Category: religious

  • बड़े ही धूमधाम से मनाई गई भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण की बरही महोत्सव

    अमेठी। भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण के जन्मदिन के 12 दिन बाद मनाया जाने वाला बरही महोत्सव समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का संदेश देता है।

    बाबा नंदमहर धाम में शुक्रवार देर शाम को भगवान श्रीकृष्ण बरही महोत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया। महोत्सव में बिरहा  गायन व सोहर, कजरी गीतों ने समां बांध दिया, मशहूर बिरहा गायक छविलाल पाल व महानन्द यादव ने क्षेत्र से पहुँचे सैकड़ो भगतो का गीत के माध्यम से मनमोह लिया और बिरहा के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के आदर्शों पर चल कर सामाजिक समरसता स्थापित करने का संदेश दिया।

    इस शुभ अवसर पर उदयराज यादव जिलापंचायत सदस्य महेंद्र यादव जिला पंचायत सदस्य यादव संगठनों के जिलाध्यक्ष प्रसपा प्रदेश सचिव ललित यादव पूर्व सपा प्रवक्ता विजय यादव सपा विधानसभा अध्यक्ष गिरीश यादव सपा ब्लाक अध्यक्ष जगप्रसाद यादव राज बहादुर यादव सुनील यादव यादव सेना ब्लाक अध्यक्ष शत्रुहन यादव सुभाष यादव उजागिर यादव उदयराज यादव अनुरूद्ध ऊर्फ मोनू यादव हर्ष यादव मुकेश यादव प्रवीण यादव मुरलीधर शुभम यदुवंशी सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।

  • Makar Sankranti 2022: मकर संक्रांति के दिन शुभ मुहूर्त में कर लें स्नान, बढ़ेगी समृद्धि , जानिए मंत्र-पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

    मकर संक्रांति 2022 का शुभ मुहूर्त- मकर संक्रांति का क्षण या सूर्य का मकर राशि में प्रवेश: दोपहर 02 बजकर 43 मिनट पर मकर संक्रांति का पुण्य काल: दोपहर 02 बजकर 43 मिनट से लेकर शाम 05 बजकर 45 मिनट तक मकर संक्रान्ति महा पुण्य काल: दोपहर 02 बजकर 43 मिनट से शाम 04 बजकर 28 मिनट तक।

    पूजा समय- संक्रांति का पुण्य काल 6 घंटे पूर्व से लेकर 6 घंटे बाद तक मान्य होता है। आप 14 जनवरी को सूर्य देव की पूजा सुबह 08 बजकर 43 मिनट के बाद प्रारंभ कर सकते हैं। 

    मकर संक्रांति पूजा मंत्र- इस दिन आपको सूर्य देव के मंत्र ॐ सूर्याय नम:, ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः, ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर: का जाप करते हुए पूजा कर सकते हैं। जी हाँ और इन तीन मंत्रों में से जो आप आसानी से उच्चारण कर सकें, उसका उपयोग करें।

    मकर संक्रांति पूजा विधि- सबसे पहले शुभ मुहूर्त में स्नान कर लें। स्नान के पानी में काला तिल, हल्का गुड़ और गंगाजल मिला लें। अब साफ वस्त्र धारण करें। एक तांबे के लोटे में पानी भर लें। इसके बाद उसमें काला तिल, गुड़, लाल चंदन, लाल पुष्प, अक्षत् आदि मिला लें। अब सूर्य देव को स्मरण करके उनके मंत्र का जाप करें। इसके बाद उनको वह जल अर्पित कर दें। अब आप उनसे अपने निरोगी जीवन और धन्य धान्य से पूर्ण घर देने की मनोकामना करें। ध्यान रहे इस दौरान सूर्य देव की पूजा के बाद शनि देव को काला तिल अर्पित करें। जी दरअसल आज के दिन सूर्य और शनि देव की काले तिल से पूजा करने पर दोनों ही प्रसन्न होते हैं।

  • क्यों रह गया था कृष्ण और राधा का प्रेम अधूरा

    आध्यत्मिक| पूरा देश कृष्ण और राधा के प्रेम की सराहना करता है लोग इन्हें प्रेम का प्रतीक बताते हैं। जब कभी भी प्रेम की मिशाल दी जाती है तो लोग राधा कृष्ण का जिक्र करते हैं। प्रेम में सबसे ऊपर अगर किसी का नाम आता है तो वह है राधा कृष्ण का है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की जब इन दोनों के बीच मे इतना प्रेम था तो यह वैवाहिक सूत्र में क्यों नहीं बंध पाए। तो आइए जानते हैं इसके पीछे के रहस्य को की राधा कृष्ण की पत्नी क्यों नहीं बन पाई…

    धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक कृष्ण राधा के प्रेम की कहानी मध्यकाल के अंतिम चरण ने भक्तिकालीन युग मे लोकप्रिय हुई और कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से इनके प्रेम में सजीवता ला दी। लोग कृष्ण और राधा के प्रेम से परिचित हुए। प्राचीन समय में रुक्मिनी, सत्यभामा, समेथा श्रीकृष्णामसरा प्रचलित थी जिसमें राधा का कोई जिक्र नहीं मिलता है। लेकिन कवियों की कल्पना में राधा को जीवित किया और प्रेम की व्याख्या की। बताया जाता है देवकी पुत्र श्रीकृष्ण कुछ समय तक गोकुल में रहे और उसके बाद वृंदावन चले गए थे जिसके बाद राधा और कृष्ण का प्रेम अधूरा रह गया।
    हिन्दू धर्म शास्त्रों के मुताबिक जब कृष्ण दस वर्ष के थे तब यह राधा से रूबरू हुए और दोनो में प्रेम परवान चढ़ा। मत है की राधा ने कृष्ण से विवाह के लिए इनकार कर दिया था। वजह के तौर पर पुराणों में लिखा है की राधा का मानना था की वह महलों में नहीं रह सकती वह एक ग्वालन है और उनका जीवन महल में रहने के लिए नहीं हुआ है। लोगों की चिंता में राधा ने कृष्ण के प्रेम को ठुकरा दिया उन्हें कृष्ण ने मनाने का प्रयास किया लेकिन वह नहीं मानी और कृष्ण को रुक्मिणी से विवाह करना पड़ा। वहीं यह भी कथा प्रचलित है की जब राधा ने कृष्ण से पूंछा की उनका और कृष्ण का विवाह क्यों नहीं हुआ तो कृष्ण ने उन्हें जवाब दिया मैं अपनी आत्मा से विवाह नहीं कर सकता तुम और मैं एक है। जिसके चलते हम कभी एक नहीं हो सकते।

  • Shivratri Vishesh : इस मुहूर्त में करें महादेव और माता पार्वती की आराधना-

    डेस्क। इस साल 1 मार्च, मंगलवार के दिन शिव और शक्ति के मिलन का महापर्व महाशिवरात्रि मनाई जा रही है। साथ ही में इस शिवरात्रि चतुर्ग्रही योग भी बनेगा। यह चतुर्दशी मुहूर्त एक मार्च सुबह 03:16 से शुरू होकर 2 मार्च सुबह 10 बजे समाप्त होगा। 

    शास्त्रों के अनुसार इस महापर्व पर शिव और पार्वती का विवाह हुआ था और भोलेनाथ ने वैराग्य जीवन को त्यागकर गृहस्थ जीवन को अपनाया था। वहीं कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इसी दिन भगवान शिव दिव्य ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। मान्यताओं के अनुसार इस दिन पूरे विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने पर मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

    जानिए पूजा के शुभ मुहूर्त-

    प्रथम प्रहर का मुहूर्त :1 मार्च शाम 6 बजकर 21 मिनट से रात्रि 9 बजकर 27 मिनट तक रहेगा।

    दूसरे प्रहर का मुहूर्त : 1 मार्च की रात 9 बजकर 27 मिनट से 12 बजकर 33 मिनट तक रहेगा।

    तीसरे प्रहर का मुहूर्त : तीसरे प्रहर में पूजा का शुभ मुहूर्त 1 मार्च रात्रि 12 बजकर 33 मिनट से सुबह 3 बजकर 39 मिनट तक होगा।

