कुशीनगर में लौह पुरुष सरदार पटेल की जयन्ती पर लिया गया राष्ट्रीय एकता व अखण्डता का संकल्प

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पडरौना,कुशीनगर : आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल  की 145वीं जयंती शनिवार को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप मे मनाई गई। जिलाधिकारी भूपेंद्र एस चौधरी ने  सरदार पटेल के चित्र पर पुष्पहार अर्पित कर दीप प्रज्वलित किया और अधिकारियों व कर्मचारियों को राष्ट्रीय एकता व अखण्डता की शपथ  दिलायी। कलेक्ट्रेट सभागार मे जिलाधिकारी श्री चौधरी ने कहा कि हम सभी देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए स्वयं को समर्पित करे। डीएम ने लौह पुरुष सरदार पटेल की दूरदर्शिता एवं देश के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों को याद दिलाते हुए कहा कि सरदार जी का पूरा जीवन दर्शन हम सबके लिए प्रेरणास्रोत है जो सदैव अनुकरणीय रहेगा।
जिलाधिकारी ने राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर अवसर पर  देश की एकता एवं अखंडता को मजबूत के लिए अपना योगदान देने का आह्वान किया। इस दौरान अपर जिलाधिकारी विंध्यवासिनी राय, वरिष्ठ कोषाधिकारी रईस अहमद,, ए0ओ0 ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव,नाजिर कलेक्ट्रेट सहित आपदा विशेषज्ञ रवि कुमार राय सहित अन्य अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित रहे।
वर्ष 2014 से राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाई जाती है पटेल की जयंती
गौरतलब है वर्ष 2014 मे पहली बार भारत सरकार ने सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्मदिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप मे मनाने की मान्यता दी। इसके पीछे वजह यह है कि भारत को आजादी मिलने के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पूरे राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पेशे से वकील सरदार पटेल ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें खासतौर पर खेड़ा सत्याग्रह के लिए जाना जाता है। सरदार पटेल आजादी के बाद देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री भी थे।
562 रियासतो मे बटे भारत को एक राष्ट्र बनाया
सरदार वल्लभ भाई पटेल 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में जन्मे थे। तकरीबन 562 रियासतों में बंटे भारत को एक राष्ट्र बनाने के लिए सरदार पटेल ने काफी पसीना बहाया। उन्होंने जूनागढ़ और हैदराबाद जैसे विवादित रियासत को भी अपनी चतुराई और कूटनीतिक कौशल से भारत में मिला दिया था। इसी वजह से महात्मा गांधी ने उन्हें लौहपुरुष की उपाधि प्रदान की थी।
1991 मे पटेल को भारत रत्न से नवाजा गया
कहना न होगा कि सरदार पटेल को 1991 में भारत का सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से नवाजा गया। वर्ष 1950 के 15 दिसंबर को लौहपुरुष का मुंबई में निधन हो गया। सरदार पटेल महात्मा गांधी के सबसे बड़े समर्थकों में गिने जाते हैं। उनके जीवन में गांधी के दर्शन का काफी प्रभाव था।
साहसी और कर्तव्यनिष्ठ थे पटेल
31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में किसान झबेरभाई और धर्मपरायण माता लाड़बाई के परिवार में जन्मे सरदार वल्लभ भाई पटेल बचपन से ही साहसी थे। उनकी वीरता का सबसे पहला किस्सा बचपन में देखा गया, जब उन्हें फोड़ा हो गया। माता-पिता ने उसका खूब इलाज करवाया, लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। इस पर एक वैद्यजी ने सलाह दी कि इस फोड़े को अगर लोहे की गर्म सलाख से दाग दिया जाए, तो इसके विषाणु जलकर मर जाएंगे और गल चुकी त्वचा भी जल जाएगी। इससे फोड़ा ठीक हो जाएगा।किंतु प्रश्न यह खड़ा हुआ कि छोटे बच्चे कोगर्म सलाख से दागे कौन? पिता-माता की तो हिम्मत ही नहीं हुई, वैद्यजी भी सहम गए। तब बालक वल्लभ भाई ने खुद ही गर्म सलाख अपने हाथ में ली और फोड़े वाली जगह पर दाग दी। इससे फोड़ा फूट गया और कुछ दिनों में ठीक हो गया। वही जब पटेल बैरिस्टर बनने के बाद वकालत कर रहे थे। एक दिन वे न्यायाधीश के सामने किसी मामले में जोरदार पैरवी कर रहे थे। तभी उनके लिए एक टेलीग्राफ मिला, जिसे उन्होंने पढ़कर जेब रख लिया और बहस करते रहे। पैरवी खत्म होने पर ही वे घर के लिए निकले। बाद में पता चला कि टेलीग्राफ में उनकी पत्नी के निधन की सूचना थी। किंतु सरदार ने पहले अपने कार्य-धर्म का पालन किया, फिर अपने जीवन-धर्म का।

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