कृषि वैज्ञानिको ने किया कमाल चांद पर उगा पौधा, स्पेस साइंटिस्ट रह गए हैरान

डेस्क। चांद और मंगल दोनों पर जितना शोध किया जाए कम है। वैज्ञानिक जितना इसपर से पर्दा उठाने का प्रयास करते है उतने ही रहस्य में फसते जातें हैं। पर इस बार जो काम स्पेस के विशेषज्ञ नहीं कर सके उसे कृषि वैज्ञानिकों ने कर दिखाया। कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसने यह सत्यापित तो नहीं किया परंतु हां, चांद पर जीवन होने की आशंका को फिर से गति दे दी है।

कृषि वैज्ञानिकों का यह काम मानवजाति के भविष्य की दिशा बदलने वाला कदम भी हो सकता है। बता दें कि कृषि वैज्ञानिकों ने चांद से लाई गई मिट्टी में पौधे उगाने में सफलता हासिल की है।

बता दें कि ‘कम्युनिकेशंस बायोलाजी’ नामक पत्रिका में छपे एक शोध के अनुसार, अपोलो अभियान के दौरान अंतरिक्ष यात्री जो मिट्टी लेकर आए थे उसमें पौधे उगाने में सफल हुए हैं। इस पैधे के उगने से यह साफ हो गया है कि चांद पर मिली मिट्टी पर खेती संभव है। इसने चांद पर जीवन होने का कयास बढ़ा दिया है। 

जानकारी के मुताबित फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के कृषि वैज्ञानिकों ने विशेष तरीके से चांद की मिट्टी में पौधे उगाए हैं। 

वैज्ञानिकों ने बताया कि शोध अभी शुरुआती पड़ाव पर है, इस बारे में काफी अध्ययन किया जाना अभी बाकी है। बता दें कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी नासा इस खोज से बेहद उत्साहित है। नासा के प्रमुख बिल नेल्सन ने इसपर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘नासा के लंबी अवधि के अभियानों के लिए यह खोज बहुत महत्त्वपूर्ण साबित होगी।

इसके बाद उन्होंने कहा कि, चांद और मंगल पर मिले संसाधनों का हम भविष्य के अंतरिक्षयात्रियों के लिए भोजन पैदा करने के लिए कर सकते हैं साथ ही वहां रहने और अंतरिक्ष की गहराइयों को खंगालने के लिए प्रयोग करने में भी सहायता मिलेगी। 

जानकारी के लिए बता दें कि इस शोध के लिए फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने चांद से लाई गई सिर्फ 12 ग्राम मिट्टी का प्रयोग किया और वह अपने प्रयोग में सफल भी हुए। यह मिट्टी अपोलो 11, 12 और 13 के अभियानों के दौरान पृथ्वी पर लाई गई थी।

इस प्रयोग के लिए वैज्ञानिको ने हरी सरसों के बीजों को चुना। उसमें में भी जाति को चुना गया जो उगने में ज्यादा समय न ले। रोज इनका पोषण किया गया और देखते ही देखते वैज्ञानिको की मेहनत सफल हो गई। 

शोध को लेकर मुख्य शोधकर्ता आना-लीजा पाल ने जानकारी देते हुए बताया कि, ‘पहले छह दिन तक हर पौधा, चाहे वह चांद की मिट्टी में हो या दूसरी (धरती की), एक जैसा दिखाई दिया लेकिन फिर फर्क नजर आने शुरू हो गया। उन्होंने बताया कि चांद की मिट्टी में उगे पौधे धीमे बढ़ रहे थे और उनकी जड़ें भी छोटी थीं।’

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