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  • Hal Shashti 2022: महिलाएं क्यों रखती हैं इस दिन निर्जला व्रत

    Hal Shashti 2022: हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि पर हल षष्ठी या हरछठ का पर्व मनाया जाता है। शास्त्रों की माने तो हरछठ के दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम की पूजा की जाती है।

    इसलिए इसे आम भाषा में बलराम जयंती के नाम से भी जाना जाता हैं। इस दिन को गुजरात में राधव छठ के नाम से भी बुलाया जाता हैं। आज हम आपको बताएंगे हल छठ का शुभ मुहूर्त और इसकी पूजा विधि।

    हलषष्ठी 2022 का शुभ मुहूर्त

    भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि का प्रारंभ -16 अगस्त, मंगलवार को रात 08 बजकर 17 मिनट इसका प्रारंभ होगा

    वहीं भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि का समापन- 17 अगस्त को रात 08 बजकर 24 मिनट पर होगा। 

    हल षष्ठी व्रत 17 अगस्त को रखा जाएगा

    वहीं रवि योग- 17 अगस्त को सुबह 5 बजकर 51 मिनट से लेकर 7 बजकर 37 मिनट तक रहेगा। इसके बाद रात 9 बजकर 57 मिनट से 18 अगस्त सुबह 5 बजकर 52 मिनट तक यह रहेगी।

    क्या होता है हल षष्ठी का महत्व

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हल छठ या हल षष्ठी का व्रत संतान की लंबी आयु और अच्छे जीवन के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती है और हल की पूजा के साथ ही बलराम की पूजा भी करती हैं। 

  • Happy krishna janmashtami:-आखिर क्यों सूखी तुलसी से इतना प्रेम करते हैं कृष्ण

    आध्यात्मिक:- हिन्दू धर्म मे तुलसी का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। तुलसी का पौधा हिंदुओ के आंगन में होना बहुत शुभ माना जाता है। जिस घर मे तुलसी का पौधा लगा होता है उस घर मे सुख सम्रद्धि का निवास होता है और हर ओर से धन वर्षा होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार तुलसी में लक्ष्मी का वास होता है यह घर में सकारात्मक प्रभाव बनाए रखती है और घर का क्लेश मिटाती है। वही तुलसी की सूखी पत्तियों का हिन्दू धर्म मे बेहद खास महत्व है।

    धर्म ग्रन्थ के अनुसार भगवान श्री कृष्ण को तुलसी की सूखी पत्तियों से बेहद प्रेम था। इनके भोग में हमेशा तुलसी की पत्ती का उपयोग किया जाता है। वही एक सूखी पत्ती के उपयोग से भगवान श्री कृष्ण का 15 दिन तक भोग किया जा सकता है। कहा जाता है जो भी व्यक्ति तुलसी डालकर श्री कृष्ण को भोजन करवाता है उन्हें स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है और जो तुलसी की पत्ती जल में डालकर स्नान करता है उसके मन से सभी नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाता है।
    ज्योतिष शास्त्र में सुखी तुलसी के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति सुखी तुलसी की पत्तियों को एक लाल वस्त्र में हल्दी के साथ बांधकर अपनी तिजोरी में रखता है तो उसकी तिजोरी में धन की कमी नहीं होती और वह हर ओर से प्रगति के पथ पर बढ़ता जाता है। तुलसी की पत्ती को हिंदू धर्म मे अमृत्व के बराबर फलदायक माना गया है।

  • कब है गणेश चतुर्थी, कैसे करें बप्पा की स्थापना और पूजा

    डेस्क। हिंदू धर्म में हर माह का एक विशेष महत्व होता है। हर माह किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित बताया गया है। उस महीने में उन देवता की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस साल गणेश चतुर्थी 31 अगस्त, बुधवार के दिन पड़ रही है।

    बुधवार के दिन होने के कारण इस बार गणेश चतुर्थी का महत्व और भी बढ़ गया है। यह दिन गणपति जी को समर्पित है। इस दिन चतुर्थी होने से व्रत का खास महत्व भी होता है। गणेश चतुर्थी के दिन घरों में विघ्नहर्ता की स्थापना भी की जाती है। वहीं उन्हें 10 दिन तक विराजमान किया जाता है। 

