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  • देवलथल में सक्रिय गुलदार को वन विभाग ने घोषित किया आदमखोर

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    पिथौरागढ़ : देवलथल, कनालीछीना क्षेत्र में सक्रिय गुलदार को वन विभाग ने आदमखोर घोषित कर दिया है। गुलदार को मारने के लिए शिकारी भी नियुक्त किए गए हैं। शिकारियों के रविवार तक पहुंचने की संभावना है।

    देवलथल क्षेत्र में विगत तीन माह से आदमखोर गुलदार का आतंक बना हुआ है। गुलदार ने अब तक चार महिलाओं को अपना शिकार बना लिया है। तीन  को घायल कर चुका है। तीन दिन पूर्व देवलथल और कनालीछीना के मध्य स्थित कापड़ी गांव में एक महिला कलावती देवी को गुलदार घर के आंगन से ही उठा कर ले गया। इससे पूर्व रसियापाटा, रिण क्षेत्र में तीन महिलाएं गुलदार का शिकार बनी थीं। वन विभाग ने तब भी गुलदार को आदमखोर घोषित कर शिकारी तैनात किया। शिकारी द्वारा एक गुलदार को मार गिराया।

    इधर, तीन दिन पूर्व कापड़ी गांव में महिला को एक गुलदार ने फिर शिकार बनाया। इसके साथ ही गुलदार को आदमखोर घोषित कर मारने की मांग तेज हो गई है। वन रेंजर डीडीहाट पूरन सिंह देऊपा  ने बताया कि गुलदार को आदमखोर घोषित कर मारने के आदेश जारी हो चुके हैं। यह जानकारी उप प्रभागीय वनाधिकारी नवीन पंत ने दी है। रेंजर ने बताया कि इस समय वन विभाग की टीम क्षेत्र में गश्त लगा रही है। कापड़ी गांव में पिंजरा लगाया गया है। रविवार या सोमवार को शिकारियों के पहुंचने की संभावना है।

  • कुंभ की व्यवस्थाएं सचिव जिला विधिक प्राधिकरण ने परखीं, दिए ये निर्देश

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    ऋषिकेश।महाकुंभ के तहत होने वाले स्नान से पहले त्रिवेणी घाट क्षेत्र में व्यवस्थाओं को परखने के लिए सचिव जिला विधिक प्राधिकरण देहरादून नेहा कुशवाह त्रिवेणी घाट पहुंची। यहां सिंचाई विभाग ने घाट के मरम्मत के कार्य को अभी तक पूरा नहीं किया गया है। इस पर उन्होंने अधिकारियों को 25 फरवरी तक कार्य पूरा करने के निर्देश दिए।

    उच्च न्यायालय नैनीताल ने कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर स्वास्थ्य विभाग द्वारा की जा रही कार्यवाही और कुंभ के दौरान कोविड-19 की गाइडलाइन के अनुपालन को लेकर सचिव जिला विधिक प्राधिकरण को निगरानी समिति का सदस्य बनाया है। सोमवार को सचिव विधिक प्राधिकरण नेहा कुशवाहा त्रिवेणी घाट पहुंची। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था सहित यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं को लेकर मौके का व्यापक निरीक्षण किया।

    यहां वर्तमान में सिंचाई विभाग त्रिवेणी घाट की मरम्मत का कार्य कर रहा है। यह कार्य अभी भी जारी है, जिससे श्रद्धालुओं को स्नान के रोज परेशानी उठानी पड़ सकती है। त्रिवेणी घाट पर जगह-जगह फैली निर्माण सामग्री और अभी तक जारी कार्य पर सचिव विधिक प्राधिकरण ने नाखुशी जताई। उन्होंने सिंचाई विभाग के अधिकारियों को निर्देशित किया कि जल्द से जल्द इस काम को पूरा कर लिया जाए। अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि 25 फरवरी तक इस कार्य को समाप्त कर लिया जाएगा। सचिव नेहा कुशवाहा ने बताया कि 11 मार्च महाशिवरात्रि को भी स्नान के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचेंगे। इस बात को हमें नजरअंदाज नहीं करना है।

