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  • झारखंड सरकार के लिए सिरदर्द बना एक और विधेयक

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    रांची। झारखंड में भूमि की जमाबंदी, अधिग्रहण के पेचीदा नियम-कानूनों में संशोधन की अब तक जितनी भी कोशिशें हुई हैं, उनके परिणाम लगभग एक जैसे ही रहे हैं। इसमें मौजूदा सरकार के हाथ ही जले हैं। हाल ही में मौजूदा सरकार द्वारा कैबिनेट से पास कराए गए झारखंड लैंड म्यूटशन बिल 2020 का भी यही हश्र होता दिख रहा है। चौतरफा दबाव के बाद सरकार इस बिल को विधानसभा के मानसून सत्र में भी लाने का साहस नहीं जुटा सकी, लेकिन इस पर राजनीति शुरू हो चुकी है। इस बिल में कुछ प्रावधानों को लेकर सत्ता पक्ष और उसके सहयोगी दलों में भी असंतोष है।

    सवाल उठता है यदि सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस भी इससे पूरी तरह सहमत नहीं थी तो यह कैबिनेट से पास कैसे हो गया? शुरुआत में सरकार इसके पक्ष में कैसे खड़ी रही? भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया, तब जाकर सत्तारूढ़ गठबंधन को इस बात का अहसास क्यों हुआ कि नौकरशाही ने खेल कर दिया है? विधानसभा में तो सरकार रक्षात्मक रही और यह कहकर बचती रही कि जब बिल लाया ही नहीं गया तो बखेड़ा क्यों खड़ा किया जा रहा है, लेकिन बेरमो और दुमका विधानसभा उपचुनाव में भी उसे हमलावर भाजपा के इस सवाल का जवाब तो देना ही पड़ेगा कि यदि सरकार की मंशा ठीक है तो यह कैबिनेट से कैसे पास हो गया? पूर्ववर्ती रघुवर दास की सरकार में छोटानागपुर और संताल परगना काश्तकारी अधिनियम में संशोधन की कवायद का व्यापक विरोध हुआ था। नतीजतन राज्यपाल ने यह प्रस्ताव राज्य सरकार को लौटा दिया था।

    जमीनों की अवैध जमाबंदी रोकने के लिए राज्य सरकार द्वारा कैबिनेट से पारित किए गए झारखंड लैंड म्यूटेशन बिल 2020 भी अधर में लटक सकता है। विरोध की बड़ी वजह इस बिल में जमीन की जमाबंदी की प्रक्रिया से जुड़े अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया जटिल होना है। झारखंड में बड़े पैमाने पर आदिवासियों और सरकारी जमीन की अवैध बंदोबस्ती हुई है। राज्यभर में इससे जुड़े लगभग पांच हजार मामले विभिन्न जिलों में चल रहे हैं। ज्यादातर मामलों में जमीन की अवैध बंदोबस्ती अफसरों की मिलीभगत से हुई है।

    नए बिल में ऑनलाइन म्यूटेशन के साथ राजस्व अफसरों से संबंधित प्रावधान जोड़े गए हैं। इसमें उल्लेख है कि जमीन के म्यूटेशन समेत अन्य कार्यो से संबंधित अफसरों की कार्रवाई को कोई न्यायालय ग्रहण नहीं करेगा। इसका मतलब है कि सामान्य परिस्थिति में किसी गलत कार्य के लिए कोई व्यक्ति न्यायालय में चुनौती नहीं दे पाएगा। अगर कोई अनियमितता हुई है तो कार्रवाई के लिए राज्य सरकार या केंद्र सरकार की स्वीकृति लेनी होगी। विवाद का बिंदु यही है।

    जाहिर है कि किसी सामान्य व्यक्ति के लिए गलत कार्य को कठघरे में खड़ा करना एक जटिल प्रक्रिया होगी, लिहाजा भाजपा इसे अफसरों को बचाने वाले विधेयक के तौर पर प्रस्तुत कर रही है। अब राज्य सरकार बचाव की मुद्रा में है। भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग के सचिव सफाई दे चुके हैं कि विधेयक कहीं से भी अफसरों को बचाने की वकालत नहीं करता है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी इस बिल को लेकर असहज दिख रहे हैं। वह कह रहे हैं कि ऐसा कोई कानून नहीं बनाया जाएगा जिससे आम जनता को नुकसान हो, लेकिन विपक्ष के इस सवाल का जवाब नहीं दे पा रहे हैं कि अगर उनकी मंशा ठीक थी, तो यह बिल कैबिनेट से पास कैस हो गया?

