Farmers Protest : किसान ही नहीं समझ रहे किसानों की पीड़ा !

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चंडीगढ़ । किसानों केे आंदोलन और हजारों की संख्‍या में दिल्‍ली-हरियाणा बार्डर पर जमे रहने के कारण राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली और एनसीआर में दूध-सब्जियों की सप्‍लाई की चेन टूट गई है। इससे दूध और स‍ब्‍जी उत्‍पादक किसान बेहद मुश्किल में हैं। इसका असर दिल्‍ली के साथ ही हरियाणा व उत्‍तर प्रदेश पर पड़ रहा है। इस तरह किसानों के दर्द को किसान ही नहीं समझ नहीं रहे हैं।

 

हरियाणा की गिनती देश के सबसे ज्यादा अन्न उत्पादक राज्यों में तो होती ही है, दूध उत्पादक राज्यों की श्रेणी में भी हरियाणा आठवें स्थान पर है। फसल विविधिकरण अपनाते हुए हरियाणा के प्रगतिशील किसानों व किसान उत्पादक संगठनों का जोर सब्जी, फल, मसाले और फूलों का उत्पादन बढ़ाने पर है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से बिल्कुल सटा होने के कारण हरियाणा का किसान दिल्ली के लोगों की दूध, फल, सब्जियों व फूलों की जरूरत को बरसों से पूरा कर रहा है।

यह एक चेन बनी हुई है, जिसमें किसान व मजदूर से लेकर दिल्ली का हर वीआइपी व जरूरतमंद उपभोक्ता जुड़ा हुआ है, मगर किसान आंदोलन के नाम पर जिस तरह से दिल्ली की चारों तरफ से घेराबंदी की गई है, उससे न तो हरियाणा के दूध व सब्जी उत्पादकों का माल दिल्ली जा रहा है और न ही दिल्ली के लोगों की दूध व सब्जियों की जरूरत पूरी हो पा रही है।

ऐसी स्थिति सिर्फ हरियाणा की सीमा के प्रवेश द्वार बाधित होने से नहीं बनी है। उत्तर प्रदेश से दिल्ली आने वाले किसानों व दूध उत्पादकों के साथ भी यही समस्या है। इसका सबसे बड़ा नुकसान सब्जी व दूध उत्पादक किसानों को रहा है, जिन्हें हर रोज अपने उत्पाद यानी दूध और सब्जियां या तो नष्ट करनी पड़ रही हैं या फिर सस्ते दामों पर अपने-अपने इलाकों में ही निकालनी पड़ रही है। सरल भाषा में हम यूं कह सकते हैं कि किसान हितों के नाम पर बार्डर पर जो किसान जमा हैं, वही अपने वास्तविक जरूरतमंद किसान की आय और प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन गए हैं।

तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि इन किसानों व पशुपालकों के सामान की दिल्ली में सप्लाई नहीं होने के कारण उसे हरियाणा में सस्ते दामों पर बेचना पड़ रहा है, लेकिन हरियाणा के लोगों को सस्ते दामों पर यह उपलब्ध नहीं हैं। किसान को गोभी दो से तीन रुपये किलो में निपटानी पड़ रही है, लेकिन मंडी व रेहड़ी पर यह रेट 20 से 40 रुपये किलो तक है। यही स्थिति दूध की है।

दूध उत्पादक किसान घरों में सप्लाई करने वाले दूध की मात्रा बढ़ाकर लेने का अनुरोध अपने नियमित ग्राहकों से कर रहे हैं। इससे भी इतर, दिल्ली के लोगों को दूध व सब्जियों की किल्लत के चलते वहां महंगे दामों पर सामान खरीदना पड़ रहा है। आल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के महासचिव नवीन गुप्ता का कहना है कि आंदोलन की वजह से ट्रकों की आवाजाही प्रभावित है। यह नुकसान की बड़ी वजह है।

हरियाणा में करीब 18 लाख किसान खेती के व्यवसाय से जुड़े हैं। यहां बागवानी फसलों की खेती अभी 4.52 लाख हेक्टेयर में की जाती है। कुल उत्पादन 25.1 लाख टन होता है। अगले 10 सालों में बागवानी का क्षेत्रफल बढ़ाकर नौ लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है। कुल उत्पादन 270 लाख टन पहुंचने की उम्मीद है।

ऐसा फसल विविधिकरण के चलते किया जा रहा है। इससे किसानों को अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। दिल्ली-एनसीआर में तकरीबन पांच करोड़ लोग रहते हैं। साल दर साल फल-फूल व सब्जियों की मांग बढ़ रही है। हरियाणा इसकी आपूिर्त करने वाला प्रमुख राज्य बना हुआ है, जो भविष्य में रफ्तार पकड़ सकता है।

हरियाणा में दूध उत्पादन सालाना 107 लाख टन पर पहुंच चुका है। हरियाणा में दूध उत्पादन बढ़ने के साथ ही प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता 1.05 किलोग्राम से बढ़ कर 1.87 किलोग्राम हो गई है। 2017-18 में दूध उत्पादन 84 लाख टन था। 2018-19 (1 अप्रैल 2018 से 31 मार्च 2019) में 107 लाख टन दूध का उत्पादन हुआ है।

देश में रोजाना करीब 50 करोड़ लीटर दूध उत्पादित होता है। इसमें 20 करोड़ लीटर की घरेलू खपत शामिल है। 30 करोड़ लीटर दूध सहकारी संस्थाओं व निजी डेरी कंपनियों के जरिए बाजारों में आता है। हरियाणा का आधा दूध दिल्ली व एनसीआर में खपत किया जाता है, जो अब प्रभावित होने लगा है। अच्छी किस्म के पशुओं का पालन और किसानों की इसके प्रति बढ़ती रुचि दूध उत्पादन बढ़ने की वजह है।

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