    उन्होंने कहा कि भीड़ को देखते हुए यहां पर्याप्त सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया गया है। भीड़ को देखते हुए कोविड की गाइडलाइन का हर हालत में अनुपालन कराया जाएगा। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम को निर्देशित किया जा रहा है। पुलिस और नगर निगम की टीम भी मास्क व शारीरिक दूरी का पालन सुनिश्चित कराने के लिए टीम की तैनाती करेगी। इस मौके पर सहायक नगर आयुक्त विनोद लाल, घाट चौकी प्रभारी उत्तम रमोला आदि मौजूद रहे।

  • दोपहर को गोपेश्वर हुईं रवाना, दो घंटे तक महावतार की गुफा में ध्यानमग्न रहीं साध्वी उमा भारती

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    द्वाराहाट (अल्मोड़ा) : पूर्व केंद्रीय जल संसाधन मंत्री व मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती द्रोणगिरि पर्वतमाला की नैसर्गिकता व आध्यात्मिक इतिहास से इस कदर अभिभूत हुईं कि इन वादियों में ध्यान लगाने के लिए अपने लिए एक कुटिया भी बनाने की चाहत बयां कर गईं। इससे पूर्व पांडवखोली स्थित महावतार गुफा में करीब दो घंटे का ध्यान लगाया। गुरुवार अपराह्न वह गोपेश्वर के लिए रवाना हो गईं।

    द्रोणगिरि पर्वत मालाओं से साध्वी उमा भारती का पहले से ही गहरा लगांव रहा है। गोपनीय दौरे में वह एकाधिक बार पहले भी आ चुकी हैं। बुधवार को प्रसिद्ध वैष्णवी शक्तिपीठ दूनागिरि (द्रोणगिरि) के दर्शन कर वहा ध्यान लगाने के बाद वह सड़क किनारे पैदल भी घूमीं। दो बार तो वह कुकुछीना स्थित जोशी आवास पुहंची। भरतकोट, पांडवखोली, हनुमान गढ़ी आदि अध्यात्म से लबरेज स्थलों की जानकारी ली। गुरुवार को कुकुछीना से करीब तीन किमी दूर  महावतार बाबा की गुफा भी पहुंची। करीब दो घंटे ध्यान मुद्रा में रह वापस लौट कुमाऊं मंडल विकास निगम विश्राम गृह में भोजन लेकर आराम किया और गोपेश्वर की ओर रवाना हो गईं।

    ग्रामीणों से ली कई जानकारियां

    महावतार गुफा की ओर जाते तथा वापस लौटते समय राह में मिले लोगों विशेषकर महिलाओं से उनकी आजीविका, रहन सहन, शिक्षा आदि के विषय में भी साध्वी उमा भारती ने जानकारी प्राप्त की। पहाड़ की महिलाओं के हाड़तोड़ मेहनत की खूब प्रशंसा की। उनसे शीघ्र क्षेत्र में फिर आने की बात दोहराई। २०१७ के अपने प्रवास के दौरान उन्होंने क्षेत्र में पेयजल योजना बनाने का आश्वासन दिया। पानी की परेशानी सामने आते ही कहा कि जल संसाधन मंत्री रहते कुछ तकनीकी कमियां आड़े आई थीं। मामला उनके संज्ञान में है, प्रयास किए जाएंगे।

  • झारखंड: यहां प्रशासन-अदालत का नहीं चलेगा कानून, HC और विधानसभा में पत्‍थलगड़ी करने पर अड़े आदिवासी

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    पत्‍थलगड़ी समर्थकों की दलील है कि अनुसूचित क्षेत्रों में न किसी अदालत का फैसला चलेगा न राज्‍य सरकार का कार्यकारी आदेश। यहां सामान्‍य लोगों के लिए भी कोई अधिकार नहीं है। यानी उन इलाकों में सामान्‍य आदमी को भ्रमण के लिए भी अनुमति लेनी होगी। पत्‍थलगड़ी समर्थक जो शिलालेख लेकर घूम रहे हैं उसमें भारत सरकार के 2007 के गजट और संविधान की पांचवीं, छठी अनुसूची का हवाला है। आंदोलनकारी मानते हैं कि इन जिलों में हमारा कानून लेगा। पहड़ा, मानकी परगनैत और ग्राम सभा जैसे आदिवासी स्‍वशासन व्‍यवस्‍था से। जानकार मानते हैं कि टानाभगतों को आगे कर कोई खेल कर रहा है। पुराने पत्रकार और न्‍यूजविंग के संपादक शंभू चौधरी मानते हैं कि संविधान के विश्‍लेषण में कहीं न कहीं लोचा है। सरकार को पहल करने, संविधान विशेषज्ञ के साथ आंदोलनकारियों से बात कर रास्‍ता निकलना चाहिए।

