नई दिल्ली। सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया खातों को अनिवार्य रूप से आधार के साथ जोडऩे के लिए दाखिल याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया। जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की बेंच ने याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय से कहा कि वे पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएं और मामले को सीमित करते हुए उन्हें हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता प्रदान की।
साथ ही पीठ ने कहा कि जरूरी नहीं कि हर मामले को सुप्रीम कोर्ट में ही सुना जाए। अश्विनी ने अपनी दलील में कहा था कि फेक और पेड न्यूज को नियंत्रित करने को फर्जी सोशल मीडिया खातों को निष्क्रिय करने के लिए आधार प्रमाणीकरण जरूरी है।
राजनीतिक दल अक्सर फर्जी खातों का इस्तेमाल करते है और मतदान के समापन से पहले 48 घंटे के दौरान भी उम्मीदवारों के प्रचार और अन्य चुनावी गतिविधियों के लिए इनका इस्तेमाल होता है। लगभग 3.5 मिलियन ट्विटर हैंडल और 35 मिलियन फेसबुक अकाउंट ऐसे हैं, जिनका उपयोग फर्जी और झूठे बनाए गए समाचार प्रसारित करने के लिए किया गया है।
प्रख्यात राजनीतिक हस्तियों के नाम पर बनाए गए इन हैंडल का प्रयोग आम आदमी को गुमराह करने के लिए किया जाता है और फर्जी खबरें फैलाकर नतीजों को प्रभावित किया जाता है। आपको बता दें कि मद्रास, बॉम्बे और मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट में भी ऐसी ही याचिकाएं दायर की गई हैं।
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