    कहां गया अध्यादेश : पूर्व में कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण के लिए लाए गए अध्यादेश पर भी सरकार की काफी किरकिरी हो चुकी है। राज्यपाल द्वारा कुछ बिंदुओं पर आपत्ति जताकर लौटाए गए इस अध्यादेश की अब सरकार चर्चा तक नहीं कर रही है। दो महीने पहले 23 जुलाई को कैबिनेट की बैठक में झारखंड संक्रामक रोग अध्यादेश 2020 को मंजूरी दी गई थी। इसमें लॉकडाउन के नियमों का पालन नहीं करने वालों पर एक लाख रुपये का जुर्माना और दो साल तक की जेल की सजा का प्रावधान किया गया था।

    हेमंत सरकार के इस कदम की देशभर में चर्चा हुई थी। बाद में इस अध्यादेश को अनुमोदन के लिए राज्यपाल को भेज दिया गया। इस अध्यादेश में वíणत कुछ तथ्यों पर राज्यपाल ने आपत्ति दर्ज करते हुए सरकार को फिर से अध्यादेश भेजने को कहा था, लेकिन अब तक संशोधन नहीं किया जा सका है। अध्यादेश लाते वक्त सरकार ने कहा था कि झारखंड में इस संबंध में कोई कानून न होने से लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है। यह वाजिब बात है। जिस तरह से पूरे राज्य में संक्रमण बढ़ रहा है, लोग दिशा-निर्देशों का अनुपालन नहीं कर रहे हैं।

  • महागठबंधन और राजग के दो प्रतिद्वंदी में सीट बंटवारे को लेकर स्थिति साफ नहीं

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    पटना। चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। 28 अक्टूबर से 7 नवंबर तक तीन चरणों में वोट डाले जाएंगे। लेकिन अब तक मुख्य रूप से दो प्रतिद्वंदी गठबंधनों में सीट बंटवारे को लेकर स्थिति साफ नहीं हुई है। विपक्षी दलों के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेतृत्व वाले महागठबंधन में प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) ने तो तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर ही सवाल उठा दिए हैं, तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग ) में भी जदयू और लोजपा कई मुद्दों को लेकर आमने-सामने हैं।

    पिछले चुनाव से इस चुनाव में परिस्थितियां बदली हुई हैं। कई दलों के गठबंधन बदलने से उसके ‘निजाम’ बदल गए हैं। महागठबंधन में शामिल रालोसपा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने राजद के नेतृत्वकर्ता और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के उतराधिकारी तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया है।

    रालोसपा ने गुरुवार को पार्टी की बैठक बुलाई थी जिसमें स्पष्टता से कहा गया है कि महागठबंधन में राजद के एकतरफा फैसले लेने के कारण महागठबंधन में शामिल दलों में नेतृत्व को लेकर भी मतभिन्नता बरकरार है। बैठक में सीट बंटवारे को लेकर भी अभी तक अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।

    पूर्व केंद्रीय मंत्री कुशवाहा ने बैठक में तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे नेतृत्व में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को रोक पाना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि अभी जो चेहरा है वह नीतीश कुमार के सामने कहीं नहीं टिकता।

    इधर, महागठबंधन में सीट बंटवारा नहीं होने के कारण विकासशील इंसान पार्टी नाराज बताई जा रही है। वैसे, महागठबंधन में वामपंथी दलों के शामिल होने के प्रयास चल रहे हैं।