    आदिवासियों की सभ्‍यता, संस्‍कृति का हिस्‍सा
    पत्‍थलगड़ी आदिवासियों की प्राचीन परंपरा, संस्‍कृति का हिस्‍सा है। विशेषकर मुंडा प्रजाति में। जानकार बताते हैं कि मुंडाओं में करीब चालीस प्रकार की पत्‍थलगड़ी होती है। इसका मूल मकसद किसी घटना को न केवल स्‍मारक या यागार के रूप में संजोकर रखना बल्कि अपने जीवन शैली का भी परिचायक है। जैसे ” ससन दिरी” परंपरा। अगर किसी अपने पूर्वज की याद में पत्‍थल को गाड़ा जाता है जो उसकी आत्‍मा को घर में स्‍थान और सम्‍मान देने का प्रतीक है। ” सीमान दिरी ” एक प्रकारकी पत्‍थलगड़ी है जो गांव की सीमा को दर्शाता है। अखड़ा दिरी, अखड़ा में गाड़ा जाता है जिसका मकसद शिक्षा देने के लिए होता है। आदिवासी जल, जंगल और जमीन से किसी प्रकार का समझौता नहीं चाहते। उनका मानना है शासन में आये लोगों ने उनके हितों की अनदेखी की है। उनकी थाती को किसी न किसी नाम पर हड़पा है। अनुसूचित क्षेत्र को सरकार भी एक सीमा तक मानती है उन इलाकों में पंचायत चुनाव नहीं होते हैं।

    पत्‍थलगड़ी का एक चेहरा यह भी

    मगर इसी पत्‍थलगड़ी की आड़ में अफीम के सौदागर नाजायज फायदा उठाते रहे हैं। खासकर खूंटी जैसे इलाके में पत्‍थलगड़ी के नाम पर पुलिस प्रशासन और आम लोगों का प्रवेश वर्जित कर माओवादी, पीएलएफआइ से जुड़े लोग सुरक्षित तरीके से पोस्‍ता की खेती कर अफीम का धंधा करते हैं। भोले भाले आदिवासियों को परंपरा के नाम पर इस तरह नियंत्रित कर लेते हैं कि ग्राम सभा और स्‍वशासन के नाम पर केंद्र की मुफ्त गैस, बिजली जैसी योजनाओं को भी ग्रामीण नकार देते हैं। आंदोलन के क्रम में अनेक लोगों ने प्रधानमंत्री आवास, वोटर आई कार्ड, आधार कार्ड जैसे दस्‍तावेज, शौचालय, आवास वापस कर दिये। यहां तक कि सरकारी स्‍कूलों से बच्‍चों को हटा लिया। एक दिन पहले खूंटी जिला के खूंटी प्रखंड के हाबुईडीह, बोंगाबाद गांव ऐसे ही कोई 53 लोगों ने सरकारी व्‍यवस्‍था में आस्‍था जाहिर करते हुए वोटर कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड और दूसरे प्रमाण पत्र जैसे दस्‍तावेज वापस लिये।

    बंधक बने थे एसपी सहित डेढ़ सौ जवान

    बात 2017 की है तब खूंटी जिला मुख्‍यालय से कोई बीस किलोमीटर दूर कांकी-सिलादोन गांव के करीब ग्रामीणों ने एसपी, डीएसपी, मजिस्‍ट्रेट सहित पुलिस के कोई डेढ़ सौ जवानों को रातभर बंधक बनाये रखा था। दरअसल प्रशासन के लोग तक पत्‍थलगड़ी समर्थकों द्वारा लगाये गये शिलालेखों को हटाने गये थे। तब तत्‍कालीन डीजीपी को समझाने खुद जाना पड़ा था। दूसरे अधिकारियों की हिम्‍मत नहीं थी कि गांव में प्रवेश कर जायें। उन शिलालेखों पर संविधान की पांचवीं अनुसूची के हवाले सांसद, विधायक, किसी भी अधिकारी या बाहरी व्‍यक्ति के प्रवेश पर रोक का संदेश था। उस समय समानांतर मुद्रा चलाने की भी बात हो रही थी। इसी क्रम में आंदोलन का रूप विकृत हुआ तो रघुवर सरकार के समय में बड़ी संख्‍या में आंदोलनकारियों पर राष्‍ट्रद्रोह का मुकदमा चला। हेमन्‍त सोरेन से सत्‍ता संभालते ही कैबिनेट की पहली बैठक में ही उन मुकदमों को वापस लेने का एलान किया। बहरहाल पत्‍थलगड़ी का आंदोलन राजधानी पहुंच गया है, समय रहते इस पर काबू पाने की जरूरत है नहीं तो सरकार के लिए यह बड़ी समस्‍या बन सकता है।

