गुजरातियों को लगता है कि एक गुजराती देश का ताकतवर प्रधानमंत्री है। इस गुजराती प्रधानमंत्री की वजह से दुनिया में गुजरातियों की हैसियत बढ़ी है। कांग्रेस की तरफ से एक मजबूत नेता की कमी, विजय रुपाणी की कमजोरी को ढंक ले रही है। इसलिए मोदी के बदले हुए गुजरात को गुजराती 2017 में तो बदलता नहीं दिख रहा है।
अल्पेश-जिग्नेश-हार्दिक की साझा ताकत को इस्तेमाल करने से कांग्रेस चूक गई है। यह बात भी गुजरात में घूमते हुए साफ समझ में आती है। अब गुजरात चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे कि क्या अल्पेश-जिग्नेश-हार्दिक के नेतृत्व वाले समूहों के आपसी विरोध की वजह से ही तीनों एक साथ मिलकर कांग्रेस के साथ नहीं आ पाए। हार्दिक की उम्र चुनाव लड़ने की नहीं है, इसलिए सवाल है कि उनके पीछे खड़ी भीड़ किसे वोट करेगी? कुछ हद तक इसका जवाब नवरंगपुरा की दर्शन सोसायटी के सामने के सैलून में बाल कटाते मुङो मिला। मेरे यह कहने पर कि पाटीदार तो बहुत नाराज हैं, उनको भाजपा से कुछ मिला नहीं। पाटीदारों को नहीं मिला तो मिला किसको? भाजपा के राज में पाटीदारों की हैसियत सबसे ज्यादा रही है। कारोबार से लेकर सरकार तक पाटीदारों को ही भाजपा के राज में तवज्जो मिली है। ऐसे में हार्दिक के साथ भीड़ तो इकट्ठा हो रही है, लेकिन सीधे तौर पर लाभ पाए इस समूह के लोग मतदान केंद्र में कमल के निशान को अनदेखा कर पाएंगे, ऐसा कहना मुश्किल है। साबरमती रिवरफ्रंट जिस तरह से लोगों की शाम तनाव मुक्त होने का जरिया बना है, इसे समझना चाहिए। यहां आने पर शाम हिंदू-मुसलमान या दूसरे लोगों की भी एक बराबर तनाव मुक्त हो रही है। राज्य के स्थानीय चैनलों पर भाजपा और कांग्रेस के चुनाव प्रचार में 22 साल का राज ही प्रमुख है। भाजपा के चुनावी प्रचार कह रहे हैं कि भाजपा के राजनीतिक तौर पर मरने का मतलब होगा, गुजरात का गुजराती अस्मिता का मरना। कांग्रेस, 22 साल में भाजपा सरकार क्या-क्या नहीं कर सकी है, उसको उभार रही है।
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मगर प्रचार अभियान पर जनता से बात करने पर एक बात जो समझ में आती है कि 22 सालों और खासकर 2002 के बाद मोदी की अगुवाई में भाजपा के राज में गुजरातियों की जीवनशैली में जो स्थिरता आई है, उसे तोड़ने की मनरूस्थिति गुजरातियों की बनती नहीं दिख रही है। रात के 11 बजे महिलाएं जिस तरह से गुजरात के शहरों में अपने लिए खरीदारी करती नजर आ जाती हैं, वह दूसरे राज्यों के लिए कल्पना नहीं की जा सकती है। हां, सीधे तौर पर इसे कहा जा सकता है कि गुजरात में दंगे अब नहीं होते और गुजरात में सुरक्षा का अद्भूत भाव है। इसके खिलाफ दिल्ली में बैठकर सबसे बड़ा तर्क यही आता है कि गुजरात में मुसलमानों में जो असुरक्षा का भाव है, उसकी बात कोई नहीं करता। 2002 के दंगे दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक हैं। उस दौरान हिंदू-मुसलमान के बीच की खाई भी बढ़ी। मगर पिछले 15 सालों में हिंदू-मुसलमान की एक से ज्यादा पीढ़ियां बड़ी हो गई हैं और उनको मीडिया सतर्क न करे तो उनके लिए हिंदू-मुस्लिम विभाजन रोजमर्रा में लगभग न के बराबर है। इसका अहसास मुझे साबरमती रिवरफ्रंट पर हुआ। 2 दिसंबर की रात साढ़े दस बजे के आसपास रिवरफ्रंट के खानपुरा की तरफ मैं भी घूम रहा था। रिवरफ्रंट के बड़े इलाके में बड़े मजे से मुसलमान लड़के-लड़कियां और महिला-पुरुष घूमते-बैठे दिखे। गुजरात के विकास में मुसलमानों की हिस्सेदारी बहुत कम है। नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने व्यक्तित्व को जितना बड़ा कर लिया, उस लिहाज से विजय रुपाणी कम जोर नजर आते हैं। कांग्रेस की तरफ से एक मजबूत नेता की कमी, विजय रुपाणी की कमजोरी को ढंक ले रही है। इसलिए मोदी के बदले हुए गुजरात को गुजराती 2017 में तो बदलता नहीं दिख रहा है।
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