    इधर, उपेंद्र कुशवाहा द्वारा तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल उठाए जाने पर राजद का कोई नेता कुछ भी खुलकर नहीं बोल रहा। हालांकि राजद के एक नेता ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि किसी को कहीं जाना होगा, तो उसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुल मिलाकर यह विवाद सीटों की हिस्सेदारी को लेकर है।

    इधर, राजग में भी अभी बंटवारे को लेकर मामला अधर में लटका है। राजग के प्रमुख घटक दल लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और जदयू के बीच काफी दिनों से मनमुटाव चल रहा है। लोजपा के प्रमुख चिराग पासवान लगातार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कायरे पर सार्वजनिक रूप से प्रश्न उठा रहे हैं, जिससे जदयू के नेता भी गाहे-बगाहे लोजपा पर निशाना साधती रही है।

    इस बीच लोजपा ने 143 सीटों पर तैयारी करने की बात कहकर राजग से दूरी बना ली। राजग सूत्रों का कहना है कि गुरुवार को भाजपा ने लोजपा को 25 सीट देने के संदेश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि लोजपा पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि उनका गठबंधन भाजपा से है।

    इधर, जदयू के नेता और बिहार के मंत्री जय कुमार सिंह कहते हैं कि गठबंधन को लेकर कोई भ्रम नहीं है। गठबंधन अटूट है। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि दो से तीन दिनों के अंदर सीट बंटवारा हो जाएगा।

    इधर, भाजपा के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं कि भाजपा कार्यकर्ता वाली पार्टी है। भाजपा चुनाव आयोग के सभी आदेशों का पालन करेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा के कार्यकर्ता भाजपा के उम्म्ीदवार को जीताने का काम करेंगे ही, जहां भाजपा के प्रत्याशी नहीं होंगे वहां घटक दल के प्रत्याशी को जीताने का कार्य करेंगे।

    उल्लेखनीय है कि 2015 में जो विधानसभा चुनाव हुए थे उसमें राजग में भाजपा, लोजपा, रालोसपा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा शामिल थे, वहीं महागठबंधन में जदयू, राजद और कांग्रेस शामिल थी।

    पिछले चुनाव में भाजपा को 53, लोजपा को 2, रालोसपा को 2 और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) को 1 सीटें मिली थी। महागठबंधन में जदयू के 71 प्रत्याशी विजयी हुए थे जबकि राजद 80 और कांग्रेस 27 सीटें जीती थी।

  • पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय के JDU में जाने की चर्चा…

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    पटना। बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) गुप्तेश्वर पांडेय ेने शनिवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की। इसके बाद उनके जदयू में जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि पांडेय अभी खुलकर इस मामले में कुछ नहीं बोल रहे हैं। पूर्व डीजीपी पांडेय दोपहर में जदयू कार्यालय पहुंचे और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलााकत की।

    मुख्यमंत्री से मिलने के बाद कार्यालय से बाहर निकल कर आए पांडेय ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा, मैं स्वतंत्र नागरिक हूं। मैं किसी से कभी भी मिल सकता हूं। मेरी नीतीश जी से आज मुलाकात हुई है। जदयू की सदस्यता ग्रहण करने के फैसले पर उन्होंने कहा कि इस मामले में लेकर कोई बात नहीं हुई है। चुनाव लड़ने के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री से राजनीति के संबंध में कोई बात नहीं हुई। उन्हें धन्यवाद देने आया था।

    उन्होंने कहा कि राजनीति में जाउंगा, तब आप लोगों को बता दूंगा। अभी सेवानिवृत्त हो गया हूं।
    इधर, जदयू सूत्रों का कहना है कि पांडेय का जदयू की सदस्यता ग्रहण करना तय है। सूत्रों का दावा है कि मुख्यमंत्री नीतीश ने उन्हें बक्सर से विधानसभा टिकट देने का आश्वासन दिया है, हालांकि जदयू का कोई नेता इसकी पुष्टि नहीं कर रहा है। उल्लेखनीय है कि पांडेय ने इससे पहले एच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है। सेवानिवृत्त होने के बाद से ही पांडेय की राजनीति में आने के कयास लगाए जा रहे हैं।

  • सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक में जोड़तोड़ शुरू…

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    पटना। चुनाव आयोग के बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर तारीखों की घोषणा किए जाने के बाद चुनावी जंग के लिए मैदान तैयार हो गया है। इधर, राजनीतिक दल भी चुनावी जंग में उतारने के लिए अपने ‘योद्धाओं’ के चयन को लेकर कवायद तेज कर दी है। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक में उम्मीदवारों को लेकर जोड़तोड़ प्रारंभ है।

    चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद शनिवार को सभी पार्टी कार्यालयों में उम्मीदवारों की दावेदारी को लेकर नेताओं की भीड़ उमड़ रही है। लोग लगातार अपनी पहुंच के हिसाब से बड़े नेताओं से मिलकर उम्मीदवार की दावेदारी पेश कर रहे हैं।

    इधर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो पार्टी कार्यालय में उम्मीदवारों की दावेदारी करने वाले नेताओं से खुद मिल रहे हैं। बिहार में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में सीट बंटवारे को लेकर चर्चा प्रारंभ कर दी गई है।

    सूत्रों का कहना है कि राजग में जदयू और भाजपा में सीट बंटवारे को लेकर ज्यादा परेशानी नहीं है। सीट बंटवारे को लेकर 2010 में हुए चुनाव को आधार बनाया गया है। हालांकि, 2015 में जदयू के राजद के साथ चुनाव लड़ने के बाद कई सीटों के अदलाबदली होने की संभावना है। ऐसी स्थिति में कहा जा रहा है कि दोनों दलों को कई परंपरागत सीटों को छोड़ना पड़ सकता है।

    वैसे सबसे अधिक परेशानी अन्य दलों के वर्तमान विधायकों के जदयू में आने के कारण हो रही है। ऐसी स्थिति में कई सीटों को लेकर पेंच फंसा हुआ है।

    इधर, भाजपा के प्रभारी भूपेंद्र यादव बिहार के वरीय नेताओं से उम्मीदवारों और सीट बंटवारे को लेकर फीडबैक को लेकर शनिवार को दिल्ली चले गए है, जहां वे पार्टी के वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं से बात करेंगे।

    सूत्रों के मुताबिक, जदयू भी सीट बंटवारें को लेकर सांसद ललन सिंह और आर सी पी सिंह को बात करने की जिम्मेदारी दी है। राजग में लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान से भी बातचीत होगी।

    लोजपा और जदूय के बीच तानातनी को लेकर अभी तक स्पष्टता सामने नहीं आई है। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को लोजपा के पूर्व अध्यक्ष रामविलास पासवान से पुराने संबंध होने की बात कहकर इस तानातनी को कुछ कम करने के संकेत दिए हैं।

    इस बीच, विपक्षी दलों के महागठबंधन में अब सीट बंटवारे और प्रत्याशियों को लेकर गहमागहमी बनी हुई है। बिहार कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमिटी के अध्यक्ष और पार्टी के महासचिव अविनाश पांडेय कमिटी के दो अन्य लोगों के साथ शनिवार को पटना पहुंचे हैं।

    कांग्रेस के एक नेता बताते हैं कि कमिटी के नेता शनिवार को दिनभर पार्टी के वरीय नेताओं से बैठक करंेगे। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के शनिवार को दो दौर में होने वाली बैठक के बाद दिल्ली में इन फैसलों पर मुहर लगेगी और फिर घटक दलों से बात की जाएगी। सूत्र कहते हैं कि इस दौरान राजद के नेताओं से भी बात हो सकती है।