  • एसएससी सदस्य पद की भर्ती में नाम खारिज करने को चुनौती, चर्चित आइएफएस संजीव चतुर्वेदी ने हाई कोर्ट में दायर की याचिका

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    नैनीताल : कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के सदस्य पद पर नियुक्ति मामले में चर्चित आइएफएस संजीव चतुर्वेदी का नाम खारिज करने का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने इस मामले में भारत सरकार, उत्तराखंड सरकार, कर्मचारी चयन आयोग, डाक विभाग के साथ ही एसएससी सदस्य पद पर चयनित अशोक कुमार को नोटिस जारी किया है। साथ ही चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

    आइएफएस संजीव ने याचिका दायर कर कहा है कि उनके दस्तावेजों में चार जगह पर हेरफेर किया गया है। सबसे गंभीर धोखाधड़ी उनकी जन्मतिथि को लेकर की गई है। उनकी जन्मतिथि 21 दिसंबर 1974 है। जबकि कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय व केंद्र के चयन किए गए अभिलेखों में 13 जुलाई 1962 या 57 साल सात माह दर्शाई गई है।

    दूसरा, आवेदन की अंतिम तिथि 23 मार्च 2020 थी। जिसके लिए उत्तराखंड सरकार ने उन्हें 19 मार्च 2020 को सहमति पत्र व अनापत्ति पत्र जारी कर केंद्र सरकार को भेज दिया था। पोस्ट ऑफिस के ट्रेकिंग रिपोर्ट के अनुसार यह पत्र 20 मार्च को 3:31 बजे डीओपीटी को प्राप्त हो गया। बावजूद इसके डीओपीटी ने चयन दस्तावेजों में पत्र की प्राप्ति 29 मई दिखाई है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएस चौहान व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने मामले को सुनने के बाद पक्षकारों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

    जरूरी थी पीजी डिग्री, पर शर्त को शिथिल कर दे दिया अनुमोदन

    याचिकाकर्ता संजीव के अनुसार एसएससी सदस्य पद के लिए पीजी डिग्री की योग्यता अनिवार्य थी। 1998 के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार पीजी एमएससी भारतीय वन सेवा की एमएससी फोरेस्ट्री के समतुल्य मानी गई है मगर डीओपीटी ने इस मामले में इसे नहीं माना। इस पद के लिए भारतीय रेल सेवा के अधिकारी रहे अशोक कुमार का चयन कर लिया गया। जबकि उनकी पीजी डिग्री पर भी विवाद है। उन्होंने पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त करने, सीबीआई जांच करने, चयन प्रक्रिया में शामिल अफसरों पर सीबीआई से मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।

  • टनल में टी प्वाइंट तक पहुंची टीम, अब एसएफटी में होगा रेस्क्यू

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    गोपेश्वर।  आखिरकार 19 दिन बाद रेस्क्यू टीम तपोवन स्थित विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना की मुख्य टनल के टी प्वाइंट तक पहुंच गई। अब यह टीम इससे जुड़ी सिल्ट फ्लशिंग टनल (एसएफटी) में रेस्क्यू चलाएगी। सात फरवरी को आई आपदा के दिन 34 कर्मचारी एसएफटी में काम करने गए थे, तबसे इनकी खोजबीन की जा रही है। मुख्य टनल से अब तक 14 शव बरामद हो चुके हैं। बाकी के एसएफटी के भीतर मलबे में दबे होने की आशंका है।

    सात फरवरी को आपदा के दिन से ही एनडीआरएफ की टीम मुख्य टनल से मलबा हटाने में जुटी है। 19 दिन बाद रेस्क्यू टीम 180 मीटर मलबा हटाकर टी प्वाइंट तक पहुंच गई है। हालांकि टनल के अंदर भारी मात्रा में पानी का रिसाव होने के कारण मलबा हटाने में दिक्कतें हो रही हैं। एनटीपीसी की ओर से 20 इंच के चार पंपों के जरिये पानी बाहर निकाला जा रहा है। मुख्य टनल के बाद अब एसएफटी में मलबा हटाने का काम किया जाना है। एनटीपीसी के महाप्रबंधक राजेंद्र प्रसाद अहरिवाल ने बताया कि एसएफटी का आकार छोटा होने के कारण भारी-भरकम मशीनों के बजाय अब छोटी मशीनों से मलबा हटाया जाएगा। इसके बाद 10 मीटर अंदर जाकर राहत-बचाव किया जाएगा

    विस्फोट से तोड़े जा रहे बोल्डर

    एनटीपीसी की परियोजना बैराज साइट पर मलबे को हटाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। यहां सैलाब के साथ भारी-भरकम बोल्डर आए हैं। इन बोल्डरों के नीचे मलबे में शवों की तलाश की जानी है। ऐसे में अब बोल्डरों को विस्फोट से तोड़ा जा रहा है। बोल्डरों को तोड़ने के बाद डायवर्जन साइट पर मलबे में लापता व्यक्तियों की तलाश की जाएगी।

    एक मानव अंग बरामद

    बुधवार देर शाम हेलंग के निकट एक मानव अंग बरामद हुआ। आपदा में अब तक 30 मानव अंग बरामद किए जा चुके हैं। जिलाधिकारी स्वाति एस भदौरिया ने बताया कि आपदा में लापता 205 व्यक्तियों में से 70 के शव मिल चुके हैं। अब तक 38 मृतकों के स्वजनों को मुआवजा राशि जारी की जा चुकी है।

    दो घंटे रोकना पड़ा रेस्क्यू

    मौसम विभाग की चेतावनी के बाद एनटीपीसी समेत रेस्क्यू टीम सजग होकर कार्य कर रही है। बीती शाम टनल से मलबा हटाने का काम दो घंटे तक रोका गया। तपोवन क्षेत्र में हल्की बारिश के बाद खतरे की आशंका देखते हुए रेस्क्यू रोका गया। हालांकि बारिश बंद होने के बाद नदी का जलस्तर सामान्य पाया गया।

    रेस्क्यू अपडेट

    कुल लापता,205

    शव बरामद,70

    मानव अंग बरामद,30

    अब तक शिनाख्त,41

    अब भी लापता,135

    डीएनए सैंपल,196

    आपदा प्रभावित ने एनटीपीसी के खिलाफ दी तहरीर

    तपोवन में जलविद्युत परियोजना की कार्यदायी संस्था एनटीपीसी पर कर्मचारियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न करते हुए उनके जान से खिलवाड़ का आरोप लगाते हुए कर्णप्रयाग थाने में तहरीर दी गई है। कर्णप्रयाग विकासखंड के कांचुला गांव निवासी आपदा प्रभावित दीपक ने तहरीर देकर कंपनी पर कर्मचारियों व श्रमिकों की जान से खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है।

  • आटोमेटेड टेस्टिंग लेन की डीपीआर तैयार कर रहा मंडी परिषद, स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा पुणे

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     देहरादून। उत्तराखंड में वाहनों की फिटनेस के लिए नौ वर्ष पूर्व स्वीकृत ऑटोमेटेड टेस्टिंग लेन के अभी अस्तित्व में आने में कुछ समय लगेगा। अभी उत्तराखंड मंडी परिषद की निर्माण शाखा इसकी डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर रही है। इसे स्वीकृति के लिए एआरआइ पुणे भेजा जाएगा। यहां से स्वीकृति मिलने के बाद केंद्र सरकार इनके निर्माण के लिए धनराशि जारी करेगी।

    प्रदेश में लगातार बढ़ रही सड़क दुर्घटनाओं के मद्देनजर वर्ष 2008 में एक सर्वे किया गया। इस सर्वे में यह बात सामने आई कि वाहनों की सही प्रकार से फिटनेस न होने के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में दुर्घटनाएं हो रही हैं। ऐसे में विभाग ने ऋषिकेश में ऑटोमेटेड टेस्टिंग लेन बनाने का निर्णय लिया। आटोमेटेड टेस्टिंग लेन में वाहनों की फिटनेस मशीनों द्वारा जांची जाती है। तत्कालीन सरकार ने भी इसे मंजूरी प्रदान करते हुए इसके लिए तीन करोड़ का प्रविधान किया। इसके बाद कभी भूमि चयन तो कभी चयनित भूमि में कानूनी अड़चनों के चलते टेस्टिंग लेन निर्माण कार्य लंबित होता चला गया।

