चांदी व एल्युमिनियम निकालने के लिए खनन माफिया ने गौरा पहाड़ को खोद डाला। कभी साढ़े छह एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले और 500 फीट से अधिक ऊंचा यह पहाड़ अब करीब 300 फीट ही रह गया है। गौरा पहाड़ से निकलने वाले डायस्पोर और पैराफिलाइट पत्थर में एल्युमिनियम व चांदी भरपूर मात्रा में पाई जाती है। इसी लालच में इस पहाड़ का अधाधुंध खनन किया गया। इससे यहां का गौरा उद्योग चौपट हुआ, फिर मूर्तियां बनाने वाले शिल्पकार बर्बाद हो गए।
मूर्तियां व सजावट का बनता था सामान : स्थानीय शिल्पकार बताते हैं कि इस पहाड़ से निकलने वाले मुलायम पत्थर को तराशकर आकर्षक मूर्तियां व सजावट का सामान बनता था। यहां की बनीं मूर्तियां कोलकाता, जयपुर, मुंबई व बेंगलुरु तक जाती थीं। इसे गौरा उद्योग कहा जाता था। गौरा उद्योग को बढ़ाने के लिए सरकार ने स्थानीय लोगों की समिति बनाई व 1970 में गौरा पहाड़ का पट्टा दे दिया। इसके पीछे मंशा शिल्पकारों और रोजगार को बढ़ावा देने की थी।
पट्टे के बाद से बेतहाशा खनन : गौरा पहाड़ के पट्टे के बाद तेजी से खनन शुरू हो गया। कुछ साल पहले पहाड़ से एक चमकीला पत्थर निकलने लगा। इस पत्थर के बीच में धातु की चमकीली परत दिखी। इसको लेकर पूरे क्षेत्र में चर्चाएं शुरू हो गईं। खोजबीन के बाद पता चला कि यह डायस्पोर और पैराफिलाइट पत्थर है। इसके बीच में एल्युमिनियम और चांदी की परत है। इसके बाद खनन माफिया भी सक्रिय हो गए। दिन-रात खनन शुरू हो गया।
दिल्ली ले जाकर बेचते हैं : गौरा पहाड़ से निकलने वाले डायस्पोर पत्थर को दिल्ली ले जाकर बेचा जाता है। दिल्ली में इस पत्थर को गलाकर चांदी और एल्युमिनियम अलग करने वाले कई प्लांट हैं। पूर्व में कुछ घटनाएं होने के बाद गौरा पहाड़ का पट्टा निरस्त कर दिया गया है।
गांवों में अघोषित मुद्रा बना पत्थर : डायस्पोर पत्थर को स्थानीय भाषा में ग्वाट बोला जाता है। इस पत्थर का गौरहारी और आस-पास के गांवों में अघोषित मुद्रा के रूप में चलन है। परचून की दुकान से लेकर अन्य दुकानों में दुकानदार एक किग्रा के पत्थर के टुकड़े की कीमत पांच-छह रुपए देते हैं। ग्रामीण पत्थर लेकर जाते हैं और इसके बदले सामान भी खरीदते हैं।
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