    इस बीच, महागठबंधन को लेकर स्थिति साफ नहीं है। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को लेकर उहापोह की स्थिति बनी हुई है, जबकि वामपंथी दलों के भी महागठबंधन में शामिल होने को लेकर औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। बहरहाल, चुनाव की तारीखों के घोषणा के बाद सीट बंटवारे और प्रत्याशी को लेकर सभी पार्टियों में चर्चा तेज हुई है, लेकिन अभी तक कई मामलों को लेकर दोनों गठबंधनों में पेंच फंसा हुआ है।

  • ड्रग मामले में दीपिका, रकुल, सिमोन, करिश्मा के NCB ने जब्त किए फोन

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    मुंबई । बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में बॉलीवुड अभिनेत्रियों रकुलप्रीत सिंह, दीपिका पादुकोण, उनकी पूर्व मैनेजर करिश्मा प्रकाश और फैशन डिजाइनर सिमोन खंबाटा से ड्रग्स मामले में पूछताछ कर रही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने उनके मोबाइल फोन को जब्त कर लिया है। गौरतलब है कि अभिनेत्रियों से शुक्रवार और शनिवार को पूछताछ हुई थी।

    एनसीबी के एक सूत्र ने कहा, “दीपिका, करिश्मा, रकुल और खंबाटा के फोन को एनसीबी ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत जब्त कर लिया है।”

    दीपिका और करिश्मा से शनिवार को और रकुल और खंबाटा से शुक्रवार को कई घंटों तक पूछताछ के बाद फोन जब्त किए गए हैं।

    एनसीबी ने दीपिका से शनिवार को पांच घंटे और रकुल से शुक्रवार को चार घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की।

    वहीं करिश्मा से लगातार दो दिन शुक्रवार और शनिवार को पूछताछ की गई, जबकि खंबाटा से शुक्रवार को पूछताछ की गई।

    सूत्र ने कहा कि एजेंसी ने उनके फोन को कथित ‘ड्रग’ चैट के साक्ष्य के रूप में एकत्र कर लिया।

    सूत्र ने यह भी बताया कि एनसीबी ने सुशांत की पूर्व टैलेंट मैनेजर जया साहा का फोन भी जब्त किया है।

    दीपिका, रकुल, खंबाटा और करिश्मा के अलावा, एनसीबी ने शनिवार को बॉलीवुड अभिनेत्रियों श्रद्धा कपूर और सारा अली खान से भी कई घंटों तक पूछताछ की थी।

    ईडी द्वारा दीपिका और उनकी मैनेजर की साल 2017 में कथित ड्रग चैट पाए जाने के बाद एनसीबी से मामला दर्ज करने का अनुरोध किया था, जिसके बाद एनसीबी ने मामला दर्ज किया।

    रकुल और खंबाटा के फोन भी जब्त कर लिए गए हैं, क्योंकि दोनों सुशांत की प्रेमिका रिया चक्रवर्ती की करीबी दोस्त हैं। गौरतलब है कि इस महीने की शुरुआत में तीन दिनों तक पूछताछ के बाद रिया को गिरफ्तार कर लिया गया है।

    रिया के अलावा, एनसीबी ने इस मामले के सिलसिले में उसके भाई शोविक और 17 अन्य को भी गिरफ्तार किया है।

  • धरने पर बैठी महिला, तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे टिकट दावेदार…

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    पटना। बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद से ही विधायक बनने की चाहत संवारे नेताओं की भीड़ पार्टी के प्रदेश कार्यालयों में लगने लगी है। जिन्हें पार्टी के आलाकमान से टिकट देने का आश्वासन मिल जा रहा है, उनकी तो खुशी परवान पर दिख रही है और जिन्हें आशा नहीं दिखती वे पार्टी लाइन से हट कर अपने तरीके से टिकट की मांग कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश कार्यालय के समीप रविवार को लखीसराय के पार्टी कार्यकर्ताओं ने जमकर नारेबाजी की तो सोमवार को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) कार्यालय के बाहर एक महिला राजद कार्यकर्ता टिकट की मांग को लेकर धरने पर बैठ गई।

