महाराष्ट्र का सियासी ड्रामा: एकनाथ शिंदे का समझौता

महाराष्ट्र की सत्ता-संग्राम: एकनाथ शिंदे का समझौते का खेल

क्या आप जानते हैं महाराष्ट्र की राजनीति में क्या हुआ? एकनाथ शिंदे ने एक चौंकाने वाला फैसला लिया, और सत्ता के खेल में सबको हैरान कर दिया! आइए जानते हैं उनके इस फ़ैसले के पीछे की असल कहानी, क्या मजबूरियों ने उनका रास्ता बदल दिया?

बीजेपी का दबदबा: 4 विधायकों की कमी

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए बस 4 विधायकों की कमी थी। एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी अपना समर्थन वापस भी ले लें, फिर भी बीजेपी के पास बहुमत जुटाने का भरपूर दम था। 132 विधायकों के साथ, बीजेपी को 145 के बहुमत के लिए केवल 13 विधायकों की आवश्यकता थी। दो निर्दलीय और छोटी पार्टियों के 10 विधायक बीजेपी के समर्थन में थे। सपा के दो और सीपीआई(एम) के एक विधायक के समर्थन से बीजेपी का यह आंकड़ा आसानी से 4 तक पहुँच जाता। इस प्रकार शिंदे के पास मोलभाव की गुंजाइश ही नहीं बची थी।

शिवसेना का फिर टूटना: 2019 का डर

महाराष्ट्र की राजनीति कितनी अस्थिर है, यह किसी से छुपा नहीं है। 2019 की शिवसेना का टूटना, उद्धव ठाकरे और अजित पवार का अलग होना और वापस जुड़ना, एकनाथ शिंदे के सामने एक बड़ी चेतावनी थी। वो यह जानते थे कि दूसरा शिंदे कब अपनी ही पार्टी में विद्रोह कर सकता है, अगर वे भी उद्धव के राह पर चलते।

उद्धव ठाकरे का उदाहरण: विचारधारा का त्याग?

एकनाथ शिंदे यह भी समझते थे कि अगर वे सीएम बनने की जिद पर अड़ जाते, तो बाद में उन्हें कांग्रेस और एमवीए के साथ समझौता करने पर मजबूर होना पड़ता। वे यह भी अच्छी तरह देख रहे थे कि विचारधारा से समझौता करने पर उद्धव ठाकरे का क्या हश्र हुआ। इसलिए बगावत के बजाय उन्होंने समझौता को बेहतर समझा।

टेक अवे पॉइंट्स:

  • महाराष्ट्र में सत्ता का खेल बहुत ही पेचीदा और अप्रत्याशित रहा।

  • बीजेपी के पास पहले से ही बहुमत जुटाने की क्षमता थी।

  • एकनाथ शिंदे ने अपने पुराने अनुभवों से सीखकर समझौता का रास्ता चुना।

  • राजनीतिक नेताओं के लिए विचारधारा से समझौता करना बहुत ही जोखिम भरा हो सकता है।

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