किस आधार पर सही है नोटबन्दी का फैसला

देश- कल सुप्रीम कोर्ट ने नोटबन्दी के परिपेक्ष्य में दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, केंद्र सरकार द्वारा नोटबन्दी का फैसला सही था। सरकार ने आरबीआई के साथ 6 माह पूर्व ही इसके सन्दर्भ में रूपरेखा बना ली थी। 
 सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस नज़ीर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने अपने फ़ैसले में नोटबंदी के फ़ैसले को सही ठहराया है। लेकिन बेंच के फैसले को सवालों में कटघरे में उतारते हुए जस्टिस नागरत्ना ने अपने फ़ैसले में इसे ग़ैर-क़ानूनी बताया है।
जस्टिस गवई ने कहा है कि भारतीय रिज़र्व बैंक क़ानून की धारा 26(2) में दी गयी शक्तियों के आधार पर किसी बैंक नोट की सभी सिरीज़ को प्रतिबंधित किया जा सकता है. और इस धारा में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘किसी’ को संकीर्णता के साथ नहीं देखा जा सकता।
उन्होंने कहा कि इस धारा में जिस ‘किसी’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, उसकी प्रतिबंधित व्याख्या नहीं की जा सकती. आधुनिक चलन व्यावहारिक व्याख्या करना है. ऐसी व्याख्या से बचना चाहिए जिससे अस्पष्टता पैदा हो. और व्याख्या के दौरान क़ानून के उदेश्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को सेंट्रल बोर्ड के साथ सलाह-मशविरा करने की ज़रूरत होती है और ऐसे में ये इनबिल्ट सेफ़गार्ड है; आर्थिक नीति के मुद्दे पर बेहद संयम बरतने की ज़रूरत।
हालांकि, जस्टिस नागरत्ना ने कहा है कि ‘सभी नोटों को प्रतिबंधित किया जाना, बैंक की ओर से किसी बैंक नोट की किसी सिरीज़ को चलन से बाहर निकाले जाने से कहीं ज़्यादा गंभीर है. ऐसे में इस मामले में सरकार को क़ानून पास कराना चाहिए था।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा, जब नोटबंदी का प्रस्ताव केंद्र सरकार की ओर से आता है तो ये आरबीआई क़ानून की धारा 26(2) के तहत नहीं आता है. इस मामले में क़ानून पास किया जाना चाहिए था. और अगर गोपनीयता की ज़रूरत होती तो इसमें ऑर्डिनेंस लाने का रास्ता अपनाया जा सकता था।

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