कोर्ट:- सुप्रीम कोर्ट ने किसी कैदी को पहले कैद में रखने ओर फिर उसे बरी करने के सम्बंध में कहा है कि किसी भी कैदी को लगातार हिरासत में रखना ओर बाद में उसको बरी कर देना वास्तव में अन्न्याय है। उन्होंने केंद्र सरकार से कहा कि उन्हें अब जमानत को लेकर अन्य जमानत कानून बनाने पर विचार करना चाहिए। जानकारी के लिए बता दें सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह सिफारिश जेल में कैदियों की भीड़ ओर विचाराधीन कैदियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए कही है।
कोर्ट ने कहा यदि नियम हमे न बांधते हो तो जमानत की याचिकाओं पर दो सप्ताह में और अग्रिम जमानत याचिकाओं पर छह सप्ताह में फैसला लिया जाना चाहिए। जस्टिस एसके कौल और एमएम सुंदरेश की पीठ ने सीबीआई द्वारा पकड़े गए एक व्यक्ति के मामले में फैसला देते हुए यह बात कही है। उन्होंने कहा भारत मे सजा का दायरा कम है। यह कारक हमे तब बहुत अधिक प्रभावित करता है जब हम जमानत याचिका पर निर्णय ले।रहे होते हैं। यह वास्तव में अदालत के मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
उन्होंने आगे कहा कि अदालतें यह सोचती हैं कि दोषसिद्धि की संभावना बेहद कम होने के कारण, जमानत आवेदनों पर सख्ती से निर्णय लेना होगा। यह कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है। जब हम जमानत याचिका पर फैसला लेते हैं तो हम यह नह6समझ पाते हैं कौन सा मामला दण्ड लायक है और किसका ट्रायल होना चाहिए। जिसके चलते हमे यह लगता है कि निरंतर हिरासत में रहना फिर बरी होना अन्याय का मामला है। शीर्ष अदालत ने ब्रिटेन और अमेरिका के विभिन्न राज्यों में प्रचलित विशेष जमानत कानूनों का हवाला दिया जहां ऐसे मामलों से निपटने के लिए जांच एजेंसियों और अदालतों, दोनों के लिए पर्याप्त दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।
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