    बेगूसराय जिला के तेघड़ा विधानसभा की नेत्री सुधा सिंह सोमवार को अनिश्चितकालीन धरना पर बैठ गई। उन्होंने पत्रकारों से बताया, “तेजस्वी यादव और पार्टी के शीर्ष नेता से कई बार मिलने की कोशिश की, लेकिन मुलाकात नहीं हुई। वर्ष 2015 में ही लालू प्रसाद ने हमें टिकट देने का आश्वाशन दिया था, पर टिकट नहीं मिला था।”

    उन्होंने कहा कि जब तक टिकट नहीं दिया जाता, वे यहीं बैठी रहेंगी। इससे पहले रविवार को भाजपा कार्यालय में लखीसराय में उम्मीदवार बदलने को लेकर जमकर हंगामा हुआ। भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की गाड़ी को कार्यालय में घुसने से कुछ देर तक रोक दिया। उपमुख्यमंत्री की गाड़ी को कार्यालय आने देने से रोक रहे कार्यकर्ताओं और कार्यालय में मौजूद पार्टी जनों के बीच हल्की झड़प भी हुई।

    लखीसराय ये आए पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का आरोप था कि लखीसराय के मौजूदा विधायक और श्रम संसाधन मंत्री विजय कुमार सिन्हा मतदाताओं की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे हैं।

  • अब एंट्री हुई मप्र के विधानसभा उप-चुनाव में ‘राष्ट्रवाद’ की

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    भोपाल। मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव से पहले राजनीतिक दलों में तकरार तेज हो गई है। अब तो राष्ट्रवाद की भी एंट्री हो गई है और राजनीतिक दलों को राष्ट्रद्रोही और देशभक्त बताया जाने लगा है।

    राज्य में 28 विधानसभा सीटों पर उप-चुनाव होना है और यह कांग्रेस और भाजपा के लिए जीने और मरने जैसी लड़ाई है। यही कारण है कि दोनों दल एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। एक तरफ जहां दल-बदल का दौर जारी है, वहीं दूसरी ओर एक दूसरे को घेरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है।

    एक तरफ जहां आम जनता से जुड़े किसान कर्ज माफी, बिजली बिल, मुआवजा जैसे मुद्दे राजनीतिक दल उठाने में लगे हैं, तो दूसरी ओर व्यक्तिगत हमले भी बोले जा रहे हैं। इन हमलों में अब तो बात गद्दार, बिकाऊ से आगे चलकर राष्ट्रवाद तक पहुंचने लगी है।

    राज्य सरकार की मंत्री ऊषा ठाकुर ने तो भाजपा को राष्ट्रवादी और कांग्रेस को राष्ट्र विरोधी विचारधारा करार देते हुए कहा, भाजपा और कांग्रेस के बीच वैचारिक युद्घ है। ये देशभक्त और देशद्रोही के बीच का चुनाव है जिनको राष्टवादिता से प्रेम था, वे भाजपा के साथ हैं, जो राष्ट्रवाद से विमुख हुए वे कांग्रेस में चले गए।

    कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता दुर्गेश शर्मा ने कहा है कि यह तो देश जानता है कि देशभक्त और देशद्रोही कौन है, वास्तविकता यह है कि भाजपा जनता का वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह की बयानबाजी करती है। आगामी समय में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव में उसे हार नजर आ रही है, लिहाजा वे जनता का ध्यान बांटने के लिए स्तरहीन बयान दे रही है, जनता सब जानती है और उप-चुनाव में सबक मिलेगा भाजपा को।

    राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि उप-चुनाव में तल्खी रहेगी, इस बात के संकेत तो अभी से बयानबाजी में ही नजर आ रहे है। कांग्रेस छोड़कर गए पूर्व विधायकों को जहां कांग्रेस बिकाऊ, गद्दार कह रही है, वहीं भाजपा भी नए नारों और मुद्दों को गढ़ेगी ही। कुल मिलाकर आने वाले दिनों में बहुत कुछ नया सुनने को मिलेगा, क्योंकि मतदाताओं को अपने जाल में फंसाना तो राजनीतिक दलों का लक्ष्य है।

