Opposition alliance: लोकसभा चुनाव में मोदी को हराने के लिए विपक्ष के कई क्षेत्रीय दलों ने एकजुटता दिखाते हुए इण्डिया गठबंधन बनाया। जुलाई में बना इण्डिया गठबंधन आपसी खींचातानी से जूझता रहा और 2024 की जनवरी में बिखरने लगे। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग करने से इनकार कर दिया तो बिहार के सीएम और इण्डिया गठबंधन के सूत्रधार नीतीश कुमार ने पुनः पाला बदल कर बीजेपी से हाथ मिला लिया। नीतीश के बीजेपी में शामिल होने से यह खबरें हवा में खूब उड़ रहीं हैं कि कांग्रेस का नेतृत्व गठबंधन को धारशायी कर रहा है। वही अब सवाल यह उठता है क्या नीतीश के जाने से इण्डिया गठबंधन को होगा नुक्सान –
भारतीय राजनीति पर शोध करने वाले जाइल्स वेर्नियर कहते हैं- बीजेपी की वर्तमान स्थिति बेहतर है। राम लहर में मोदी का विकास कार्य घर -घर पहुंच गया है। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने तीन राज्यों में चुनाव जीत कर साबित कर दिया। जनता मोदी की विकास नीतियों के पक्ष में खड़ी है। ऐसे में नीतीश कुमार का बीजेपी में पुनः शामिल होना इण्डिया गठबंधन के लिए बुरा संकेत है। क्योंकि नीतीश कुमार गठबंधन के सूत्रधार थे। उनको इण्डिया की तरफ से पीएम पद का उम्मीदवार देखा जा रहा था। अब जब नीतीश ने इण्डिया गठबंधन से मुँह फेर लिया है तो संभावना यह भी है की आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रिय दल कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल उठाएंगे। क्योंकि सभी यह बात स्पष्ट रूप से जानते हैं कि बीजेपी की राम लहर में कांग्रेस की रीढ़ चरमरा गई है।
थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च से जुड़े राहुल वर्मा कहते हैं- बीजेपी बेहतर स्थिति में है। दिसम्बर से जनता के मध्य बीजेपी के लिए सकारात्मक वातावरण बन रहा है। राम मंदिर के उद्घाटन ने बीजेपी का नाम जन-जन के मुख पर ला दिया है। मोदी मय वातावरण बन रहा है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत की अधिक संभावना बन रही हैं और जनता कहीं न कहीं कांग्रेस की नीति को नकार रही है।
गठबंधन टूटने की वजह कांग्रेस:
कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। हर राज्य में कांग्रेस पार्टी की शाख मौजूद है। लेकिन आज कांग्रेस का वोट बैंक कमजोर हो गया है। साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 20 फीसदी वोट हासिल हुए। विपक्ष के सभी दल यह जानते हैं की बड़ा दल होने के बाद भी कांग्रेस की जनता के बीच स्थिति बेहतर नहीं है और चुनाव में जो भी वोट शेयर इण्डिया गठबंधन का बढ़ेगा वह उनकी पार्टी के दम का होगा। ऐसे में विपक्ष के अन्य दल कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं और इण्डिया गठबंधन से दूरी बना रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस क्षेत्रिय दलों से अधिक सीट चाहती है। क्षेत्रिय दल कांग्रेस की स्थिति से परिचित हैं। उनका मानना है वह जीत के साथ जाना चाहते हैं न की डूबते हुए रथ के साथ। ऐसे में सभी इण्डिया गठबंधन से दूरी बनाकर स्वयं को मजबूत स्थिति में कर रहे हैं। मोटा – मोटा समझें तो विपक्षी दल कांग्रेस के नेतृत्व को नकार रहे हैं और कहीं न कहीं गठबंधन के धराशायी होने का कारण कांग्रेस का नेतृत्व है।

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