मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल्स, जानिये क्या है एग्जिट पोल्स ?

मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल्स, जानिये क्या है एग्जिट पोल्स ?

नई दिल्ली । 17वीं लोकसभा के लिए रविवार को सातवें चरण का मतदान हो रहा है। वोटिंग खत्म होते ही सभी पार्टियों और आम जनता की नजर टिकी होगी एग्जिट पोल्स पर। ये हर बार सटीक भले ही न बैठें लेकिन नतीजों से पहले उनकी झांकी दिखाने का काम जरूर कर जाते हैं।

क्या होते हैं एग्जिट पोल्स 
लगभग सभी बड़े चैनल्स विभिन्न एजेंसियों के साथ मिलकर आखिरी चरण का मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल्स दिखाती हैं। इसमें बताया जाता है कि नतीजे किसके पक्ष में होंगे और किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं। इनसे एक मोटा-मोटा अंदाजा हो जाता है कि नतीजे क्या आ सकते हैं। हालांकि, यह कहना ठीक नहीं कि चुनाव के नतीजे एग्जिट पोल्स के अनुसार ही आएं। भारत में सबसे पहले एग्जिट पोल्स 1960 में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डिवेलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने जारी किए थे।

कौन करवाता है एग्जिट पोल्स
सबसे पहले यह जानते है कि एग्जिट पोल करने का तरीका क्या होता है? एग्जिट पोल के लिए तमाम एजेंसीज वोट डालने के तुरंत बाद वोटर्स से उनकी राय जानती हैं और उन्हीं रायों के आधार एग्जिट पोल के नतीजे तैयार किए जाते हैं। भारत में जहां चुनाव विकास से लेकर जाति-धर्म जैसे तमाम मुद्दों पर लड़ा जाता है, ऐसे में मतदाता ने किसको वोट दिया है, यह पता करना भी आसान नहीं है। अक्सर मतदाता इस सवाल का सही जवाब नहीं देते कि उन्होंने किसे वोट दिया। इस वजह से भी एग्जिट पोल्स चुनावी नतीजों से विपरीत भी आते हैं।

एग्जिट पोल्स और ओपिनियन पोल्स कैसे अलग?
मोटा फर्क तो यह है कि ओपिनियन पोल चुनाव से पहले और एग्जिट पोल चुनाव के बाद आते हैं। ओपिनियन पोल में वोटर्स की राय जानी जाती है और उसी आधार पर सर्वे तैयार किया जाता है। इसमें वे लोग भी शामिल होते हैं जो हो सकता है कि चुनाव वाले दिन वोट डाले ही नहीं। वहीं एग्जिट पोल से जुड़े सवाल चुनाव वाले दिन ही सिर्फ वोट डालकर आए लोगों से पूछे जाते हैं।

क्या नियम? क्या सजा?
रेप्रिजेंटेशन ऑफ द पीपल ऐक्ट, 1951 के सेक्शन 126A के तहत चुनाव के शुरू होने से पहले और आखिर चरण की वोटिंग के खत्म होने के आधे घंटे बाद ही एग्जिट पोल्स दिखा सकते हैं। सेक्शन में साफ कहा गया है कि कोई भी किसी भी तरह के एग्जिट पोल को मीडिया के किसी रूप (प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक) में दिखा या छाप नहीं सकता। इस नियम को तोड़ने पर दो साल की सजा, जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं।

पार्टियों के निशाने पर भी रहती हैं एजेंसियां
आलोचक और राजनीतिक पार्टियां अकसर एग्जिट पोल्स करवाने वाली एजेंसियों को अपनी पसंद, तरीके आदि के हिसाब से पक्षपात वाला बताती हैं। उनके पक्ष में न आने पर पार्टियां यह तक कहती हैं कि विरोधी दलों ने एग्जिट पोल्स एजेंसियों को इसके लिए पैसे देकर मतदाता की असल भावना को छिपाया है। source:nbt

 

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