पशुपति पारस बनाम चिराग पासवान: राजनीतिक रण का अनोखा अध्याय!
रामविलास पासवान के निधन के बाद एलजेपी में जो राजनीतिक भूचाल आया, वो किसी से छुपा नहीं है। उनके परिवार में ही चाचा और भतीजे के बीच जो जंग छिड़ी है, वो बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली है। पशुपति पारस और चिराग पासवान के बीच की ये लड़ाई सिर्फ पार्टी की सत्ता की नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के भविष्य को भी तय करेगी। इस लेख में हम इस कड़वे राजनीतिक झगड़े की जड़ों, इसके मुख्य मुद्दों और इसके परिणामों को समझने की कोशिश करेंगे।
चाचा-भतीजे के बीच का अनबन: अपशब्दों की राजनीति
हाल ही में पशुपति पारस ने चिराग पासवान के लिए बेहद आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया, जो खबरों में छा गया। उन्होंने चिराग पर अपने बड़े भाई, दिवंगत रामविलास पासवान को अंतिम समय में मिलने से रोकने का आरोप लगाया। इस घटना ने इस राजनीतिक संघर्ष को एक और भयावह मोड़ दे दिया। पशुपति पारस के इस बयान ने बिहार की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। दोनों नेताओं की छवि पर भी इसका बड़ा असर पड़ा है।
कितना गहरा है यह झगड़ा?
यह राजनीतिक झगड़ा पारिवारिक विवाद से कहीं आगे बढ़ गया है। पार्टी के भीतर की खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई के अलावा, इसमें कई राजनीतिक समीकरण भी शामिल हैं। बिहार की राजनीति में होने वाले आने वाले चुनावों में इस झगड़े का बहुत प्रभाव पड़ेगा। दोनों नेताओं का भविष्य ही इस रिश्तेदारों के बीच राजनीतिक संग्राम पर टिका है।
एलजेपी में बंटवारा और सत्ता की लड़ाई
रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद एलजेपी दो हिस्सों में बंट गई। पशुपति पारस ने पार्टी का एक गुट अपने कब्जे में कर लिया और चिराग पासवान अलग पार्टी बनाकर खड़े हो गए। ये राजनीतिक बंटवारा सिर्फ़ एलजेपी के अस्तित्व पर ही नहीं बल्कि दोनों नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है।
पार्टी कार्यालय पर विवाद: एक बड़ा झटका
पशुपति पारस और चिराग पासवान के बीच राजनीतिक लड़ाई पार्टी कार्यालय तक पहुंच गई। दोनों नेताओं ने इस कार्यालय पर कब्जे के लिए जमकर कोशिश की। यह सत्ता संग्राम और विवाद इतना बढ़ गया कि आखिरकार बिहार की सरकार ने पार्टी कार्यालय चिराग पासवान के नाम कर दिया। पशुपति पारस को कार्यालय छोड़ना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर दिखाया कि यह लड़ाई कितनी गंभीर है।
चिराग की वापसी और राजनीतिक समीकरण
हाल ही के लोकसभा चुनावों में चिराग पासवान की जबरदस्त वापसी हुई। वो केंद्र में मंत्री भी बने, और यह पशुपति पारस के लिए एक बड़ा झटका है। चिराग की ये कामयाबी उनको नई ऊर्जा दे रही है। क्या इस वापसी के साथ वो फिर से एलजेपी में अपना वर्चस्व कायम करेंगे, यह देखने वाली बात है।
2024 के चुनावों का असर
आने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों नेताओं की स्थिति पर इसका असर पड़ेगा। यह देखा जाना बाकी है कि पशुपति पारस और चिराग पासवान की ये राजनीतिक जंग बिहार के चुनावी नतीजों पर कैसा प्रभाव डालती है।
Take Away Points
- पशुपति पारस और चिराग पासवान का झगड़ा पारिवारिक विवाद से आगे बढ़कर बिहार की राजनीति का एक अहम मुद्दा बन गया है।
- एलजेपी में बंटवारा दोनों नेताओं के भविष्य के लिए खतरा बन गया है।
- चिराग की लोकसभा चुनावों में जीत और मंत्री पद ने इस जंग में एक नया मोड़ ला दिया है।
- 2024 के चुनावों के परिणाम इस राजनीतिक लड़ाई को काफी हद तक प्रभावित करेंगे।

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