    ज्ञात हो कि राज्य में 28 विधानसभा क्षेत्रों में उप-चुनाव होने वाले हैं। इन चुनाव में भाजपा को जहां पूर्ण बहुमत पाने के लिए नौ स्थानों पर जीत हासिल करनी है, वहीं कांग्रेस को सभी 28 स्थानों पर जीत जरुरी है। विधानसभा में कुल सदस्य संख्या 230 की है, पूर्ण बहुमत के लिए 116 सदस्य होना जरुरी है। वर्तमान में भाजपा के पास 107 और कांग्रेस के पास 89 सदस्य ही हैं। वहीं चार निर्दलीय, दो बसपा और एक सपा का विधायक है।

  • मध्यप्रदेश में मतदाताओं को लुभाने के लिए हो रहे विभिन्न प्रयास

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    भोपाल । मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव से पहले शिवराज सिंह चौहान की सरकार मतदाताओं को लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। यही कारण है कि हर तरफ शिलान्यास और भूमि पूजन के कार्यक्रम तो हो ही रहे हैं साथ ही विभिन्न वगोर्ं के लिए सौगातों की बरसात की जा रही है।

    राज्य में 28 विधानसभा क्षेत्रों में उप-चुनाव होना है और यह सरकार के भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण है। दोनों दल मतदाताओं को लुभाने में हर दांव चालें चले जा रहे हैं।

    राज्य की शिवराज सिंह चौहान सरकार हर वर्ग के मतदाताओं को लुभाने के लिए लगातार घोषणाएं कर रही हैं। बीते कुछ दिनों में देखें तो शिवराज सरकार ने किसानों को केंद्र सरकार की ही तरह हर साल चार हजार रूपये सम्मान निधि देने का ऐलान किया है। प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान के लिए मुआवजा दिया है तो वहीं बीमा की राशि किसानों के खाते में पहुंचाई गई है। इसके अलावा स्व सहायता समूह की मजबूती के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, छात्रों को लैपटप बांटे गए हैं और आगामी समय में होने वाली सरकारी नौकरियां राज्य के युवाओं के लिए होने के वादे के साथ 25 हजार नई भर्तियों का ऐलान भी किया गया है।

    मुख्यमंत्री चौहान पूर्ववर्ती सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि कमल नाथ के काल में बल्लभ भवन भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया था। कांग्रेस जो वादे करके सत्ता में आई थी उन्हें पूरा नहीं किया। यही कारण था कि जनता से वादाखिलाफी करने वाली कांग्रेस की सरकार को ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके साथियों ने गिरा दिया।

    शिवराज सरकार की लोकलुभावन घोषणाओं पर पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ लगातार तंज कस रहे हैं। उनका कहना है कि शिवराज सिंह सरकार किसानों से मजाक कर रही है, पहले खराब हुई फ सलों का मुआवजा अब तक नहीं मिला और फ सल बीमा योजना में किसानों को जो बीमा राशि के रूप में मिली है वह एक और दो रुपए है। सरकार के दावे बड़े-बड़े, समारोह बड़े-बड़े, लेकिन धरातल पर वास्तविकता कुछ और है।

    राजनीतिक विश्लेषक शिव अनुराग पटेरिया का कहना है कि राजनीतिक दलों का चुनाव से पहले घोषणाएं और वादे करना शगल बन गया है, वर्तमान के उप-चुनाव से पहले भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। राजनीतिक दलों की पिछली घोषणाओं पर गौर करें तो हजारों ऐसे शिलालेख मिल जाएंगे जो वषों पहले लगे मगर योजनाएं मूर्त रूप नहीं ले पाईं। चुनाव में की गई घोषणाएं सत्ता में आने के बाद पूरी हो, इसके लिए राजनीतिक दलों के लिए यह बाध्यता होना चाहिए कि वे चुनाव से पहले जो वादे कर रहे हैं उन्हें सत्ता में आने पर प्राथमिकता से पूरा करेंगे, अगर ऐसा हो जाता है तो राजनीतिक दल चुनाव से पहले बड़े बड़े वादे और घोषणाएं करने से हिचकेगे जरुर।

