राहुल की ताजपोशी के बाद क्या होगी सोनिया गांधी की नई भूमिका?

राहुल की ताजपोशी के बाद क्या होगी सोनिया गांधी की नई भूमिका?

 

 

सोनिया गांधी के नाम भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की सबसे ज्यादा वक्त तक अध्यक्ष रहने का रिकार्ड है.कांग्रेस में राहुल गांधी को कमान सौंपने की तैयारी है. राहुल के अध्यक्ष बनने से पहले ही कांग्रेस दफ्तर के बाहर आतिशबाजी का नजारा देखने को मिला. कांग्रेस वर्किग कमेटी की बैठक में सोनिया गांधी ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को धन्यवाद कहा.

लेकिन सवाल ये उठ रहा है कि सोनिया गांधी की क्या भूमिका रहेगी. विरोधी जब नरेंद्र मोदी जैसा ताकतवर राजनीतिक हो तो क्या राहुल को सोनिया अकेला छोड़ देगी. सोनिया गांधी के करीबी सूत्रों और एक सीनियर नेता ने बताया सोनिया गांधी राजनीति से संन्यास नहीं लेने जा रही है. 2019 के लोकसभा चुनाव तक वो यूपीए की चेयरपर्सन बनी रहेंगी.

संभावना ये भी है कि कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष भी वही रहेंगी. इसके पीछे की वजह है गठबंधन. नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी को मात देने के लिए 2004 की तर्ज पर कांग्रेस को गठबंधन करना पड़ेगा. बहुत सारे कांग्रेस के सहयोगी राहुल गांधी के साथ सहज नहीं है. कांग्रेस को बिहार, यूपी, केरल, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर और बंगाल में गठबंधन के साथी की तलाश है. लेफ्ट पार्टियों का समर्थन कांग्रेस को चाहिए. इसलिए सोनिया गांधी यूपीए की चेयरपर्सन बनी रहेंगी. कांग्रेस को विपक्ष से सत्ता तक ले जाने वाली सोनिया गांधी का राजनीतिक सफर कैसा रहा- आइए नजर डालते है .

शुरुआती दिन और सोनियासोनिया गांधी का जन्म इटली के लुज़ियाना में 9 दिसंबर 1946 को हुआ था. कैंब्रिज मे सोनिया की दोस्ती राजीव गांधी से हुई. 1968 में राजीव गांधी के साथ सोनिया की शादी हुई. बताया जाता है कि शुरुआती दिनों में सोनिया गांधी राजीव गांधी के राजनीति मे आने के सख्त खिलाफ रही. राजीव गांधी पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगा और 1989 के चुनाव में कांग्रेस हार गई. मई 1991 में राजीव गांधी की हत्या एक चुनावी रैली में हो गयी. लेकिन तब भी सोनिया गांधी ने राजनीति से गुरेज रखा. तमाम दबाव के बाद सोनिया गांधी के हिमायत से पी वी नरसिंहाराव प्रधानमंत्री बने. राजीव गांधी की मौत के बाद सोनिया गांधी ने सामाजिक कार्यो में अपना वक्त दिया. खासकर राजीव गांधी फाउंडेशन के कामों में.

1996 के आम चुनाव में नरसिंहाराव की अगुवाई वाली कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद से नरसिंहाराव के खिलाफ कांग्रेस में बगावती सुर उठने लगे थे. इस सुर को ठंडा करने के लिए सीताराम केसरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन पार्टी के कई नेता कांग्रेस के अलग हो गए. जिसमें उत्तर भारत से नरायण द्त्त तिवारी और अर्जुन सिंह ने मिलकर तिवारी कांग्रेस का गठन किया. तमिलनाडु के कद्दावर नेता जी के मूपनार ने पी चिदंबरम के साथ तमिल मनीला कांग्रेस बना ली. मध्य प्रदेश में माधवराव सिंधिया ने भी अपना अलग दल बनाया.

