तेजी से बदलती दुनिया में हमें आत्मनिर्भर होने की जरूरत है रक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए

तेजी से बदलती दुनिया में हमें आत्मनिर्भर होने की जरूरत है रक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए

भारत रक्षा व्यय। आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को सैन्य-विनिर्माण के स्तर पर मूर्त रूप देने के लिए रक्षा मंत्रलय ने हाल ही में 101 रक्षा उपकरणों, हथियारों, वाहनों आदि के आयात पर 2024 तक रोक लगाने की घोषणा की है। इस पहल से अगले पांच-सात वर्षो में घरेलू रक्षा उद्योग को करीब चार लाख करोड़ रुपये के ठेके मिलेंगे।

भारत को रक्षा विनिर्माण केंद्र बनाने की प्रतिबद्धता देश की रक्षा उत्पादन नीति-2018 के मसौदे में भी दृष्टिगत होती है, जिसमें 2025 तक रक्षा उद्योग को 26 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंचाना तथा पांच अरब डॉलर के रक्षा उत्पाद के निर्यात का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन इन वैचारिक प्रतिबद्धताओं और रक्षा विनिर्माण की वास्तविकताओं के मध्य एक गहरी खाई मौजूद है। भारत आज भी अपनी रक्षा जरूरतों का 60 प्रतिशत आयात करता है। यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है।

वास्तव में समकालीन युद्ध प्रणाली में वायुसेना की भूमिका निर्णायक होती है। औज हमारी वायुसेना की ताकत रूस के सुखोई-30, फ्रांस के मिराज-2000, ब्रिटेन के जगुआर, रूस के मिग-21 एवं स्वदेशी तेजस मार्क-वन पर निर्भर है। एक समय मिग-21 लड़ाकू विमान हमारी वायुसेना की रीढ़ माने जाते थे, किंतु पुरानी प्रौद्योगिकी के कारण दुर्घटनाग्रस्त होते मिग-21 अब ‘उड़ता ताबूत’ कहलाते हैं। एक समय भारत के पास 872 मिग-21 लड़ाकू विमान थे, लेकिन आज उनमें से कुछ दर्जन ही सक्रिय हैं। इन्हें भी रिटायर करने की सख्त जरूरत है।

आज जब दुनिया की बड़ी शक्तियों के पास पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान मौजूद हैं, तब भारत को राफेल की आपूíत भी केवल फौरी सुकून देने वाली है। हमें जल्द ही तेजस मार्क-2 (पांचवीं पीढ़ी का संस्करण) लड़ाकू विमान विकसित करने होंगे, क्योंकि राफेल भी सौ फीसद पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान नहीं है। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान अत्याधुनिक होते हैं, जो किसी भी रडार एवं सेंसर की पकड़ से दूर होते हैं।

दरअसल तेजी से बदल रही दुनिया में रक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें शोध-अनुसंधान पर बल देना होगा। अभी भारत अपनी जीडीपी का बहुत कम हिस्सा शोध-अनुसंधान पर खर्च कर रहा है। इसे और बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ हमें स्वदेशी हथियारों को शंका की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति भी छोड़नी होगी। यदि इसरो के विज्ञानियों की तर्ज पर स्वायत्त कार्य संस्कृति एवं संसाधन प्राप्त हो तो डीआरडीओ के विज्ञानी भी विश्व के अत्याधुनिक रक्षा सामग्री बनाने में सफल हो सकते हैं। भारतीय नेतृत्व ने चीन के साथ मौजूदा गतिरोध के दौरान जिस प्रकार से कूटनीतिक स्तर पर मजबूत इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, उसी तर्ज पर रक्षा विनिर्माण के लिए भी देश के विज्ञानियों में युद्ध-सा नैतिक उत्साह पैदा करना होगा।

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