कैसे होगी एक परीक्षा जबकि नीट-पीजी और एमबीबीएस का पैटर्न अलग-अलग

[object Promise]

केंद्र सरकार की ओर से लाए जा रहे नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक में एमबीबीएस के चौथे वर्ष में प्रस्तावित कॉमन टेस्ट नेक्स्ट की व्यवहार्यता पर ही विशेषज्ञ सवालिया निशान लगा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एमबीबीएस की परीक्षा और नीट-पीजी के पैटर्न बिल्कुल अलग-अलग हैं। दोनों को किसी एक परीक्षा में समाहित किया ही नहीं जा सकता।

केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सेवा में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि स्वास्थ्य मंत्रालय पर एक एक्जिट टेस्ट लाने का दबाव था। मंत्रालय छात्रों को दो परीक्षा कराके नाराज भी नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने एमबीबीएस के चौथे वर्ष की परीक्षा को ही एक्जिट टेस्ट और नीट-पीजी की जगह करने का प्रस्ताव तैयार कर दिया। इसे ही नेक्स्ट का नाम दिया गया है। लेकिन इस पर गौर ही नहीं किया कि एमबीबीएस की चौथे साल की परीक्षा और नीट-पीजी दोनों बिल्कुल अलग हैं। एमबीबीएस की चौथे साल की परीक्षा में आधे अंक प्रैक्टिकल के होते हैं।

इस प्रैक्टिकल में छात्रों को मरीज दिया जाता है और पर्यवेक्षक के सामने उसे मरीज का इलाज करना होता है। आधे अंकों के लिए विवरणात्मक लिखित परीक्षा देनी होती है। वहीं, नीट-पीजी में पूछे जाते हैं बहुविकल्पीय सवाल पूछे जाते हैं। दोनों परीक्षाओं के पैटर्न अलग हैं। ऐसे में इन दोनों परीक्षाओं को कैसे मिलाया जा सकता है।

विशेषज्ञ बोले, एमबीबीएस व नीट-पीजी का पैटर्न अलग, मिलाकर एक परीक्षा कैसे होगी
1. क्या नेक्स्ट बहुविकल्पीय होगा? ऐसा हुआ तो एमबीबीएस अकेला ऐसा कोर्स होना जहां फाइनल परीक्षा बहुविकल्पीय होगी?
2. मेडिकल कॉलेजों में प्रैक्टिकल में पक्षपात आम माना जाता है। आरक्षित वर्ग के छात्र इसके शिकार होते हैं। कैसे रोका जाएगा?
3. जिन्हें पीजी में दाखिला नहीं मिला क्या वे दोबारा नेक्स्ट दे सकेंगे? हां, तो उनके लिए प्रैक्टिकल कौन लेगा? क्योंकि अब वे किसी कॉलेज के छात्र नहीं हैं?

सवाल यह भी- कहां से आएंगे मरीज
एक साथ 70 हजार या इससे अधिक छात्रों को प्रैक्टिकल के लिए बीमार मरीज कहां से देंगे? यदि छात्रों को अलग बीमारी वाले मरीज मिले तो गंभीर बीमारी वाले मरीज पर प्रैक्टिकल करने वाले छात्र के अंक कट सकते हैं। ऐसा अब भी होता है, पर इससे पीजी की संभावना पर असर नहीं पड़ता।

आईजीआईएमएस पटना के प्रोफेसर एमिरिटस और एम्स नई दिल्ली के पूर्व निदेशक डॉ. रमेश सी. डेका ने कहा, “नेक्स्ट गैर-जरूरी और अव्यवहारिक है। एमबीबीएस परीक्षा में देखा जाता है कि क्या छात्र मरीजों का इलाज कर सकता है। इस व्यवस्था ने हमें बेहतरीन डॉक्टर दिए हैं। गड़बड़ी एमसीआई में थी तो उसमें सुधार करते।”

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *