डेस्क। सारनाथ के अशोक स्तंभ को 26 अगस्त 1950 के दिन देश के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया था। हमें देश के महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों, मुद्राओं और इमारतों पर अशोक स्तंभ दिखायी देता है। यह युद्ध और शांति की नीति का प्रतीक माना जाता है।
पर इन दिनों इसपर विवाद छिड़ा हुआ है, संसद भवन की नई इमारत पर राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न का अनावरण होते ही कुछ ऐसा सामने आया तो इस उठापटक का कारण बन गया।
प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को पूजा-पाठ करने के बाद इसका उद्घाटन किया और इसकी कुछ तस्वीरें भी साझा कीं। विपक्ष का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीक में फेरबदल किया गया है जो देश का अपमान है।
आखिर इस प्रतीक में ऐसा क्या है-
इसमें बने हुए शेर सारनाथ में स्थित स्तंभ से काफी अलग हैं। विपक्ष का आरोप है कि सेंट्रल विस्टा की छत पर जो प्रतीक स्थापित किया गया उस राष्ट्रीय प्रतीक के शेर आक्रामक मुद्रा में नजर आते हैं जबकि ओरिजिनल स्तंभ के शेर बहुत ही शांत मुद्रा में हैं।
यह विवाद टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के ट्वीट के बाद शुरू हुआ जब उन्होंने कहा कि अब सत्यमेव जयते से सिंहमेव जयते की ओर जा रहे हैं।
अशोक स्तंभ का इतिहास?
सम्राट अशोक मौर्य वंश के तीसरे राजा थे। उनको सबसे शक्तिशाली शासकों में गिना जाता है। उनका जन्म 304 ईसा पूर्व में हुआ था। उनका साम्राज्य इतना भव्य था कि ये तक्षशिला से लेकर मैसूर में तक फैला हुआ था। साथ ही पूर्व में बांग्लादेश से लेकर पश्चिम में ईरान तक उनका राज्य था।
सम्राट अशोक ने अपने साम्राज्य में कई जगहों पर स्तंभ स्थापित करवाकर यह संदेश दिया था कि यह राज्य उनकी अधीनता हो मानता है। इन्ही में से कई जगहों पर अशोक के बनवाए स्तंभ मिले हैं जिनमें शेर की आकृति बनी है। लेकिन सारनाथ और सांची में उनके स्तंभ में शेर शांत दिखाई देता हैं जिसे राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में लिया गया। ऐसा भी माना जाता है कि ये दोनों ही प्रतीक उनके बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद बनवाए गए थे। जिनको शांति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
सम्राट अशोक ने अपने जीवनकाल में कई युद्ध भी लड़े। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी काम किया और तक्षशिला, विक्रमशिला और कांधार विश्वविद्यालय को स्थापित करवाया। उनकी उदारता और महानता का प्रतीक माना जाने वाला; 261 ईसा पूर्व में जब कलिंग के युद्ध में भारी नरसंहार हुआ तो सम्राट अशोक को बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने अपनी ओर से हथियार रखने का फैसला कर लिया। इसके बाद ही उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया और उन्होंने अशोक स्तंभ बनवाए जिसमें शेरों की छवि को शांत और सौम्य बनाया गया।
अशोक स्तम्भ देता है ये संदेश
सारनाथ के अशोक स्तंभ को 26 अगस्त 1950 में राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में भारत सरकार के द्वारा अपनाया गया। महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों, मुद्राओं पर अशोक स्तंभ हमें दिखायी देता है। इसमें चार शेर है जो आत्मविश्वास, शक्ति, साहस और गौरव को दर्शाते हैं।
साथ ही इसमें नीचे की तरफ एक बैल और घोड़ा बना है। बीच में धर्म चक्र भी बना है। पूर्वी भाग में हाथी और पश्चिम में बैल की आकृति है। दक्षिण में घोड़े और उत्तर में शेर बने है। इसी के बीच में चक्र बने हुए हैं। बता दें कि इसी चक्र को राष्ट्रीय ध्वज में भी शामिल किया गया है। स्तंभ में नीचे ‘सत्यमेव जयते’ लिखा मिलता है जो कि मुंडकोपनिषद का एक सूत्र है।
इससे जुड़ा कानून क्या है?
अशोक स्तंभ को जब राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार गया तो उसको लेकर कुछ नियम भी बनाए गए थे। अशोक स्तंभ का इस्तेमाल सिर्फ संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ही कर पाएंगे जिसमें भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद, विधायक, राज्यपाल, उपराज्यपा और केवल उच्च पद के अधिकारी शामिल हैं।
साथ ही राष्ट्रीय चिह्नों का कोई दुरुपयोग न हो, भारतीय राष्ट्रीय चिह्न (दुरुपयोग रोकथाम) कानून 2000 बनाया गया था। इसे 2007 में संशोधित भी किया गया। इसके मुताबिक अगर कोई आम नागरिक अशोक स्तंभ का उपयोग करता है तो उसको दो साल की कैद या 5 हजार रुपये का जुर्माना अथवा दोनों ही हो सकते हैं।
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