    गणेश चतुर्थी 2022 की तिथि एवं शुभ मुहूर्त

    पंचांग की माने तो इस बार गणेश चतुर्थी की शुरुआत 31 अगस्त से होगी। वहीं 30 अगस्त, मंगलवार दोपहर 03.33 मिनट पर चतुर्थी तिथि लग जाएगी। और 31 अगस्त दोपहर 03.22 मिनट पर इसका समापन होगा। उदयातिथि के कारण गणेश चतुर्थी का व्रत 31 अगस्त को ही रखा जाना है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11.05 मिनट से दोपहर 01.38 मिनट तक होगा।

    कैसे करें भगवान गणेश की स्थापना 

    गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणपति की प्रतिमा स्थापित करने का प्रावधान है। बड़े ही धूमधाम से घर में भगवान गणेश की प्रतिमा को विराजित किया जाता है। वहीं उन्हें 10 दिनों तक घर में रखा जाता है। और उनकी विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना भी की जाती है।

    गणेश चतुर्थी के दिन सुबह स्नान आदि के बाद साफ वस्त्रों को धारण कर लें। इसके बाद चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर गणेश जी की मूर्ति को स्थापित करें। अब भगवान का साफ जल से अभिषेक करवाए। इसके बाद उन्हें अक्षत, दुर्वा, फूल, फल आदि अर्पित करिये। भगवान को मोदक का भोग लगाएं और आरती करें। 

    यह मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन पूजा करने से बप्पा भक्तों से बहुत जल्दी ही प्रसन्न होते हैं। 

    भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए हर दिन गणेश चालीसा का पाठ करना चाहिए।

    श्री गणेश चालीसा

    जय गणपति सदगुण सदन,

    कविवर बदन कृपाल।

    विघ्न हरण मंगल करण,

    जय जय गिरिजालाल।।

    जय जय जय गणपति गणराजू।

    मंगल भरण करण शुभः काजू।।

    जै गजबदन सदन सुखदाता।

    विश्व विनायका बुद्धि विधाता।।

    वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना।

    तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन।।

    राजत मणि मुक्तन उर माला।

    स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला।।

    पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।

    मोदक भोग सुगन्धित फूलं।।

    सुन्दर पीताम्बर तन साजित।

    चरण पादुका मुनि मन राजित।।

    धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।

    गौरी लालन विश्व-विख्याता।।

    ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।

    मुषक वाहन सोहत द्वारे।।

    कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।

    अति शुची पावन मंगलकारी।।

    एक समय गिरिराज कुमारी।

    पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी।।

    भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।

    तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा।।

     

    अतिथि जानी के गौरी सुखारी।

     

    बहुविधि सेवा करी तुम्हारी।।

     

    अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।

     

    मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा।।

     

    मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।

     

    बिना गर्भ धारण यहि काला।।

     

    गणनायक गुण ज्ञान निधाना।

     

    पूजित प्रथम रूप भगवाना।।

     

    अस कही अन्तर्धान रूप हवै।

     

    पालना पर बालक स्वरूप हवै।।

     

    बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।

     

    लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना।।

     

    सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।

     

    नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं।।

     

    शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं।

     

    सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं।।

     

    लखि अति आनन्द मंगल साजा।

     

    देखन भी आये शनि राजा।।

     

    निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।

     

    बालक, देखन चाहत नाहीं।।

     

    गिरिजा कछु मन भेद बढायो।

     

    उत्सव मोर, न शनि तुही भायो।।

     

    कहत लगे शनि, मन सकुचाई।

     

    का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई।।

     

    नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।

     

    शनि सों बालक देखन कहयऊ।।

     

    पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।

     

    बालक सिर उड़ि गयो अकाशा।।

     

    गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी।

     

    सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी।।

     

    हाहाकार मच्यौ कैलाशा।

     

    शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा।।

     

    तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।

     

    काटी चक्र सो गज सिर लाये।।

     

    बालक के धड़ ऊपर धारयो।

     

    प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो।।

     

    नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।

     

    प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे।।

     

    बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।

     

    पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा।।

     

    चले षडानन, भरमि भुलाई।

     

    रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई।।

    चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।

    तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें।।

    धनि गणेश कही शिव हिये हरषे।

    नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे।।

    तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।

    शेष सहसमुख सके न गाई।।

    मैं मतिहीन मलीन दुखारी।

    करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी।।

    भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।

    जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा।।

    अब प्रभु दया दीना पर कीजै।

    अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै।।

    ॥ दोहा ॥

    श्री गणेश यह चालीसा,

    पाठ करै कर ध्यान।

    नित नव मंगल गृह बसै,

    लहे जगत सन्मान।।

    सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश,

    ऋषि पंचमी दिनेश।

    पूरण चालीसा भयो,

    मंगल मूर्ती गणेश।।

  • हो जाइए सावधान इन मूलांकों से होगा बड़ा नुकसान

    ज्योतिष शास्त्र की भांति ही अंक ज्योतिष से भी व्यक्ति के भविष्य, स्वभाव और व्यक्तित्व का पता लगाया जाता है। जिस तरह हर नाम के अनुसार राशि होती है उसी तरह हर नंबर के अनुसार अंक ज्योतिष में अंकों की दशा होती है। आपको बता दें इस माह में मुल्यांक 2 और 6 वाले लोगों को होंगे ये फायदे नुकसान-

    मूलांक 3-

     इस माह कार्यक्षेत्र और व्यापार में वातावरण मिला जुला असर देने वाला होगा।
    माह के शुरुआत में ही कार्यक्षेत्र में नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं।
    इस माह जोखिम भरे मामलों में निर्णय लेने से पहले किसी अनुभवी से सलाह अवश्य कर लें वरना नुकसान हो सकता है।
    माह के आरंभ में विरोधी सक्रिय हो सकते हैं। कई पुराने विवादों की स्थिति बन सकती हैं।
    अपनी वाणी और क्रोध पर नियंत्रण रखें।

    मूलांक 8- 

    इस माह कार्यक्षेत्र और व्यापार में मिला जुला असर मिलेगा।
    किसी भी महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय लेने से पहले किसी अनुभवी से सलाह अवश्य लें।
    किसी बनते हुए कार्यों में बाधाएं आ सकती हैं पर सैयम बनाए रखें।
    इस माह व्यर्थ के कार्यों में समय न गवाएं।
    अपने खानपान पर नियंत्रण रखें।

  • भय नासिनी है देवी चन्द्रघण्टा ऐसे करें पूजा तो बरसेगी कृपा

    आध्यात्मिक:- नवरात्र की तृतीया तिथि को माता चंद्रघंटा की पूजा होती है। चंद्रघंटा माता का शिवदूती स्वरूप है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनका रंग सोने के समान चमकीला है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने जैसी है। इनके घंटे की भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव, दैत्य आदि सभी डरते हैं। असुरों के साथ युद्ध में देवी चंद्रघंटा ने घंटे की टंकार से असुरों का नाश कर दिया था।

    कैसे करें पूजा:-

    वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां चंद्रघंटा की पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधितद्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्रपुष्पांजलि आदि करें।
    मां चंद्रघंटा के आशीर्वाद से भक्त से सभी पाप नष्ट हो जाते है और उसकी राह में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती है। इस देवी की पूजा करने से, सभी दुखों और भय से मुक्ति मिलती है। मां चंद्रघंटा अपने भक्तों को असीम शांति और सुख सम्पदा का वरदान देती है।
     

    देवी का स्वरूप:-

    देवी चंद्रघंटा का शरीर सोने के समान कांतिवान है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी लिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनकी दस भुजाएं हैं और दसों भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र हैं। देवी के हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र धारण किए हुए हैं। इनके कंठ में सफेद पुष्प की माला और रत्नजड़ित मुकुट शीर्ष पर विराजमान है। देवी चंद्रघंटा भक्तों को अभय देने वाली तथा परम कल्याणकारी हैं। इनके रुप और गुणों के अनुसार आज इनकी पूजा की जाएगी।

    पूजा के मंत्र:-

    या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
    प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
    ऊँ चं चं चं चंद्रघंटायेः ह्रीं नम:।
    प्रसाद – शहद, मावे की मिठाई, दूध, खीर और दूध से बनी मिठाईयां।

  • जाने कलावा बांधने के मूल नियम और इससे होने वाले फायदे

    धर्म: सनातन कालीन धर्म हिन्दू धर्म पुरातात्विक काल से लेकर आज तक का सबसे अच्छा धर्म माना जाता है। हिन्दू धर्म किसी की आलोचना नही करता यह सबको सकारात्मक रहने की प्रेरणा देता है और लोगो को एक सूत्र से बंधता है। वही अगर हम कलावा की बात करे तो हिन्दू धर्म मे कोई भी पूजा पाठ ऐसी नही है जो की इसके बिना पूरी हो सके। कलावा को रक्षा सूत्र माना जाता है।

    धर्म शास्त्रों के अनुसार कलावा ईश्वर का प्रतिबंध है। इसमे ईश्वर का वाश होता है। यह हमारी हर विपत्ति से रक्षा करता है। वही यह सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इसके प्रभाव से व्यक्ति का मन शांत रहता है और अगर आप कोई भी संकल्प करके अपने हाथ में कलावा बांधते हैं तो आपको उस काम मे सफलता प्राप्त होती है। 
    कलावा जब हाथ मे बांधा जाता है। तो इसके साथ कुछ मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। यह मंत्र कलावा की शुद्धि करते हैं और हमे ईश्वर के साथ जोड़ते हैं। लेकिन अगर आप कलावा बांधते समय सही मंत्रों का उच्चारण नही करते हैं तो इससे आपको कई नुकसान झेलने पड़ सकते हैं। तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं कलावा से जुड़े कुछ नियम ..

    जाने कब से शुरू हुई कलावा बंधाने की प्रथा-

    धर्म ग्रंथो में वर्णित कथाओं में कहा गया है कि कलावा सबसे पहले माता लक्ष्मी ने बांधा था। उन्होंने उस समय इस प्रथा की शुरुआत की जब भगवान विष्णु ने बामन अवतार लिया। कथा है कि राजा बलि ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे भी उनके साथ पाताल लोक में आकर रहें. विष्णु जी ने प्रसन्न होकर उसकी ये प्रार्थना स्वीकार कर ली।
    जब माता लक्ष्मी को पता चला कि भगवान विष्णु पाताल लोक चले गए हैं। तो वह उन्हें वापस लाने के लिए राजा बलि का पास गई। वह उनके सामने रोने लगी। जब राजा बलि ने उनसे पूंछा तुम क्यों विलाप कर रही हो। तो उन्होंने कहा मेरा कोई भाई नही है। राजा बलि ने माता लक्ष्मी की सान्त्वना दी और कहा आज से मैं तुम्हारा भाई हूँ। राजा की यह बात सुनकर माता ने उनके हाथ पर रक्षा सूत्र बांध दिया और राजा बलि से उपहार में विष्णु को मांग लिया। तब से कलावा बंधना महत्वपूर्ण हो गया।

    जाने कैसे बांधा जाता है कलावा-

    कलावा बांधते समय व्यक्ति को इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिए कि कलावा तीन बार से ज्यादा घुमाकर न बांधे। अगर आप तीन बार से ज्यादा घुमाकर कलावा बांधते हैं तो इससे इसका प्रभाव कम हो जाता है। वही तीन बार लपेटकर कलावा बांधने से ब्रह्मा विष्णु और महेश का आशीर्वाद प्राप्त होता है और व्यक्ति पर सरस्वती, माता लक्ष्मी और पार्वती की कृपा बनी रहती है।
    कलावा बांधते समय येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः, तेन त्वां मनुबध्नामि, रक्षंमाचल माचल’ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। इससे व्यक्ति को काफी लाभ प्राप्त होता है। कलावा बांधते समय व्यक्ति को अपनी मुट्ठी बांध लेनी चाहिए और महिलाओं को अपना सर दुपट्टे से ढक लेना चाहिए। अमावस्या के दिन कलावा खोल देना चाहिए और दूसरे दिन बांध लेना चाहिए। इसके अलावा सूतक काल के दौरान कलावा अशुद्ध हो जाता है। व्यक्ति को पुनः दूसरा कलावा विधि विधान के साथ बांधना चाहिए।
    वही अगर हम कलावा के वैज्ञानिक तर्क को समझे तो कलावा हाथ मे बांधा जाता है। हाथ से हमारे शरीर की सभी नसों का जुड़ाव होता है। कलावा बांधने से नसों की क्रिया नियंत्रित बनी रहती है. शरीर में त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ का संतुलन बनता है। इससे रोगों का नाश होता है।

  • 10 सालों बाद इस गणेश चतुर्थी पर बन रहा शुभ योग, ऐसे करें पूजा

    डेस्क। गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे देश में बड़ी ही धूमधाम से मनाए जाने वाला त्योहार है। इसको गणेश चतुर्थी हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इसको विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। 

    वहीं शास्त्रों की माने तो ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। जानकारी के अनुसार इस वर्ष गणेश चतुर्थी 31 अगस्त को पड़ रही है। 

    इस दिन सनातन धर्म में मानने वाले लोग गणेश जी की प्रतिमा को घर में लाते हैं और उनकी पूजा- अर्चना भी करते हैं। साथ ही अनंत चतुर्थी के दिन बहते हुए जल में बप्पा का विसर्जन कर उनको विदा किया जाता है। 

    पर इस साल एक दशक के बाद ऐसा दुर्लभ योग बन रहा है। जिसने इस त्योहार के महत्व को और भी बढ़ा दिया है। 

    वैदिक पंचांग की माने तो इस साल गणेश चतुर्थी पर एक ऐसा दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो भगवान गणेश के जन्मोत्सव के समय बना था इसके साथ ही बता दें कि यह संयोग 10 पहले बना था। वहीं शास्त्रों के अनुसार भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को दिन के समय में हुआ था। साथ ही यह दिन बुधवार का था। इस साल गणेश चतुर्थी के दिन भी कुछ ऐसा ही संयोग बन रहा है।

    इस साल भाद्र शुक्ल चतुर्थी तिथि बुधवार के दिन में रहेगी। वहीं इस शुभ संयोग में गणपति की पूजा करना भक्तों के लिए बेहद मंगलकारी होगा। 

    साथ ही भगवान गणेश जी की पूजा- अर्चना करने से सभी कष्टों का नाश और साथ ही घर में सुख- समृद्धि का वास रहेगा।

    जानिए गणेश पूजा शुभ मुहूर्त 

    अमृत योग- सुबह 07 बजकर 04 मिनट से लेकर 08 बजकर 41 मिनट तक रहेगा

    शुभ योग- सुबह 10 बजकर 14 से लेकर 11 बजकर 51 मिनट तक  है

    रवि योग- सुबह 5 बजकर 57 मिनट से देर रात 12 बजकर 12 मिटन तक रहने वाला है।

    इन योगों में गणेश जी की स्थापना और पूजा- अर्चना करना बहुत ही शुभ माना जाता है।

  • आज है हरितालिका तीज जरूर पढ़ें शिव पार्वती की यह कथा, मिलेगा फल

    आध्यात्मिक; आज हरितालिका तीज का कठोर व्रत है। इस दिन महिलाएं बिना अन्न पानी का ग्रहण किये शिव की पूजा आराधना करती है। उन्हें प्रसन्न करती है और अपने पति की दीर्घायु जीवन की कामना करती है। वही कुंवारी लड़कियां इस व्रत को अच्छा वर मिले यह कामना लेकर करती है। यह व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को होता है। इस साल यह व्रत आज यानी 20 अगस्त को पड़ा है।

    वही आज के दिन जो महिलाएं शिव पार्वती के तप की यह कथा सुनती है उन्हें इस व्रत का दोहरा फल मिलता है। धर्म ग्रन्थों के मुताबिक आज के दिन जो भी सच्चे मन से माता पार्वती और शिव की आराधना करता है। उनकी कथा सुनता है उसे उत्त्तम फल की प्राप्ति होती है। वही यह कथा कष्टकारी कथा कही जाती है। तो आइये जानते हैं उस कथा के बारे में जिसे सुनकर दूर होते है सभी पाप।
    पौराणिक कथाओं के मुताबिक माता सती शिव की अर्धांगिनी और प्रजापति दक्ष की पुत्री थी। शिवा और सती के विवाह से दक्ष अप्रसन्न थे। वह हेमशा शिव की अभेलना करते रहते थे। वही एक दिन उन्होंने अपने यहां एक यज्ञ का आयोजन किया। लेकिन उन्होंने इस यज्ञ में शिव को आमंत्रित नही किया। माता सती बिना बुलाए अपने पिता के यहां आयोजित यज्ञ अनुष्ठान में पहुंच गई। सभी लोग उन्हें देखकर अचंभित हुए। 
    वही जब उन्होंने देखो उनके पिता प्रजापति दक्ष ने उनके पति शिव को सम्मान नही दिया है। तो उन्होंने यज्ञ कुंड में कूदकर अपनी आहुति दे दी। लेकिन उसका और शिव का मिलन जन्म जन्मांतर का था। उन्होंने पुनर्जन्म लिया। वह दूसरे जन्म में हिलामय की पुत्री हुई। उनका नाम पार्वती था। उन्होंने पुनः कड़ी तपस्या की और शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया।
    पार्वती ने शिव को पाने के लिए कई दिनों तक बिना कुछ खाये पिये व्रत रखा। उसी समय यह तीज भी पड़ी थी। इस दिन पर निर्जल रही थी। तभी से महिलाएं तीज का व्रत उत्त्तम जीवन साथी प्राप्त करने के लिये रखती है। महिलाएं शिव पार्वती से अपने पति के साथ अपना अटुट साथ मांगती है। उनके उत्त्तम स्वास्थ्य की कामना करती है।

  • वास्तु शास्त्र के मुताबिक इन दिशा में बनवाएं घर का मुख्य द्वार

    धर्म– हिन्दू धर्म मे वास्तु शास्त्र का अपना एक अलग महत्व है। कहते हैं अगर घर मे रखी वस्तुएं वास्तु शास्त्र के मुताबिक ठीक है तो उसका लाभ घर के सभी लोगो को मिलता है। वही अगर वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की चीजें नही होती है तो वह जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालती है और घर के लोगो का इससे स्वास्थ्य और व्यवहार प्रभावित होता है। 

    वही आज हम इस लेख में आपको बताने जा रहे हैं घर के मुख्य द्वार के परिपेक्ष्य में वास्तु शास्त्र के कुछ नियम। जिनका अगर आप पालन करते हैं तो इससे आपके जीवन को काफी लाभ होगा और घर मे सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव होगा। 
    अगर आप अपना घर बनवा रहे हैं तो वास्तु शास्त्र के मुताबिक आपको अपने घर का द्वार उत्तर पूर्व या पूर्व पश्चिम दिशा में रखना चाहिए। वही अगर आपके घर मे इस दिशा में मुख्य द्वार नही बन पा रहा है और आप अपने घर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा में बनाना चाहते हैं तो आप अपने घर के मुख्य द्वार पर वास्तु पिरामिड रख सकते हैं। ऐसा करने से आपके दरवाजे का वास्तु अच्छा बना रहेगा। 
    वास्तु शास्त्र कहता है कि घर का मुख्य द्वार दक्षिणा वर्त खुलना चाहिए। इसके अलावा कभी भी मुख्य द्वार के करीब स्नान घर नही होना चाहिए। यह घर मे क्लेश का कारण बनता है। इसके अलावा आपको अपने घर का दरवाजा भी ठीक रंग से रंगवाना चाहिए। दरवाजा हमेशा हल्का पीला, बेज या लकड़ी जैसा होना चाहिए। 
    वास्तु शास्त्र के अनुसार मुताबिक किसी भी व्यक्ति को अपने घर के मुख्य द्वारा के आसपास कोई सामना नही रखना चाहिए। सभी को घर के मुख्य द्वार के आसपास सफाई रखनी चाहिए। किसी को भी मुख्य द्वार पर बैठकर खाना नही खाना चाहिए। अगर आप मुख्य द्वार पर गंदगी रखते हैं और वहां बैठकर खाना खाते हैं तो आपको धन की हानि होती है और आपके घर मे कभी भी बरक्कत नही होती है।

  • Ganesh Chaturthi 2022- इस गणेश चतुर्थी पर जाने आपके शरीर का कौन सा अंग है गणपति का वरदान

