Rahul Gandhi को कांग्रेस की कमान , जानें, 130 साल पुरानी पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर क्या होंगी राहुल की चुनौतियां

नई दिल्ली । लंबे समय से राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने को लेकर लग रहे कयास अब खत्म हो गए हैं। उनके पार्टी अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो गया है।

पार्टी की ओर से जारी चुनाव प्रक्रिया के मुताबिक 11 या 19 दिसंबर को उनके अध्यक्ष बनने का ऐलान हो सकता है। 47 वर्षीय राहुल गांधी का सर्वसम्मति से कांग्रेस अध्यक्ष बनना तय हो गया है, लेकिन लगातार चुनावी हार का सामना कर रही पार्टी को उबारने के लिए उनकी चुनौतियां भी कम नहीं होंगी। खासतौर पर ऐसे वक्त में जब पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी देश भर में अप्रत्याशित सफलता हासिल कर रही है।

कांग्रेस के सीनियर लीडर मणिशंकर अय्यर नेता ने पिछले दिनों पार्टी अध्यक्ष को लेकर कहा था कि सिर्फ दो ही नेता प्रेजिडेंट बन सकते हैं, मां और बेटा। यह इस बात का संकेत था कि वह पार्टी के नए नेतृत्व को लेकर बहुत संतुष्ट नहीं हैं। यह इस बात का भी संकेत था कि गांधी परिवार के पुराने वफादारों को भविष्य में बहुत ज्यादा महत्व नहीं मिलेगा। सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया के कद में हाल में हुए इजाफे से भी इसका संकेत मिलता है कि सोनिया के भरोसेमंदों को राहुल की टीम में पहले जैसी तवज्जो नहीं मिलेगी।
यह बात कांग्रेस के लिए फायदेमंद ही हो सकती है क्योंकि पार्टी की पुरानी पीढ़ी आज भी परंपरागत राजनीति से हटकर नहीं सोच पा रही है। नए सलाहकार राहुल गांधी को मौजूदा पीढ़ी से कनेक्ट करने में मददगार साबित हो सकते हैं। हालांकि राहुल के लिए पुराने नेताओं को नजरअंदाज कर नए लोगों को मौका देना चुनौतीपूर्ण भी होगा क्योंकि उनके करीबी ऐसे तमाम नेता हैं, जो जननेता नहीं हैं। इसके बावजूद नए विचारों वाले नए नेता ही कांग्रेस के भविष्य की राह तैयार कर सकते हैं।

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सोशल मीडिया पर राहुल गांधी भले ही देर से ऐक्टिव हुए हैं, लेकिन अब उन्होंने मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। जीएसटी को लेकर गब्बर सिंह वाला उनका तंज काफी चर्चित हुआ था। राहुल गांधी ने अपने भाषणों में ऐसे देसी शब्द इस्तेमाल करने शुरू किए हैं, जो आम लोगों और गली-गली तक राहुल की पहुंच को बढ़ाते हैं। अपने नए अवतार से उन्होंने खासा प्रभावित किया है, लेकिन अब भी बहुत कुछ बाकी है।

पीएम नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस की दशकों पुरानी जाति और धर्म की चुनावी रणनीति को बुरी तरह प्रभावित किया है। लेकिन, पुरानी ही रणीति के चलते कांग्रेस नरेंद्र मोदी से चुनावी मुकाबला नहीं कर सकती। राहुल ने हाल के दिनों में मोदी सरकार को प्रभावी तरीके से घेरने का प्रयास किया है, लेकिन अब भी उन्हें पार्टी के प्रति लोगों के दृष्टिकोण को बदलना होगा। मोदी सरकार को आर्थिक मुद्दों पर घेरना और मंदिरों में दर्शन करना पार्टी की रणनीति में बदलाव का संकेत है।

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राहुल गांधी को अब तक उनके फैन जवाहर लाल नेहरू की विरासत के हिस्से के तौर पर चित्रित करते रहे हैं। वह अब तक अपने परनाना की समाजवादी विचारधारा के बोझ तले दबे हुए लगते हैं, लेकिन मौजूदा वोटर्स की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्हें इससे परे निकलना होगा। पीएम नरेंद्र मोदी को गरीबों के साथ सीधे संवाद के लिए जाना जाता है, ऐसे में राहुल गांधी को भी इसके रास्ते तलाशने होंगे।

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