पार्टी का एक खेमा सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने के लिए कोशिश कर रहा था. जिसके अगुवा अर्जुन सिंह थे. सोनिया ने 1997 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सक्रिय राजनीति में कदम रखा. 1998 में कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष मनोनीत कर दिया. लेकिन राजनीति की राह इतनी आसान नहीं थी. 1999 में अटल की सरकार गिरने के बाद सरकार बनाने की कोशिश की गई लेकिन आखिरी समय में मुलायम सिंह ने विदेशी मूल का मुद्दा बना कर सोनिया गांधी को समर्थन देने से इनकार कर दिया. इस मुद्दे पर ही शरद पवार तारिक अनवर और पीए संगमा भी कांग्रेस से अलग हो गए.

1999 के आम चुनाव में कांग्रेस को फिर हार का सामना करना पड़ा.1999 में सोनिया गांधी विपक्ष की नेता बनी. इस बीच साल 2000 में कांग्रेस में चुनाव हुए, यूपी के ब्राह्मण नेता जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया के खिलाफ चुनाव लड़ा लेकिन जीत सोनिया गांधी की हुई. 2003 में अटल सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लायी लेकिन कामयाबी नहीं मिली.

2004-2014 सोनिया की राजनीति
2004 में एनडीए का इंडिया शाइनिंग शबाब पर था.कांग्रेस को एक साथ रखने की चुनौती सोनिया गांधी पर थी. सोनिया गांधी ने कांग्रेस के साथ नए दलों को इकट्ठा करना शुरू किया. बिहार से लेकर केरल तक कई दलों के साथ गठबंधन हुआ. चुनाव नतीजों से सोनिया ने सबको चौंका दिया. 15 दलों के गठबंधन की सरकार बनी जिसको वामंपथी दलों ने बाहर से समर्थन दिया. संसद के सेंट्रल हॉल में हंगामे के बीच सोनिया गांधी ने पीएम बनने से इनकार कर दिया.

मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो सोनिया गांधी नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की अध्यक्ष. जो सरकार को सलाह मशविरा देने का काम करती रही. 23 मार्च 2006 को सोनिया गांधी ने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. ऑफिस ऑफ प्राफिट को लेकर हंगामा चल रहा था. जिसकी वजह से सोनिया गांधी ने ये कदम उठाया. साल 2008 में अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील के मसले पर लेफ्ट ने समर्थन वापिस ले लिया. लेकिन समाजवादी पार्टी के समर्थन और क्रास वोटिंग से यूपीए की सरकार बच गयी.
यूपीए की इस कार्यकाल में मनरेगा और आरटीआई जैसे कानून लाए गए. किसानों को कर्ज माफ किए गए. 2009 के आम चुनाव में विपक्ष की तरफ से कालेधन का मुददा बनाया गया. लेकिन कांग्रेस को और ज्यादा सीट लोकसभा में मिली खासकर यूपी में जहां 23 सांसद जीतकर आए. 2009 के बाद सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. 2जी घोटाले का आरोप कोयला में घोटाले का आरोप और काले धन को लेकर सरकार की सुस्ती पर सवाल खड़ा किया गया.अन्ना रामदेव और अरविन्द केजरीवाल के आंदोलन की वजह से यूपीए की साख गिर गयी. 2014 में बीजेपी को भारी बहुमत मिला.

विपक्ष में सोनिया
2014 में कांग्रेस की हार का सिलसिला जो शुरू हुआ तो रूकने का नाम नहीं ले रहा था. मोदी का जादू चल रहा था. कांग्रेस की हरियाणा महाराष्ट्र में सरकार गई. असम, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश हर जगह चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हारी. सिवाय बिहार में जहां गठबंधन ने लाज बचाई.

2017 के चुनाव में पंजाब को छोड़कर हर जगह कांग्रेस का सफाया हो गया. नेशनल हेराल्ड के मामले में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर कोर्ट में सोनिया राहुल के खिलाफ मामला भी दर्ज कर लिया.

(सैय्यद मोजिज़ इमाम, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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