नयी दिल्ली। चीन की महत्वाकांक्षी वन बेल्ट, वन रोड परियोजनाओं से जुड़ा विवाद जारी रहने के बीच भारत दो दिवसीय आसियान-भारत कनेक्टिविटी शिखर सम्मेलन का आयोजन कर रहा है जिससे भारत की एक्ट ईस्ट नीति को नयी ताकत मिलेगी। यह शिखर सम्मेलन 11 और 12 तारीख को आयोजित हो रहा है जिसमें वियतनाम, कंबोडिया समेत 10 आसियान देश भी शामिल होंगे। जापान एक अकेला देश होगा जो इसमें अलग से हिस्सा लेगा।
सम्मेलन के दौरान भारत और एशियाई देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करने और औद्योगिक संबंध जैसे मुद्दों पर बात होगी। इसका खासा जोर कनेक्टिविटी को मजबूत बनाने पर होगा। विदेश मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिखर सम्मेलन का विषय ‘‘21वीं सदी में एशिया में डिजिटल एवं भौतिक सम्पर्क बढ़ाने की पहल’’ है। इसमें सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग, पोत परिवहन और जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी, संचार मंत्री मनोज सिन्हा, विदेश राज्य मंत्री वी के सिन्हा और एम जे अकबर और विदेश मंत्रालय की सचिव (पूर्व) प्रीति सरन हिस्सा लेंगी।
आसियान से वियतनाम के उप सूचना एवं संचार मंत्री पी ताम, कंबोडिया के लोकनिर्माण एवं परिवहन राज्य मंत्री टी चानकोसल हिस्सा लेंगे। मंत्रालय ने बयान में कहा गया है कि एआईसीएस सरकार के नीति निर्धारकों, वरिष्ठ अधिकारियों, निवेशकों, उद्योगपतियों और व्यापार संगठनों के प्रतिनिधियों और उद्यमियों को एक ही मंच पर लाएगा। जापान ने 5 दिसंबर को भारत के साथ एक्ट ईस्ट फोरम का उद्घाटन किया। इसमें जापान की अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जीका) और जापान के विदेश व्यापार संगठन (जेट्रो) द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया। इसका उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में जापान के साथ सहयोग आधारभूत ढांचा और कनेक्टिविटी बढ़ाना है।
भारत में जापानी राजदूत केंजी हिरामात्सु ने हाल ही में कहा है कि एक्ट ईस्ट फोरम का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत में जापान के साथ मिलकर विकास कार्यों को गति देना है। आसियान-इंडिया कनेक्टिविटी समिट भारत और जापान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे चीन के ओबोर परियोजना के जवाब के रूप में देखा जा रहा हैं। ऐसी रिपोर्ट है कि ओबोर के जरिए चीन उन देशों को कर्ज में दबा सकता है, जहां से होकर यह गलियारा निकलेगा या फिर निवेश परियोजनाएं लगेंगी।
बहरहाल, चीन की वन बेल्ट, वन रोड पहल की पृष्ठभूमि में ईरान, रूस, भारत के समन्वय वाले बहुपक्षीय परिवहन कार्यक्रम अन्तरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कोरिडोर (आईएनएसटीसी) का महत्व काफी बढ़ गया है। ये परियोजना हिन्द महासागर और फारस की खाड़ी को ईरान के जरिये कैस्पियन सागर से जोड़ेगी और फिर रूस से होते हुए उत्तरी यूरोप तक पहुंच बनाएगी।
विदेश मामलों के विशेषज्ञ ए सतोब्दन ने कहा कि एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि अन्तरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कोरिडोर (आईएनएसटीसी) के अमल में आने पर माल को पहुंचाने के समय और लागत में 30 से 40 प्रतिशत की कमी आयेगी। इस परियोजना में ईरान के चाबहार बंदरगाह की महत्वपूर्ण भूमिका होगी जिसका विकास भारत के सहयोग से होने जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि हमें चाबहार बंदरगाह का सर्वश्रेष्ठ उपयोग करना चाहिए जो हमारे लिए सम्पूर्ण मध्य एशिया के द्वार खोल देगा।
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