लखनऊ, आप जिसको अपने सबसे करीब मानते हो और वह अचानक बिछड़ जाए तो उस दर्द का एहसास वहीं कर सकता है जो इससे गुजरा हो। अपनों से दूर जब उसके होने की आशा छोड़ दी जाए और उसे वह फिर से मिल जाए तो उसी खुशी के पल का एहसास भी वही कर सकता है। फिल्मों में मेले में व स्टेशन पर अपनों से दूर होने के बाद तीन घंटे की फिल्म खत्म होते ही मिलने की खुशी का एहसास भी आपने जरूर किया हाेगा।
फिल्मों से दूर हकीकत में एक ऐसी की जीवंत सच्ची कहानी की पटकथा राजधानी के प्राग नारायण रोड स्थित राजकीय महिला शरणालय में लिखी गई। 18 साल से मानसिक बीमार रामसखी परिवार से बिछड़ गई थी। उसके जीवन की आस खो चुके पति राजेंद्र प्रसाद को जब पता चला तो उसकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। पति से बिछड़ी पत्नी रामसखी के आंसू भी नहीं रूक रहे थे। पति ने बताया कि इलाहाबाद के हंडिया के खड़हड़ा गांव के रहने वाले हैं। पांच बच्चाें की मां रामसखी मानसिक बीमार होकर 18 साल पहले कहीं गुम हो गई थी। थाने से लेकर रिश्तेदारों को सूचना दी, लेकिन कहीं पता नहीं चला। हम तो आशा ही खो चुके थे।आशा ज्याेति केंद्र सीतापुर के माध्यम से फरवरी में उसे यहां लाया गया। राजकीय शरणालय की अधीक्षिका आरती सिंह ने इसकी मनोदशा को न केवल परखा बल्कि उसके इलाज के साथ काउंसिलिंग करना शुरू किया। महीनों बाद बीते दिनों उसने अपने नाम के साथ अपने पति का नाम और पता बताया। गूगल मैप के माध्यम से गांव और थाने का पता चला। अब जब वह पति के साथ अपने घर चली तो शरणालय परिसर का माहौल भी गमगीन हो गया‘शरणालय में आने के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता नीलिमा शुक्ला ने दोस्ती के साथ काउंसिलिंग करना शुरू किया। नाम के साथ धीरे-धीरे गांव व पति का नाम बताने लगी। अब जब वह अपने पति के साथ जा रही है तो हम सभी की मेहनत का फल उसके आंखों से निकले खुशी के आंसू से मिल गई।‘ -आरती सिंह, अधीक्षिका, राजकीय महिला शरणालय, प्राग नारायण रोड
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