क्या आपको पता है कि भारत के विभाजन के पीछे की असली कहानी क्या है? एक ऐसी कहानी जो सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि लाखों लोगों की ज़िंदगियों में उतरी है? एक ऐसा इतिहास जो आज भी हमारे ज़हन में ताज़ा है! सोनी लिव का नया शो, “फ्रीडम एट मिडनाईट”, आपको ले जाएगा उस दौर में, जहाँ भारत के भाग्य का फैसला हुआ, जहाँ एक राष्ट्र दो राष्ट्रों में बँट गया! एक अद्भुत सफ़र जो आपको हिलाकर रख देगा!
महात्मा गांधी से लेकर माउंटबेटन तक: एक ऐतिहासिक सफ़र
1946 की कलकत्ता से शुरू होने वाली इस कहानी में, आप देखेंगे भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के दृढ़ संकल्प को, कैसे उन्होंने भारत के बँटवारे का विरोध किया। “मेरे शरीर का बँटवारा होने से पहले हिन्दुस्तान का बँटवारा होगा,” गांधी का ये कथन आपको विभाजन की पीड़ा का एहसास दिलाएगा। शो में आपको दिखाया जाएगा कि कैसे मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग एक अलग मुल्क के लिए लड़ रहे थे। नफ़रत और हिंसा का माहौल, कैसे देश के कोने-कोने में फैला हुआ था – नोआखाली से लेकर रावलपिंडी तक, हज़ारों लोग मारे गए।
नेहरू, पटेल और उनकी भूमिका
जवाहर लाल नेहरू, गांधी के मार्गदर्शन में स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे, और धीरे-धीरे वे गांधी जी के साथ-साथ विरोधी भी बन गए। सरदार पटेल का किरदार, जैसा कि “फ्रीडम एट मिडनाईट” में दिखाया गया है, आपको हैरान कर सकता है। आज के समय में सोशल मीडिया पर चलने वाले नेहरू विरोधी विचारों के विपरीत, शो में नेहरू और पटेल की आपसी बॉन्डिंग दर्शायी गयी है। दोनों महान नेता स्वतंत्रता और विभाजन के मुद्दों पर एक साथ कैसे खड़े थे, ये जानकर आप चौंक जाएँगे!
ब्रिटिश हुकूमत और उसका रोल
लॉर्ड माउंटबेटन की भूमिका, और उनकी पत्नी एडविना माउंटबेटन का इसमें क्या योगदान था, ये भी शो का एक अहम हिस्सा है। ब्रिटिश हुकूमत के जाने के समय क्या चल रहा था, भारत को क्या-क्या विरासत में मिली, यह जानना आपके लिए काफ़ी दिलचस्प रहेगा!
‘फ्रीडम एट मिडनाईट’: क्या ये शो वाकई सफल है?
“फ्रीडम एट मिडनाईट” का स्क्रीनप्ले किसी भी किसी को हीरो या विलेन बनाने की जल्दबाजी में नहीं दिखता है। शो में सरदार पटेल का किरदार, “उंगली काटना बेहतर है हाथ को बचाने के लिए” जैसा तर्क देते हुए भारतीय राजनीति पर एक नया प्रकाश डालता है। यह एक सीन अकेले किसी की समझ से परे हो सकता है, लेकिन यही “फ्रीडम एट मिडनाईट” की ताक़त है: शो की सफलता इसी में निहित है कि यह इतिहास के महत्वपूर्ण लोगों के विचारों को उनकी संपूर्णता में दिखाने की कोशिश करता है।
किरदार और उनकी कहानी
मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग शो में मुख्य विरोधी हैं। जिन्ना का किरदार उनके ऐतिहासिक वर्णन के अनुसार है। वो एक ऐसा व्यक्ति था जिसने अपने अहंकार में करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी। 1946 से 1947 के बीच भारत के भाग्य का कैसे फैसला लिया गया और उन कारणों को दर्शाया गया है जो इस विभीषिका की जड़ में थे। फ्लैशबैक दृश्यों से आपको उन खास घटनाओं की भी जानकारी मिलेगी जिसने इतिहास को बदल दिया। भाषा का उपयोग बहुत स्वाभाविक है – किरदारों हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, पंजाबी जैसी कई भाषाएँ बोले जाते हैं।
शो की कमियाँ
शो में महिला पात्रों को पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया है। सरोजिनी नायडू, फातिमा जिन्ना और एडविना माउंटबेटन के किरदार गहराई से नहीं दिखाए गए हैं। शो में कभी-कभी बताने की अदा दिखती है। पहले तीन एपिसोड थोड़े धीमे हैं, पर शो जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, वह और दिलचस्प होता जाता है। कहीं-कहीं छोटी-छोटी कंटिन्यूटी की कमियां भी दिखती हैं।
एक्टिंग और डायरेक्शन
आरिफ ज़कारिया (जिन्ना), चिराग वोहरा (गांधी), राजेंद्र चावला (पटेल), ल्यूक मैकगिब्नी (लॉर्ड माउंटबेटन), और राजेश कुमार ( लियाकत अली खान) और सिद्धांत गुप्ता (नेहरू) जैसी प्रतिभाशाली कलाकारों ने अपनी बेहतरीन एक्टिंग से शो की शान बढ़ा दी है। निखिल अडवाणी के निर्देशन में मुख्यधारा बॉलीवुड का अंदाज़ नज़र आता है, लेकिन उन्होंने विवरणों पर ध्यान देना भी नहीं भूला है। शो में प्रोस्थेटिक मेकअप भी बढ़िया है, लेकिन कुछ कमियाँ भी है जो नज़रअंदाज़ की जा सकती है।
Take Away Points
“फ्रीडम एट मिडनाईट” भारतीय इतिहास के एक बहुत ही दर्दनाक अध्याय को दिलचस्प पॉलिटिकल थ्रिलर की तरह दिखाता है। कमियों के बावजूद, शो गांधी, नेहरू, पटेल, और जिन्ना के बारे में ज़्यादा जानने की उत्सुकता जगाता है। यह एक ऐसा शो है जो आपको सोचने पर मजबूर कर देता है।

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