    चौथे प्रहर का मुहूर्त : 2 मार्च सुबह 3 बजकर 39 मिनट से 6 बजकर 45 मिनट तक। 

  • आखिर क्यों हो गई शनि देव की दृष्टि टेढ़ी

    आध्यात्मिक| अक्सर जब हम शनि देव का नाम सुनते हैं तो हम कांपने लगते हैं हमारे मन मे अनेकों सवाल आते हैं। हमारा मन घबराने लगता है और इनके प्रकोप से बचने के उपाय खोजने लगता है। क्योंकि शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है और धार्मिक ग्रन्थों के मुताबिक शनि जल्द ही प्रसन्न और रुष्ट हो जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक शनि को न्यायप्रिय या दंडाधिकारी के देवता की क्षेणी में रखा गया है। वहीं शनि के प्रकोप से बचने के लिए लोग कई प्रकार के उपाय भी करते हैं। कहते हैं शनि की कृपा हो तो व्यक्ति के सम्पूर्ण कष्ट नष्ट हो जाते हैं और अगर शनि आपसे रुष्ट हैं तो आपको उसका भयानक दुष्प्रभाव झेलना पड़ेगा। शनि के जन्म को लेकर हिन्दू के प्रमुख धार्मिक ग्रंथ स्कन्दपुराण में कहा गया है की राज दक्ष की एक कन्या थी संज्ञा जिसका विवाह सूर्यदेव के साथ हुआ था। सूर्यदेव का तेज इतना प्रज्वलित था की संज्ञा को चिंता होने लगी वह नित्य ही यह सोंचती की वह ऐसा क्या करे की वह सूर्य देव के इस तेज को कम कर सके। दिन बीतते गए और संज्ञा ने तीन संतान वैवस्वत मनु, यमराज, और यमुना को जन्म दिया। तब भी संज्ञा ने देखा की सूर्य देव का तेज कम नहीं हुआ। 

    संज्ञा ने विचार किया कि अब वह सूर्य के तप को कम करने हेतु तपस्या करेगी। लेकिन उनके मन मे यह चिंता थी की बच्चो का पालन पोषण कैसे होगा और सूर्य देव को इसकी भनक भी नहीं लगनी चाहिए। तब संज्ञा ने एक युक्ति निकाली और अपनी हमशक्ल को अपने सम्मुख खड़ा कर दिया। संज्ञा ने उसका नाम सवर्णा रखा और उसके भरोसे बच्चो को महल में छोड़कर वहां से अपने पिता के घर चली गई।
    संज्ञा जब पिता के घर पहुंची तो दक्ष में उसको क्रोध में आकर कसके डाँट पाटकर लगाई जिससे संज्ञा पिता के घर से तो वापस लौट आई लेकिन सूर्यदेव के महल न जाकर वन में चली गई ओर एक घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या में लीन हो गई। सूर्यदेव को इस बात की बिल्कुल भी भनक नहीं लगी की संज्ञा महल में नहीं है। सवर्णा छाया थी जिसके चलते उसे सूर्य देव से मिलने में कोई समस्या नही हुई और उससे भी तीन बच्चे हुए। मनु शनि और भद्रा। कहा जाता है शनि देव का जन्म जब हुआ तो इनके ऊपर छाया का प्रभाव देखने को मिला जिससे इनका रंग काला हो गया। शनि ने जब इन्हें देखा तो वह क्रोधित हो गए और इन्हें अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया। शनि में उनकी माँ के तप की शक्ति थी उन्होंने क्रोध में आकर सूर्य को देखा तो वह भी काले पड़ गए। उनके घोड़ो ने दौड़ना बन्द कर दिया। सूर्य को इस समस्या से निजात पाने के लिए भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी शिव ने उन्हें उनकी गलती बताई और जब उन्होंने पश्चाताप किया तो उनको उनका पुराना रूप मिला। लेकिन सूर्य के इस वर्ताव के बाद उस युग से आज तक शनि को सूर्य विद्रोही माना जाता है। 

    आखिर क्यों घातक बन गई शनि की नजर:- 

    ब्रह्मपुराण के मुताबिक शनि भगवान विष्णु के परम भक्त थे यह नित्य ही इनकी भक्ति में लीन रहते थे इन्हें पूजा और भगवान विष्णु के अलावा कुछ न दिखाई देता था न सुनाई। शनि देव का विवाह चित्ररथ की कन्या ऋतु से हुआ था। कहा जाता था विवाह के बाद भी यह अपनी पत्नी को वक़्त नही देते थे। एक रात ऋतु जब संतान प्राप्ति की इच्छा लिए शनि देव के पास पहुंची तो उसने देखा की वह विष्णु की भक्ति में लीन है वह इंतजार करती रही लेकिन शनि ने उनकी ओर नहीं देखा। रात खत्म हो गई और ऋतु ने क्रोध में आकर शनि देव को श्राप दिया की वह अब जिसपर भी अपनी नजर डालेंगे वह नष्ट हो जाएगा। जब शनि ने ऋतु की यह बात सुनी तो वह घबरा गए उन्होंने उसे मनाने की कोशिश की लेकिन कुछ नहीं हुआ और शनि देव सर झुकारकर रहने लगे।

