हाल ही में पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केजरीवाल ने रैलियों में वादा किया कि अगर 2022 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी जीतती है तो वे पंजाब के हर घर में 300 यूनिट फ्री बिजली देंगे और हर पंजाबी महिला को उसकी आर्थिक स्थिति या जरूरत देखे बिना मुफ्त पैसे दिए जाएँगे। केजरीवाल के अनुसार, उनकी पार्टी दिल्ली में 200 यूनिट फ्री बिजली दे रही है।
दिलचस्प बात यह है कि जब से दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बनी है तब से तो उनके फ्री बाँटने के मामलों में अभूतपूर्व तरीके से तेजी देखने को मिली है। आम आदमी पार्टी तो दिल्ली में महिलाओं के लिए मुफ्त बिजली से लेकर बस यात्रा भी फ्री करने की घोषणा कर चुकी है। उल्लेखनीय है कि चुनावों को लेकर की गई इस तरह की घोषणाएँ कभी भी समझदारी भरी नहीं होती। इन नीतियों से दूरदर्शिता की कमी हमेशा परिलक्षित होती है।
दरअसल, आम आदमी पार्टी जनता के लिए लाई गई रेगुलर योजनाओं का क्रियान्वयन करने में विफल रही है। ऐसे में पार्टी मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर अपनी कमियों को ढँकने की कोशिश कर रही है, ताकि जनता में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके। अगर सही तरीके से अगर योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया होता तो उसे मुफ्तखोरी का सहारा नहीं लेना पड़ता। AAP लगातार मुफ्त बिजली देने के अपने वादे का प्रचार कर रही है, लेकिन यहाँ हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि किस तरह के आम आदमी पार्टी की कुछ नीतियाँ देश को नुकसान पहुँचा रही हैं।
भारत में विद्युत उत्पादक कंपनियों का बुरा हाल है। ये कंपनियाँ सामान्यतया दो कारकों के कारण समस्याग्रस्त हैं। पहला ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन (T&D) के नुकसान को कम न कर पाना और दूसरा है बढ़ते खर्चों को पूरा करने के लिए कीमतें बढ़ाना। ये दोनों देश भर के घरों को प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि राज्यों के पास ये अधिकार है कि वो टैरिफ बढ़ा सकते हैं। इसी मुफ्तखोरी के कारण 2019-20 में कंपनियों के राजस्व में 3,000 करोड़ रुपए की कमी आई थी, जिसके कारण दिल्ली में बिजली कंपनियों ने नियामक डीईआरसी से अनुरोध किया था कि लागत आधारित एक क्रमिक दर लागू की जाए।
विशेष लक्ष्यों की पूर्ति के लिए दी जाने वाली सब्सिडी अहम होती है। जिन लक्ष्यों के लिए सब्सिडी दी जाती है, उन्हें पूरा करने के बाद इसे बंद कर दिया जाना चाहिए। बिजली व्यक्ति की हर दिन की जरूरत है औऱ सब्सिडी के तौर पर इसकी कुल खपत को माफ कर देना किसी भी रूप में सही नहीं है। ये केवल एक चुनावी चाल है। अक्सर लोग राजनीतिक पार्टियों के इसी बहकावे में आ जाते हैं, लेकिन हकीकत ये है कि मुफ्त की इस सब्सिडी को दूसरे तरीकों से वसूल किया जाता है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली में इस तरह की फ्री सुविधा के कारण सरकारी खजाने पर बहुत भार पड़ता है।
दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री ने 2021-22 के बजट में ऊर्जा क्षेत्र के लिए 3,227 करोड़ रुपए का प्रस्ताव रखा था, जिसमें से 3,090 करोड़ रुपए तो केवल बिजली सब्सिडी के लिए आवंटित थे। इस तरह से यह कुल आवंटन का 96 प्रतिशत और पूरे बजट का 4.4 प्रतिशत है। अगर उपभोक्ता अपने इस्तेमाल की गई बिजली का पैसा देता तो इस फंड का इस्तेमाल किसी दूसरे कार्यों में किया जा सकता था।
पंजाब जैसे बॉर्डर स्टेट में विकास के अवसरों और प्रक्रिया का विशेष महत्व होता है। पंजाब की 553 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो पाकिस्तान से लगती है। ड्रग माफिया से पंजाब लंबे वक्त से जूझ रहा है, जिसे सुरक्षित रखने के लिए बहुत अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। राज्य का बजट करीब 6 लाख करोड़ रुपए का है, जो कि दिल्ली से करीब 9 गुना अधिक है। इस हिसाब से पंजाब में बिजली सब्सिडी की लागत का अनुमान लगाया जाए तो वह दिल्ली की सब्सिडी से 9 गुणा, यानी करीब 27,000 करोड़ रुपए होगा।
इस बार पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक पार्टियों द्वारा किए गए मुफ्त के वादे पर संज्ञान लेते हुए हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय चुनाव आयोग को नोटिस भेजा था। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उसने पहले ही चुनाव आयोग को इस तरह के आचरण से बचने के लिए दिशा-निर्देश बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन आयोग ने केवल एक बार ही राजनीतिक दलों के साथ उनकी राय जानने के लिए बैठक की। उल्लेखनीय है कि अगर सच में आम आदमी पार्टी जनता की भलाई के लिए काम करना चाहती है तो अपनी बेईमान मानसिकता छोड़कर जनता की वास्तविक जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करे न कि मुफ्तखोरी को बढ़ावा दे।
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