बीजेपी अकेले 2014 दोहरा नहीं पाई, तो क्या……..! पढ़े पूरी खबर!

बीजेपी अकेले 2014 दोहरा नहीं पाई, तो क्या……..! पढ़े पूरी खबर!

आजादी के बाद शुरुआती तीन दशक को छोड़ दें तो बाद के वर्षों में ऐसा कई बार हुआ है कि उत्तर प्रदेश में ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी ने या तो केंद्र में सरकार बनाई या फिर केंद्र सरकार में उसकी अहम भूमिका रही। लोकसभा चुनाव वर्ष 1980 और 1984 के चुनाव में फिर से कांग्रेस को यूपी में ज्यादा सीटें मिलीं और केंद्र में उसकी सरकार बनी। 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल को यूपी में 54 सीटें मिलीं और बोफोर्स घोटाले में फंसे राजीव गांधी को हार का सामना करना पड़ा।

जनता दल के नेता वीपी सिंह देश के आठवें प्रधानमंत्री बने। वर्ष 1991 में मंडल और मंदिर आंदोलन के बीच बीजेपी को 51 सीटें और जनता दल को 22 सीटें मिलीं। हालांकि सरकार कांग्रेस की बनी। 1996 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी को यूपी में 52 सीटें मिलीं और अटल बिहारी वाजपेयी कुछ समय के लिए पीएम बने।

बीजेपी अकेले 2014 दोहरा नहीं पाई, तो क्या……..! पढ़े पूरी खबर!

(सभी फोटो साभार- सोशल मीडिया)

बाद में वाजपेयी सरकार गिर गई और एचडी देवगौड़ा तथा उसके बाद इंद्र कुमार गुजराल देश के प्रधानमंत्री बने। इन सरकारों में भी यूपी में 16 सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी का दबदबा रहा। मुलायम सिंह यादव रक्षा मंत्री बनाए गए।

इसके बाद 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यूपी में अच्छा प्रदर्शन किया और उसकी सरकार बनी। वर्ष 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की केंद्र में सरकार बनी जिसे यूपी में क्रमश 35 और 15 सीटें जीतने वाली एसपी और बीएसपी का समर्थन हासिल था। यही स्थिति 2009 के लोकसभा चुनाव में भी रही।

वर्ष 2014 में मोदी लहर में बीजेपी ने यूपी में 80 में से 71 सीटें जीतकर केंद्र में सरकार बनाई। लोकसभा चुनाव 2019 में लगभग तमाम एग्जिट पोल ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत दर्ज करवा दी है, इसका एक बड़ा फायदा पीएम मोदी को यह हुआ है कि इसके आधार पर उन्हें एनडीए का सर्वमान्य नेता घोषित कर दिया गया है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि बीजेपी अकेले 2014 दोहरा नहीं पाई और उसे एकल बहुमत नहीं मिला, तो क्या नैतिकता के आधार पर नरेन्द्र मोदी- नितिन गड़करी, राजनाथ सिंह जैसे किसी दूसरे नेता को प्रधानमंत्री बनने का अवसर देंगे? शायद नहीं!

असली नतीजे आने के पहले ही नेता का ऐलान हो चुका है, इसलिए सियासी जोड़तोड़ से भी सरकार बनी तो प्रधानमंत्री तो नरेन्द्र मोदी ही बनेंगे?

यदि एग्जिट पोल के अनुसार 2014 जैसे नतीजे आते हैं तो यह स्वीकार करना चाहिए कि पीएम मोदी पर देश की जनता ने फिर से भरोसा किया है, लेकिन राजनीतिक कायदे से यदि बीजेपी पिछले लोकसभा चुनाव 2014 जितने वोट शेयर प्रतिशत नहीं हांसिल कर पाती है और यदि पिछली बार जितनी लोकसभा सीटें नहीं मिलती हैं।

तो इसका मतलब यही होगा कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को देश की जनता ने अस्वीकार कर दिया है? ऐसी स्थिति में नितिन गड़करी, राजनाथ सिंह जैसे किसी अनुभवी वरिष्ठ नेता को प्रधानमंत्री पद दिया जाना चाहिए, यही नहीं इस पद के लिए बिहार के सीएम नीतीश कुमार भी योग्य हैं!

मीडिया से मिली खबरों के अनुसार बहुमत तो दूर, यदि जोड़तोड़ से भी सरकार बनने के सियासी हालात रहे, तब भी कम-से-कम नैतिकता के लिए कोई गुंजाईश नहीं है।

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