  • बिहार के लोगों ने मौका दिया तो 10 लाख लोगों को देंगे नौकरी 2 महीने में – तेजस्वी यादव

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    पटना । बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने रविवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सरकार को बेरोजगारी के मुद्दे पर घेरते हुए वादा किया कि अगर बिहार के लोग उनकी पार्टी को मौका देते है, तब सरकार बनने के दो महीने के अंदर 10 लाख लोगों को सरकारी नौकरी दी जाएगी। पटना में राजद प्रदेश कार्यालय में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि हमारी सरकार बनी तो कैबिनेट की पहली बैठक में 10 लाख युवाओं को रोजगार देने का फैसला किया जाएगा।

    उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बिहार में 50 हजार पुलिसकर्मियों के पद रिक्त है, जिस पर भर्ती की जाएगी। उन्होंने बताया कि बिहार में एक लाख आबादी पर 77 पुलिसकर्मी हैं जबकि राष्ट्रीय औसत 144 पुलिसकर्मियों का है।

    उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग में भी बिहार में 1 लाख 25 हजार चिकित्सकों की जबकि कुल मिलाकर 2 लाख 50 हजार चिकित्सकों और सपोर्टिंग स्टॉफ की जरूरत है। इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में विद्यालयों में 2 लाख 50 हजार शिक्षकों के पद रिक्त हैं तथा कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर 50 हजार प्रोफेसरों के पद रिक्त है। उन्होंने कहा कि राज्य में जूनियर इंजीनियर के 66 प्रतिशत पद रिक्त हैं।

    उन्होंने कहा, “अगर उनकी पार्टी को यहां के लोग मौका देते हैं तो इन सभी पदों पर नियुक्ति की जाएगी।”

    उन्होंने कहा कि यह वादा नहीं मजबूत इरादा है।

    उन्होंने नीतीश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि 15 साल काम करने वालों ने यहां क्या किया? आज बिहार में बेरोजगारों की फौज खड़ी हो गई है। उन्होंने कहा कि पांच सितंबर को राजद ने बेरोजगारों के निबंधन के लिए एक वेब साइट तथा एक मिस्ड कॉल के नंबर जारी किया था। उन्होंने कहा कि वहां 22 लाख से अधिक लोगों ने अपना निबंधन करवाया है।

  • मध्य प्रदेश के 28 विधानसभा क्षेत्रों में 3 लाख ज्यादा मतदाता पिछले चुनाव से…

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    भोपाल। मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में 64 लाख मतदाता मतदान करेंगे। पिछले विधानसभा के मुकाबले उप-चुनाव में लगभग तीन लाख मतदाता ज्यादा मतदान में हिस्सा लेंगे। राज्य की 28 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है और यहां तीन नवंबर को मतदान होगा और नतीजे 10 नवंबर को आएंगे, चुनाव आयोग ने आधिकारिक कार्यक्रम भी जारी कर दिया है।

    निर्वाचन कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार, इन 28 विधानसभा क्षेत्रों में 63 लाख 68 हजार मतदाता मतदान करेंगे, इनमें पुरुष मतदाता 33 लाख 72 हजार और महिला मतदाता 29 लाख 77 हजार है, वही थर्ड जेंडर 198 और सर्विस वोटर 18,737 है। वर्ष 2018 में हुए विधानसभा के चुनाव में 60 लाख 85 मतदाता थे, अब लगभग तीन लाख अधिक मतदाता मतदान करेंगे।

    निर्वाचन आयोग से मिली जानकारी के अनुसार, जिन क्षेत्रों में उपचुनाव होना है वहां के मतदाताओं को परिचय पत्र का वितरण किया जा चुका है। मतदाताओं में 80 वर्ष से अधिक आयु के 71,627 मतदाता हैं, वहीं दिव्यांग मतदाताओं की संख्या 55,329 है।