सेना की इसी आपत्ति को आधार मानकर फिल्म के प्रदर्शन पर राजस्थान में रोक लगा दी. इतना ही नहीं खुद सरकार की पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर लिखा है कि पद्मिनी की शीशे में झलक देखने के बाद खिलजी उन्हे पाने के लिए लालायित हो गया था.

    महारानी पदमनी के लिए खिलजी ने किया चित्तौड़ पर आक्रमण
    12वीं कक्षा में इतिहास की किताब में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण का पाठ पढ़ाया जा रहा है. लिखा है कि खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण की सिर्फ वजह थी कि वो महारानी पद्मिनी को पाना चाहता था.इतना ही नहीं छात्रों को समझाया जा रहा है कि किस तरह खिलजी के चित्तौड़ पर घेरा डालने से किले में राशन का संकट खड़ा हुआ, तो रावल रतन सिंह ने खिलजी के रानी पद्मिनी को शीशे में दिखाने का प्रस्ताव स्वीकार किया और खिलजी ने शीशे में महारानी पद्मिनी की झलक देखी थी.

    राजस्थान पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर भी वही कहानी 
    राजस्थान बोर्ड के पाठ्यक्रम में खिलजी के पद्मिनी को पाने की वही कहानी है जिस पर आपत्ति की जा रही है. राजस्थान सरकार के पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर भी महारानी पद्मिनी के महल के बारे में जानकारी दी गई है कि खिलजी ने 1303 में पद्मिनी को पाने के लिए हमला किया था और इसी महल में खिलजी को पद्मिनी की झलक शीशे में दिखाई थी.

    ‘जब पाठ्यक्रम में भी यही इतिहास तो फिल्म पर बैन कैसा’
    कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब खुद सरकार पाठ्यक्रम में ये ही इतिहास पढ़ा रही है, तो फिर फिल्म पर प्रतिबंध कैसे लगाया. राजस्थान सरकार ने सफाई दी कि पाठ्यक्रम में अगर गलत इतिहास पढ़ा रहे हैं, तो सरकार संशोधन कर लेगी. लेकिन निर्माता को इस आधार पर फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों की तोड़ मरोड़ का हक नहीं है.

    किले के लाइट एंड साउंड शो में भी चित्तौड़ की यही कहानी
    हैरानी ये कि चित्तौड़ का किला भारत सरकार के पुरात्तव विभाग के पास है और किले के लाइट एंड साउंड शो में भी चित्तौड़ पर खिलजी के आक्रमण की ये ही कहानी आज भी पर्यटकों को बताई जा रही है.

  • सीएम योगी को मेरठ में दिखाए गए काले झंडे

    सीएम योगी को मेरठ में दिखाए गए काले झंडे

     

     

    नई दिल्ली। सीएम योगी निकाय चुनावों में भाजपा को जिताने के लिए तूफानी दौरे पर हैं। 18 नवम्बर को सीएम योगी का दौरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में था। जहां पर उन्हे मेरठ,मुज्जफरनगर के साथ गाजियाबाद में जनसभाएं करनी थीं। मेरठ में जैसे ही सीएम योगी पहुंचे तो पहले उनका भव्य स्वागत हुआ। जैसे वो मंच पर पहुंचे तो पहले तो पंडाल में दंगल का आगाज दो पक्षों के बीच शुरू हो गया। एक दूसरे ने जमकर कभी थप्पड़ मारे तो कभी लात और जूतों की बारिश हुई।

    बाद में पता चला कि ये लोग सीएम योगी का विरोध करने के लिए आये थे। इन लोगों का कहना था कि चुनाव के दौरान भाजपा ने जो वादा किया था वह उस पर खरी नहीं उतरी है। इसका का विरोध करने के लिए ये लोग सीएम योगी को काला झंडा दिखाने आये थे। जैसे ही झंडा दिखाना शुरू किया तुरंत ही भाजपाई कार्यकर्ताओं और इन लोगों के बीच जमकर मंच के नीचे जूतम-पैजार हुई। इसके बाद स्थानीय पुलिस ने इन लोगों को हटा लिया।