    इसके बाद केंद्र ने मोटर टेस्टिंग लेन के लिए धनराशि जारी करनी शुरू की। इस पर उत्तराखंड ने भी इसे लेकर केंद्र में दस्तक दी। इस पर केंद्र ने प्रदेश से चार टेस्टिंग लेन बनाने का प्रस्ताव मांगा। परिवहन विभाग ने इसके लिए एक बड़ी और एक छोटी टेस्टिंग लेन हरिद्वार और एक बड़ी और एक छोटी लेन हल्द्वानी में बनाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा। एक जिले में 10.28 करोड़ की लागत से कुल 20.50 करोड़ के इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में मंजूरी प्रदान की। कहा गया कि इसमें से 16.50 करोड़ केंद्र सरकार और शेष राशि प्रदेश सरकार वहन करेगी।

    केंद्र ने निर्माण कार्यों का पैसा प्रदेश सरकार को और तकनीकी उपकरण लगाने का पैसा सीधे निर्माणदायी संस्था को देने का निर्णय लिया। इस क्रम में प्रदेश सरकार ने भी बजट में इसका प्रविधान किया। बीते वर्ष कोरोना के कारण यह मसला काफी लंबे समय तक फंसा रहा। अब मंडी परिषद इसकी डीपीआर तैयार करने में जुटी है।

  • लकड़ी टाल की सरकारी भूमि से वाहन संचालन की उठी मांग, यातायात सुचारु होने के साथ जाम से भी मिलेगी निजात

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    गरमपानी : अल्मोडा़ हल्द्वानी हाईवे पर खैरना बाजार क्षेत्र में जाम के निस्तारण को आसपास के गांवो के टैक्सी वाहनों कि पार्किंग लकड़ी टाल पर स्थानांतरित किए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि व्यवस्था दुरुस्त की गई तो काफी हद तक बाजार क्षेत्र को जाम से निजात मिल सकेगी।

    अल्मोड़ा हल्द्वानी हाईवे पर खैरना बाजार जाम की चपेट में है। सुबह से शाम तक कई बार जाम लगने से बाजार क्षेत्र में वाहनों की कतार लग जाती है। व्यापारियों के साथ ही पैदल आवाजाही करने वाले राहगीरों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।  स्कूली बच्चों पर दुर्घटना का खतरा मंडराता रहता है। कई बार जाम में आपातकालीन वाहन एंबुलेंस आदि भी फंस जाते हैं। जिससे मरीजों को भी परेशानी उठानी पड़ती है। क्षेत्रवासियों ने सीम, सिल्टोना, बारगल, कफुल्टा, सिमराड़, बजेडी़ आदि गांवों को जाने वाले वाहनों की पार्किंग लकड़ी टाल के समीप स्थित सरकारी भूमि पर स्थानांतरित किए जाने की मांग उठाई है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि  के वाहन लकडी़ टाल के समीप सरकारी भूमि से संचालित होंगे तो काफी हद तक चौराहे पर वाहनों का दबाव कम हो जाएगा साथ ही बार बार लगने वाले जाम से भी निजात मिल सकेगी। क्षेत्रवासियों ने प्रशासन से भी इस मामले में ठोस कदम उठाए जाने की मांग की है।

    लकड़ी टाल को किया जाए संगम पर स्थापित

    लकड़ी टाल को उत्तरवाहिनी शिप्रा व कोसी नदी के संगम तट पर स्थानांतरित करने को भी क्षेत्रवासी लांमबद होने लगे है। क्षेत्रवासी का कहना है कि आसपास के गांव के लोग शवदाह को खैरना स्थित संगम पर पहुंचते हैं पर संगम से लकडी टाल काफि दूर है। टाल से लकड़ी वाहन के माध्यम से संगम तक पहुंचाई जाती है जिससे पैसे की भी बर्बादी होती है साथ ही परेशानी भी उठानी पड़ती है। यदि टाल को शवदाह स्थल के निकट ही स्थानांतरित कर दिया जाए तो लोगों को सहूलियत होगी। व्यापारी नेता बिशन जंतवाल, पूरन लाल साह, महिपाल सिंह बिष्ट, दिनेश बिष्ट, गजेंद्र सिंह नेगी, प्रताप सिंह गौणी आदि ने टाल को संगम के समीप ही स्थापित की जाने की पुरजोर मांग उठाई है।