    Ganesh Chaturthi 2022: आज पूरा देश गणेश चतुर्थी का उत्सव मना रहा है। लोग खुशी खुशी बप्पा को अपने घर लेकर आए हैं। विधि विधान से सभी लोग अपने घरों में गणेश जी की स्थापना कर उनकी पूजा कर रहे हैं। वही धामिर्क ग्रन्थों के मुताबिक गणेश जी का स्वभाव बेहद शांत है। वह जल्द ही अपने भक्तों से प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी मनोकनाओं को पूरा करते हैं। कहते है जो भी सच्चे मन से गणेश जी की पूजा आराधना करता है उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और घर मे सुख सम्रद्धि का वास होता है।

    वही अगर हम भगवान गणेश के शरीर की बात करे तो उसके शरीर मे कई बड़े रहस्य छुपे हुए हैं। भगवान गणेश का एक एक अंग रहस्यमयी है। यह हमारे जीवन को सरल बनाने का उपाय अपने भीतर छुपाये हुए हैं। वही अगर हम इनके बताए गए मार्ग के मुताबिक काम करते हैं तो इससे हमारी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। तो आइये जानते हैं गणपति बप्पा की शरीरिक आकृति का क्या सम्बंध है हमारे जीवन से…

    बड़े बड़े कान- 

    सभी ने देखा होगा की गणेश जी के काम काफी बड़े बड़े होते है। वही धर्म ग्रन्थों के मुताबिक गणेश जी के बड़े कानो की तरह कुछ लोगो के कान काफी बड़े होते हैं। जिन लोगो के कान बड़े होते हैं उन्हें भाग्यशाली बताया गया है। कहा जाता है वह सौभाग्य लेकर जन्मे होते हैं। उन्हें कभी किसी कष्ट का सामना नही करना पड़ता है और उनकी आयु दीर्घकालिक होती है। यह अपनी बुद्धि के बलबूते पर वह सब हासिल कर लेते हैं जिसकी लोग कल्पना नही करते हैं। यह समस्या तौर पर बुराई से काफी दूर रहते हैं।

    चौड़ा मस्तक-

    सभी ने देखा है कि गणेश जी का मस्तक काफी चौड़ा और बड़ा होता है। वही मनुष्य भी कुछ ऐसे होते हैं जिनका मस्तक काफी चौड़ा और बड़ा होता है। धर्म ग्रन्थों में कहा गया है कि जिन मुनष्यों का मस्तक काफी चौड़ा और बड़ा होता है। वह बुद्धिमान होते हैं। उनके पास वैभव होता है। वह अपनी बुद्धि का उपयोग कर लोगो को खुद से बांधकर रखते हैं। बड़े मस्तक वाले लोगो के पास ज्ञान का भंडार होता है। यह लोग दूसरों की सोच से एक कदम आगे चलते हैं। जिसके कारण इन्हें कभी भी कोई नुकसान नही पहुंचा सकता है।

    टूटा दांत-

    धार्मिक ग्रन्थों में कहानी वर्णित है कि बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुरामजी से युद्ध हुआ था। इस युद्ध में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत तोड़ दिया और वे एकदंत कहलाने लगे। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत से पूरी महाभारत लिख डाली थी। उनके इस काम ने उनकी बुद्धि का परिचय दिया और सदुपयोग का संदेश दिया। वही कहा जाता है जिन लोगो का एक दांत टूटा होता है वह चीजो का सदुपयोग करना जानते हैं। उनके मन मे हार का भय नही होता। वह हर परिस्थिति में सिर्फ एक लालसा रखते हैं जीतने की। उनके कोई परास्त नही कर पाता और वह अपने दृढ़संकल्प से हर मुकाम हासिल कर लेते हैं।

    छोटी आंख-

    गणेश जी की आंखे छोटी होती है। वही धार्मिक ग्रन्थों में छोटी आंख वाले व्यक्ति को चिंतनशील बताया गया है। कहा जाता है जिस व्यक्ति की आंखे छोटी होती है वह निरंतर विचार में डूबे रहते हैं। उन्हें कभी किसी प्रकार का कष्ट नही होता। वह एक भी कदम बढ़ाने से पहले सोच समझ लेते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं। उनकी निरंतर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति उन्हें काफी आगे ले जाती है और उन्हें हर चीज के पीछे की कहानी जानने के लिए प्रेरित करती है।