कोविड-19 : एक्‍सपर्ट की जुबानी जानें भारत के लिए क्‍यों मुश्किल है फाइजर कंपनी की कोविड-19 वैक्‍सीन को लेना

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नई दिल्‍ली  बीते नौ माह से कोविड-19 की मार झेल रहे विश्‍व के लिए फाइजर कंपनी से आई एक खबर वास्‍तव में सुकून देती है। कंपनी का दावा है कि उसकी बनाई वैक्‍सीन कोरोना वायरस पर 90 फीसद तक कारगर साबित हुई है। ट्रायल से मिले आंकड़ों के बाद कंपनी की तरफ से ये बात कही गई है। इससे जहां एक उम्‍मीद जगी है वहीं एक आशंका ने भी मन में घर कर लिया है। ये आशंका विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के उस बयान के बाद उठी है जिसमें कहा गया है कि इस वैक्‍सीन के लिए कम विकसित देश तैयार नहीं हैं। इसकी वजह संगठन ने जो बताई है उसके मुताबिक इस वैक्‍सीपन को माइनस 70 डिग्री के तापमान में स्‍टोर करने की जरूरत होगी। लेकिन इन देशों में इसको इस तरह से स्‍टोर करने की जरूरी सुविधा ही नहीं है। बिना कोल्‍ड स्‍टोरेज की सुविधा के इस वैक्‍सीन को इन देशों में ट्रांसपोर्ट करना अपने आप में जोखिम भरा कदम होगा।

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कोविड-19 के खिलाफ 90 फीसद तक कारगर होने का दावा करने वाली फाइजर कंपनी की वैक्‍सीन भारत के लिए कितनी उपयोगी है? इस सवाल का जवाब दरअसल इसके रख रखाव से जुड़ा है जो वर्तमान में काफी दिखाई दे रहा है।

आपको यहां पर ये भी बता दें यूनिसेफ अगले वर्ष तक करीब एक अरब वैक्‍सीन और इससे जुड़ी चीजों के रख-रखाव के लिए खुद को तैयार कर रहा है। यूनिसेफ की तरफ से कुछ समय पहले ये बात कही गई थी कि कोविड-19 की वैक्‍सीन सामने आने के बाद इसको दूसरे देशों में भेजने के लिए ये तैयारी की जा रही है। इसके लिए जरूरी चीजों की भी खरीद की जा रही है। वैश्विक स्‍तर पर इस काम को जल्‍द अंजाम दिया जा सके, इसके लिए संगठन कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है। इसके बाद भी डब्‍ल्‍यूएचओ के क्षेत्रीय कार्यालय ने जिस बात की आशंका जताई है उसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

भारत में एम्स के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया भी इस बारे में अपनी चिंता जगजाहिर कर चुके हैं। उनका कहना है कि भारत जैसे देशों में इस तरह से दवा का रखरखाव ग्रामीण इलाकों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। दिल्‍ली स्थित भगवान महावीर वर्धमान मेडिकल कॉलेज में कम्‍यूनिटी मेडिसिन के डायरेक्‍टर प्रोफेसर और एचओडी डॉक्‍टर जुगल किशोर भी मानते हैं कि भारत जैसे किसी भी देश के लिए इस वैक्‍सीन को लेकर बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। उनका कहना है कि इस वैक्‍सीन को लेने से पहले भारत को इसके रखरखाव से जुड़ी चीजें और इक्‍यूपमेंट खरीदने या विकसित करने होंगे। इसके लिए बड़े पैमाने पर घरेलू स्‍तर पर कवायद करनी होगी जो काफी वक्‍त ले सकती है। ऐसे में यदि इस वैक्‍सीन को माइनस 70 डिग्री के तापमान में रखने के लिए बाहर से उपकरणों को मंगाया जाएगा तो ये काफी खर्चीला होग। ये इसलिए भी मुश्किल होगा क्‍योंकि कोविड-19 की वजह से देश की अर्थव्‍यवस्‍था गिरावट के दौर में है। इसलिए सरकार के लिए भी ये काफी मुश्किल होगा।

प्रोफेसर जुगल किशोर के मुताबिक भारत में कई बीमारियों की वैक्‍सीन को माइनस 20 डिग्री के तापमान पर रखा जाता है। यदि भारत फाइजर की दवा को लेने का रिस्‍क लेता भी है तो ये देखना होगा कि सामान्‍य तापमान पर ये वैक्‍सीन कितने घंटे तक सही रह सकती है। भारत में इस्‍तेमाल होने वाली कुछ वैक्‍सीन 4-6 घंटे तक इस्‍तेमाल की जा सकती हैं। फाइजर की वैक्‍सीन के लिए भारत को कई स्‍तर पर बड़े पैमाने पर काम करना होगा। भारत में कोविड-19 की वैक्‍सीन के ट्रायल से संबंधित सवाल पूछे जाने पर उन्‍होंने बताया कि ये फिलहाल तीसरे चरण में पहुंच चुका है। माना जा रहा है कि मार्च 2021 तक भारत में वैक्‍सीन सामने आ जाएगी।

 

 

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