    सीएम योगी को ये लोग किसान विरोध बता रहे थे। इनका कहना था, किसानों के हित में सरकार ने कुछ भी काम नहीं किया है। जैसा कि सरकार ने वादा किया था। हांलाकि इस उपद्रवियों के खिलाफ पुलिस ने सख्त कार्रवाई करते हुए इन लोगों को हिरासत में लिया है।





  • जन्मदिन विशेष: मास्टर से मुख्यमंत्री तक मुलायम का कठिन सफ़र

    जन्मदिन विशेष: मास्टर से मुख्यमंत्री तक मुलायम का कठिन सफ़र

     

     

    समाजवादी पार्टी आज बेशक आंतरिक कलह से जूझ रही है लेकिन एक दौर में राजनीति में मुलायम सिंह का सिक्का पुजता था. वो किंग से लेकर किंग मेकर तक की भूमिका अदा कर चुके हैं. आज की राजनीति में ज़मीनी स्तर का उनसे बड़ा समाजवादी नेता कोई नहीं है.

    76 साल पहले आज ही के दिन साल 1939 में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गांव में मुलायम सिंह यादव का जन्म हुआ था. उनका परिवार पहले बेशक राजनीति राजनीति से न जु़ड़ा हो. लेकिन आज उनके परिवार के कण-कण में राजनीति बसती है. देश में उनके परिवार से बड़ा राजनीतिक परिवार शायद ही हो.

    भाई, भतीजा, बेटा और बहु हर कोई ब्लॉक और पंचायत स्तर से लेकर संसद तक प्रतिनिधित्व कर रहा है. आज मुलायम जहां खड़े हैं बेशक वो पायदान राजनीति में काफी ऊंचा है लेकिन उनकी उड़ान ज़मीन से शुरू हुई थी. जो काफी विस्तारित दिखाई देती है. नज़र डालिए उनके निजी से राजनीति जीवन पर एक नज़र.

    मालती देवी से शादी के बाद साल 1973 में मुलायम सिंह के घर उनके इकलौते बेटे अखिलेश यादव ने जन्म लिया. लेकिन तब तक वो राजनीति की दुनिया में अपने कदम जोरदार तरीके से जमा चुके थे. राजनीति में कूदने के लिए उन्हें प्रेरित करने वाली शख्सियत का नाम राम मनोहर लोहिया था.
    साल दर साल राजनीतिक सफ़र

    1960: मुलायम सिंह राजनीति में उतरे
    1967: पहली बार विधानसभा चुनाव जीते, MLA बने
    1974: प्रतिनिहित विधायक समिति के सदस्य बने
    1975: इमरजेंसी में जेल जाने वाले विपक्षी नेताओं में शामिल
    1977: उत्तर प्रदेश में पहली बार मंत्री बने, कॉ-ऑपरेटिव और पशुपालन विभाग संभाला
    1980: उत्तर प्रदेश में लोकदल का अध्यक्ष पद संभाला
    1985-87: उत्तर प्रदेश में जनता दल का अध्यक्ष पद संभाला
    1989: पहली बार UP के मुख्यमंत्री बनकर कमान संभाली
    1992: समाजवादी पार्टी की स्थापना कर, विपक्ष के नेता बने
    1993-95: दूसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री पद पर काबिज़ रहे
    1996: मैनपुरी से 11वीं लोकसभा के लिए सांसद चुने गए. केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री का पद संभाला
    1998-99: 12वीं और 13वीं लोकसभा के लिए फिर सांसद चुने गए
    1999-2000: पेट्रोलियम और नेचुरल गैस कमेटी के चेयरमैन का पद संभाला
    2003-07: तीसरी बार यूपी का मुख्यमंत्री पद संभाला
    2004: चौथी बार 14वीं लोकसभा में सांसद चुनकर गए
    2007: यूपी में बसपा से करारी हार का सामना करना पड़ा
    2009: 15वीं लोकसभा के लिए पांचवीं चुने
    2009: स्टैंडिंग कमेटी ऑन एनर्जी के चेयरमैन बने
    2014: उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ से सांसद बने
    2014: स्टैंडिंग कमेटी ऑन लेबर के सदस्य बने
    2015: जनरल पर्पस कमेटी के सदस्य बने

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