  • नीति हुई तय, वन भूमि लीज का उत्तराखंड में अन्य उपयोग किया तो मिलेगा ये दंड

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    देहरादून। उत्तराखंड में लीज पर दी गई वन भूमि को लेकर नीति तय कर दी गई है। मंत्रिमंडल ने लीज के नवीनीकरण और नई लीज की स्वीकृति को नीति तथा वन भूमि मूल्य अथवा वार्षिक लीज रेंट को लेकर नीति निर्धारण पर मुहर लगा दी। नई नीति में लीजधारक ने भू-उपयोग बदलकर वन भूमि का अन्य कार्यों में उपयोग किया तो उससे प्रीमियम से पांच गुना धनराशि दंड स्वरूप वसूल की जाएगी। लीजधारक ने वन भूमि का खुद उपयोग नहीं कर उसे किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिया तो उसके खिलाफ वन संरक्षण अधिनियम के तहत आपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे।

    प्रदेश सरकार ने नौ सितंबर, 2005 को राज्य में लीज नीति निर्धारित की थी। उक्त लीज नीति को 15 वर्ष बीत चुके हैं। इस बीच विभिन्न योजनाओं, परियोजनाओं व कार्यों के लिए आवंटित की गई वन भूमि के संदर्भ में उक्त लीज नीति का मूल्यांकन करने पर इसमें बदलाव की जरूरत महसूस की गई। मंत्रिमंडल ने गुरुवार को जिस लीज नीति को मंजूरी दी, उसमें व्यवस्था को और स्पष्ट और सरल बनाया गया है।

    सरकारी विभागों के लिए लीज नवीनीकरण मुफ्त 

    पेयजल, सिंचाई, गूल, घराट, पंचायतघर, रास्ता व स्कूल जैसे सामुदायिक एवं जनोपयोगी प्रयोजनों के लिए सरकारी संस्थाओं को दी गई लीज का नवीनीकरण प्रत्येक मामले में मुफ्त किया जाएगा। गैर सरकारी या निजी संस्थाओं के लिए 100 रुपये वार्षिक लीज रेंट की दर से यह कार्य होगा। कृषि एवं बागवानी के लिए कृषि, उद्यान, पशुपालन आदि विभागों को दी गई वन भूमि की लीजों का नवीनीकरण मुफ्त होगा। पट्टा देने वाले और लेने वाले के बीच 100 रुपये या गुणांकों में लीज रेंट लिया जाएगा।

    गैर सरकारी व निजी संस्थाओं को एक हेक्टेयर तक लैंड होल्डिंग के लिए 100 रुपये प्रति नाली की दर से वार्षिक लीज रेंट लिया जाएगा। ऐसे लीजधारकों के पास एक हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि है तो जिलाधिकारी द्वारा सूचित वर्तमान बाजार दर का लीज अवधि 90 रुपये प्रीमियम मूल्य के रूप में व प्रीमियम धनराशि का दो फीसद वार्षिक लीज रेंट लिया जाएगा। घर, छप्पर, झोपड़ी, गोशाला के लिए दी गई लीजों का नवीनीकरण सरकारी विभागों के लिए मुफ्त होगा। गैर सरकारी या निजी लीजधारक के पास एक नाली तक वन भूमि है तो उनसे वन भूमि का मूल्य न लेकर केवल 100 रुपये प्रति नाली की दर से वार्षिक लीज रेंट लिया जाएगा।

