VIDEO: 4 लाख एटम बमों के बराबर गर्मी पैदा कर रहे हैं हम

VIDEO: 4 लाख एटम बमों के बराबर गर्मी पैदा कर रहे हैं हम

 

 

जर्मनी के बॉन शहर में इन दिनों जलवायु परिवर्तन सम्मेलन चल रहा है. दुनिया क्लाइमेट चेंज पर क्यों बात कर रही है?  क्योंकि धरती का तापमान बढ़ रहा है जो फिलहाल 16 डिग्री सेल्सियस के क़रीब है. 1951 से 1980 के बीच धरती का तापमान 14 डिग्री सेल्सियस था. 1880 में यह तापमान और एक डिग्री और कम था. यानी 71 साल में तापमान में एक डिग्री की बढ़ोत्तरी मगर सिर्फ़ 30 साल में दो डिग्री की. देखने में मामूली सा मौसम का यह गणित है बेहद भयानक. यह तापमान ग्लेशियर्स को तेजी से पिघला रहा है, नतीजे में चारों महासागरों में जलस्तर बढ़ रहा है.

आपको जानकार ताज्जुब होगा कि इसकी वजह हम खुद हैं. और ये यूं ही नहीं. इंसान की उत्पादन और निर्माण की गतिविधियां असल में तापमान बढ़ा रही हैं. 2017 में जितनी गर्मी हम पैदा कर रहे हैं वह हिरोशिमा वाले 4 लाख एटॉमिक बमों के बराबर है. 1950 के बाद से इस गर्मी का बड़ा कारण हैं ग्रीनहाउस गैसें हैं. ग्रीनहाउस गैसों से होने वाला नुकसान झेलने वाले देशों में भारत होगा.

लेकिन ये ग्रीनहाउस इफेक्ट क्या है? सूरज की ऊर्जा के ओज़ोन लेयर तक आने और फिर छनकर धरती तक पहुँचने की प्रॉसेस है ग्रीनहाउस इफ़ेक्ट. पृथ्वी के चारों ओर इन ग्रीनहाउस गैसों की एक परत होती है. इनमें हैं कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड. ग्रीनहाउस गैसें न होतीं तो पृथ्वी इतनी गर्म होती कि यहां जीवन नहीं होता.

इस पूरे क्लाइमेट चेंज का हम पर क्या असर पड़ने वाला है? अगले 25-30 साल में धूप, बारिश, सर्दी, गर्मी सबका चक्र बदल जाने वाला है. यह प्रकृति के व्यवहार में दिख भी रहा है. मसलन, समुद्र के जलस्तर में सालाना 3 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हो रही है और सालाना 4% की रफ़्तार से ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं. इसका सीधा प्रभाव दक्षिण भारत के समुद्रतटीय इलाक़ों  पर होगा. इससे वहां के के 5.5 करोड़ लोगों को ख़तरा है.आप अपने स्तर पर इस बारे में क्या कर सकते हैं?

-कम से कम बिजली खर्च करें

– ज़्यादा से ज़्यादा पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें

– सोलर पैनल इस्तेमाल करें

– कचरा डीकम्पोज़ करना सीखें

– क्लाइमेट चेंज के बारे में आपस में बात करें.

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