  • गुस्से के चलते इस राशि के जातकों के सम्बंध हो सकते हैं खराब, यह करें उपाय

    आध्यात्मिक| गुस्सा मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है। यह व्यक्ति के बने हुए कामो को।बिगाड़ देता है। गुस्से के चलते न सिर्फ रिश्तों में कटुता आती है बल्कि रिश्ते बिल्कुल खराब हो जाते हैं। कई बार आपका अधिक क्रोध आपके घर मे क्लेश का कारण बनता है और घर की सुख समृद्धि नष्ट हो जाती है। लेकिन इस समय कुछ राशियों के योग इस प्रकार बन रहे हैं। कि वह संकेत दे रहे हैं कि उनका गुस्सा उनके रिश्ते के लिए काल बन जाएगा। तो आइए जानते हैं वह राशियां जिनकी राशि मे संकट लेकर आ रहा है उनका गुस्सैल स्वभाव…..

    कन्या:- इस राशि के जातक वैसे तो अत्यंत सरल स्वभाव के होते हैं। लेकिन गुस्सा इनकी नाम पर रहता है यह छोटी छोटी बातों में लोगो से गुस्सा हो जाते हैं। यह नहीं सोचते कि गुस्से में यह क्या बोल रहे हैं और इनके रिश्ते में दरार आ जाती है। इस समय इनकी राशि के ग्रहों में परिवर्तन हुआ है। जिसके चलते इन्हें संयम बरतने की आवश्यकता है। यदि यह अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाए तो इनके रिश्ते खराब होंगे और पारिवारिक कलह उत्पन्न होगी। उपाय के लिए यह पीले वस्त्र का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
    मीन:- इस राशि के जातकों को बनावटी पन कम पसन्द होता है। बनावटी स्वभाव से यह परहेज करते हैं। वही यदि कोई इनके सामने बनावटी अंदाज में आता है तो यह आग बबूला हो जाते हैं। इस समय इनके ग्रहों की स्थिति ठीक नहीं राहू का प्रकोप है। यदि सावधानी नहीं बरती तो प्रेमिका से सम्बंध खराब हो सकते हैं। उपाय के तौर पर यह मुख्य रूप से हरे रंग का अधिक प्रयोग करें।
    वर्षभ:- इस राशि के जातकों का समय पहले से ही खराब चल रहा था कि इनपर गुस्से के स्वामी शनि के प्रकोप के संकेत मिल रहे हैं। शनि के प्रकोप के चलते इन लोगो को गुस्सा अधिक आएगा। अपने गुस्से के चलते यह अपने बनते हुए काम बिगाड़ देंगे। इस माह प्रेम में पड़े युवक युवतियों को सावधान रहने की आवश्यकता है। उपाय के तौर पर इन्हें शनि की आराधना करने की आवश्यकता है। ज्यादा से ज्यादा गुलाबी रंग का प्रयोग करें।

  • कल से लग जाएगा होलाकष्ट, इन कार्यो को भूल से भी न करें-

    डेस्क। इस साल होली का त्योहार 18 मार्च को मनाया जाएगा। होली से 8 दिन पहले होलाष्टक शुरू हो जाता है यह आठ दिन पहले से होलिका दहन तक रहते हैं। धार्मिक मान्यताओं की माने तो होलाष्टक के दौरान किसी भी मांगलिक कार्य करने पर पाबंदी होती है। इसी कारण होलाष्टक प्रारंभ होने के साथ ही शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। माना जाता है कि होली से 8 दिन पहले तक सभी ग्रहों को स्वभाव उग्र हो जाता है इसी लिए सभी ग्रहों की स्थिति को शुभ नहीं माना जाता है। होलाष्टक की अवधि के दौरान किये गए मंगल कार्यों का फल प्राप्त नहीं होता है।

