अलाउद्दीन खिलजी को सिर्फ खलनायक मानना भी गलत है

अलाउद्दीन खिलजी को सिर्फ खलनायक मानना भी गलत है

 

 

इतिहास को कभी काले और सफेद में नहीं बांटा जा सकता है. उसमें हर किरदार के कई ऐसे रंग होते हैं जो एक दूसरे से बिलकुल अलग होते हैं. अभी विवादों में चल रहे अलाउद्दीन खिलजी भी इतिहास में एक ऐसा ही नाम है. इसमें कोई शक नहीं एक शासक के तौर पर खिलजी ने क्रूरता के नए मानक बनाए. मगर सल्तनत काल के हर सफल सुल्तान ने लौह और रक्त की नीति ही अपनाई. जिसने नहीं अपनाई वो शासन नहीं कर पाया.

अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी की हत्या कर गद्दी पाई थी. इसके अलावा सुल्तान बनते ही उसने सबसे पहले मुल्तान पर हमला किया और उसके सुल्तान, उसके पूरे परिवार, सारे ताकतवर अमीरों को जड़ से खत्म कर दिया. एक के बाद एक हमले कर रहे अलाउद्दीन खिलजी के लिए एक सशक्त सेना और संतुष्ट जनता रखना सबसे बड़ी जरूरत थी. इसके चलते उसने ऐसे कई सुधार किए जो अर्थव्यवस्था और सेना के लिए आज भी उदाहरण माने जाते हैं.

शासन, सेना और बाजार प्रणाली
इतिहासकार बरनी के अनुसार अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए सबसे पहले खिलजी ने ही धर्म और शासन को अलग किया. उसने सेना और दरबार के पदों में सबसे पहले खानदान नहीं योग्यता के आधार पर लोगों को रखा.खिलजी ऐसा शासक था जिसने बाजार प्रणाली को कड़ाई से नियंत्रित किया और महंगाई को लंबे समय तक बढ़ने नहीं दिया. खिलजी की बनाई हुई मंडियों में अनाज तौलने के निश्चित बांट होते थे जिनकी हर साल जांच होती थी. मुनाफे की दर तय थी. मिलावट करने वालों को कड़ी सजा दी जाती थी. ये प्रणाली आज भी चल रही है.

खिलजी की सेना में सैनिकों का हुलिया लिखकर रखा जाता था. इसके साथ ही सेना के घोड़ों को दाग कर निशान लगाया जाता था. उससे पहले सैनिक अच्छी नस्ल के घोड़े सेना के अस्तबल से ले जाते और खराब घोड़े जमा करवा देते थे.

खिलजी पहला शासक था जिसने स्थाई सेना सालाना तन्ख्वाह पर रखी. इसके अलावा वो जीतने पर लूटे गए खजाने का भी एक निश्चित हिस्सा भी सैनिकों को देता था.

राशनिंग और डाक व्यवस्था के लिए मशहूर अलाउद्दीन खिलजी को दिल्ली के सीरी फोर्ट के लिए भी जाना जाता है. 1316 को ड्रॉप्सी, जलोदर के चलते खिलजी की मौत हो गई. खिलजी के करीबी माने जाने वाले मलिक काफूर ने इसके बाद गद्दी पर कब्जा कर लिया.

राजनीति में इतिहास का इस्तेमाल खतरनाक
कई इतिहासकार मानते हैं कि काफूर ने ही खिलजी को धीमा जहर दिया था. काफूर ने इसके बाद खिलजी के पूरे खानदान को खत्म करना शुरू किया. 36 दिन तक बादशाह रहे काफूर ने आदेश दिया कि शहजादों की आंखें तरबूज की तरह चीर कर निकालीं जाए. खिलजी के बेटों में एक मुबारक खिलजी इस बीच बच निकला. उसने अपने पिता के वफादार सैनिकों की मदद से सोते समय मलिक काफूर की गर्दन काट दी.

हमारे देश के इतिहास में सिर्फ रक्तपात के लिए ही आम लोगों के मानस में बसे खिलजी की खूबियां कम ही लोगों को याद होंगी. मुल्क हजारों सालों में बनते हैं. लेकिन जब इतिहास का इस्तेमाल राजनीति के लिए होता है तो शासकों और बादशाहों की सिर्फ गढ़ी हुई तस्वीरें ही याद रह जाती हैं.

(फर्स्टपोस्ट के लिए अनिमेष मुखर्जी)

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