    व्यावसायिक इस्तेमाल को दी गई दीर्घकालिक लीजों के नवीनीकरण के लिए नीति तय की गई है। मंदिरों-आश्रमों के लिए नीति तयमंदिर, आश्रम, धर्मशाला व कुटिया के लिए दी गई लीज का नवीनीकरण वन एवं पर्यावरण विभाग की ओर से गठित उच्चस्तरीय समिति के तीन श्रेणियों में वर्गीकृत कर किया जाएगा। किसी धर्मग्रंथ में वर्णित स्थल या पुरातात्विक प्रमाणों या ऐतिहासिक साक्ष्यों से प्रमाणित स्थल, जिन्हें पूजा स्थल या पंथ के श्रद्धा स्थल के रूप में चिह्नित किया गया हो, ऐसी वन भूमि की लीज का नवीनीकरण मुफ्त होगा।

    ऐसे स्थल को संरक्षित व विकसित करने का काम राज्य सरकार करेगी। पट्टा प्रदाता व लेने वाले के बीच अनुबंध के आधार पर 100 रुपये या गुणांकों में लीज रेंट लिया जाएगा। केंद्र व राज्य सरकार के पर्यावरण, वचन, कृषि, शिक्षा, उद्यान, मृदा व जल संरक्षण, औषधीय, चिकित्सा एवं अनुसंधान से जुड़े गैर वाणिज्यिक संस्थानों को दी गई लीज का नवीनीकरण 100 रुपये वार्षिक लीज रेंट पर किया जाएगा।

    सरकारी विभागों को 90 वर्ष तक लीज

    राज्य सरकार के सभी विभागों के गैर व्यवसायी, जनोपयोगी कार्यों के लिए वन भूमि हस्तांतरण के बाद अल्पकालीन व दीर्घकालीन अवधि के लिए वन भूमि की लीज मुफ्त मिलेगी। वन भूमि का मूल्य भी नहीं लिया जाएगा। पट्टा देने व लेने वाले के बीच करार के तौर पर प्रतिकरात्मक रूप से 100 रुपये या गुणांकों में लीज रेंट लिया जाएगा। दीर्घकालीन लीज 30 वर्ष के लिए दी जाएगी। इसे 30-30 वर्ष के लिए दो बार बढ़ाया जा सकेगा। अधिकतम लीज अवधि 90 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है।

    ग्राम पंचायतों को सूक्ष्म हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए भूमि

    इन जनोपयोगी कार्यों में स्कूल, डिस्पेंसरी, अस्पताल, बिजली या दूरसंचार की लाइन, पेयजल, वर्षा जल संग्रहण के ढांचे, लघु सिंचाई नहर, गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोत, कौशल विकास व व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र, बिजलीघर, संचार पोस्ट, सड़क चौड़ीकरण, बीआरओ के मौजूदा पुल शामिल किए गए हैं। ग्राम पंचायत और शहरी निकायों की ओर से सामुदायिक शौचालयों के लिए वन भूमि लीज पर मिलेगी। ग्राम पंचायतों व स्वयं सहायता समूहों को सामुदायिक उपयोग के लिए वन भूमि पर प्रस्तावित एक मेगावाट तक क्षमता की सूक्ष्म जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण को 100 रुपये प्रति नाली की दर से वार्षिक लीज रेंट लिया जाएगा।

  • Kerala Election 2021 Date : केरल में छह अप्रैल को मतदान, दो संसदीय सीटों पर भी उपचुनाव, दो मई को नतीजे

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    भारत निर्वाचन आयोग शुक्रवार को केरल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान कर दिया। इसके साथ ही इन राज्यों में चुनाव आचार संहिता लागू हो गई  है। केरल व तमिलनाडु में एक ही चरण में मतदान संपन्न होगा।  दिल्ली के विज्ञान भवन में एक संवाददाता सम्मेलन में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की। बता दें कि असम, केरल और पश्चिम बंगाल में विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मई और जून में समाप्त हो रहा है। कोरोना महामारी के बाद यह पहला मौका है जब एक साथ पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इससे पहले अक्तूबर-नवंबर 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए थे।

    ये है वर्तमान दलीय स्थिति

    राज्य सीटें वर्तमान स्थिति
    केरल 141 एलडीएफ – 91
    यूडीएफ – 47
    केरल में विधानसभा की 141 सीटे हैं। इसमें से 140 निर्वाचित और एक सीट नामित होती है। वर्तमान में यहां पिनराई विजयन के नेतृत्व में लेफ्ट की सरकार है। यहां सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के पास 91 विधायक हैं। वहीं यूनाइडेट डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के पास 47, एनडीए के पास एक और केरल जनपक्षम सेक्युलर (केजेएस) के पास एक सीट है।