1947 में भी उठा था राष्ट्रपति के नाम का मुद्दा, इस पर बनी थी सहमति

डेस्क। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु पर कांग्रेस नेता अधीर रंजन की टिप्पणी ने इस संवैधानिक पद के नाम को लेकर नई विवादों को जन्म दे दिया है। उन्होंने जिस तरह से राष्ट्रपति के स्थान पर मुर्मु को राष्ट्रपत्नी कहा, कई लोग इसको संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन करार दे रहे हैं।

इसके साथ ही कई महिला अधिकार संगठन यह मांग भी करने लगे हैं कि इस पद के लिए कोई ऐसा नाम होना चाहिए, जो ज्यादा जेंडर न्यूट्रल हो, जिसके उच्चारण में कोई लैंगिक भेद प्रतीत न होता हो।

आज हम आपको बताएंगे कि इस देश के सर्वोच्च पद के लिए शब्द प्रयोग को लेकर संविधान सभा में भी बहस हुई थी। जुलाई, 1947 में इस बात पर बहस हुई थी कि प्रेसिडेंट आफ इंडिया के लिए हिंदी में क्या शब्द इस्तेमाल होगा। उस समय सरदार, प्रधान, नेता और कर्णधार जैसे कई शब्दों का विकल्प सामने आया था। हालांकि इनमें से किसी भी शब्द पर सहमति नहीं बनी और अंतत: हिंदी में ‘राष्ट्रपति’ शब्द को ही अपनाया गया था। 

आपको बता दें कि ऐसे और भी पद हैं जिनमें लैंगिक आधार पर कोई भेद नहीं है। सभापति (चेयरपर्सन) और कुलपति (वाइस चांसलर) इसी का ही उदाहरण हैं। इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि पद पर बैठने वाला पुरुष हो या महिला।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के बारे में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की इस टिप्पणी को लेकर गुरुवार को लोकसभा में भारी हंगामा भी हुआ। 

 अधीर रंजन की टिप्पणी को राष्ट्रपति का अपमान बताते हुए भाजपा ने कांग्रेस और उसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी से माफी मांगने के लिए दबाव बनाया। इसको लेकर सोनिया गांधी और भाजपा नेता एवं मंत्री स्मृति र्इरानी के बीच तीखी बहस भी हुई। वहीं दूसरी ओर अधीर रंजन चौधरी ने गलती स्वीकार करते हुए साफ किया कि उनकी जुबान फिसल गई थी।

बता दें कि अधीर रंजन चौधरी ने एक निजी चैनल के रिपोर्टर के सवाल पर राष्ट्रपति के लिए दो बार जोर देकर राष्ट्रपत्नी शब्द का इस्तेमाल किया था। इसके बाद BJP ने गुरुवार को इस मुद्दे पर संसद के बाहर और अंदर कांग्रेस पर तगड़ा हमला भी बोला।

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