    होलाष्टक फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ हो जाते हैं और फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। होलिका के जलने के साथ होलाकष्ट भी समाप्त हो जातें हैं। इस बार होलाष्टक 10 मार्च से लगेंगे। फाल्गुन मास की अष्टमी तिथि 10 मार्च को 02 बजकर 56 मिनट पर लग जाएगी इसी के साथ होलाकष्ट प्रारंभ होगा। होलिका दहन 17 मार्च को होगा इसके साथ में ही होलाष्टक का अंत हो जाएगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति होलाष्टक के दौरान मांगलिक कार्य करता है तो उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, सारे काम उल्टे हो जाते हैं। इतना ही नहीं व्यक्ति के जीवन-घर में कलह और अकाल मृत्यु का खतरा भी मंडराने लगता है। 

  • Holi 2022 : होली पर कई सालों बाद बन रहा ये दुर्लभसंयोग, जानें होलिका दहन शुभ मुहूर्त

    फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन होली मनायी जाती है। इस दिन होलिका दहन की परंपरा है। रंगों और मेल मिलाप का यह पर्व पारंपरिक रुप से दो दिन मनाया जाता है। होली से आठ दिन पहले होलाष्टक प्रारंभ हो जाते हैं, जिनमें किसी भी तरह के शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। ज्योतिष की मानें तो इस बार होली पूर्णिमा के दिन कई दुर्लभ योगों का निर्माण हो रहा है। जिसके चलते होलिका दहन कई मायनों में शुभ फल प्रदान करने वाला होगा।

    होलिका दहन शुभ मुहूर्त 2022

    होली साल 2022 में होली 17 और 18 मार्च को है। 17 मार्च को होलिका दहन और 18 मार्च को रंगवाली होली खेली जाएगी।

    होलिका दहन शुभ मुहूर्त   17 मार्च रात्रि 09:06 बजे 10:16 बजे तक,

    भद्रा पूंछ 17 मार्च रात्रि 09:06 बजे से रात्रि 10:16 बजे तक,

    भद्रा मुख रात्रि 10:16 बजे से सुबह 12:13 बजे तक

    पूर्णिमा तिथि प्रारंभ 17 मार्च दोपहर 01:29 बजे

    पूर्णिमा तिथि समाप्त 18 मार्च दोपहर 12:47 बजे

    होली शुभ योग 2022 ज्योतिष के अनुसार इस बार होली पर कई शुभ योग बनने जा रहे हैं। इस साल होली के दिन वृद्धि योग, अमृत योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और ध्रुव योग का निर्माण हो रहा है। इसके अलावा बुध गुरु आदित्य योग भी बन रहा है। माना जाता है कि, बुध गुरु आदित्य योग में होली की पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। 

  • इस होली यह गुलाल का रंग बदलेगा आपकी किस्मत, जाने होलिका दहन का शुभ मुहूर्त

    आध्यात्मिक| होली का त्योहार हिन्दू धर्म मे बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार एकता का प्रतीक है। इस त्योहार के दिन लोग अपना बैर भुलाकर लोगों के साथ सहिष्णुता की भावना से जुड़ते हैं। लेकिन इस बार होली के रंगोउत्सव व होलिका दहन को लेकर लोगो के मन मे कई सवाल है सभी यह जानना चाहते हैं कि होलिका दहन और रंगोउत्सव का सही मुहूर्त क्या है और किस रंग के गुलाल से उनके भाग्य में होगा स्कारतकता परिवर्तन। 

    तो आइए जानते हैं होलिका दहन और रंगोउत्सव का उचित मुहूर्त:- 

    शास्त्र ज्ञान के मुताबिक इस बार होलिका दहन का शुभ मुहूर्त मध्य रात्रि के उपरांत 12:12 मिनट के उपरांत से आरंभ होगा। वही यह मुहूर्त सुबह 6:13 मिनट तक रहेगा। 
    वही यदि हम रंगों उत्सव की बात करें तो यह सुबह 10:15 मिनट से आरम्भ होगा और दोपहर के 3 बजे तक रहेगा। इस बार होली पर हर राशि के जातक के लिए विशेष योग बन रहे हैं और हर राशि के जातक को अपनी राशि के विशेष रंग के मुताबिक ही रंगोउत्सव का त्योहार मनाना चाहिए जिससे उसे इस होली पर हर तरफ से सुखद समाचार प्राप्त हो।

    जानिए किस राशि के जातकों को किस रंग के साथ मनाना चाहिए रंगोउत्सव:- 

    मेष- लाल
    वर्ष- सफेद
    मिथुन- हरा
    कर्क – सफेद 
    सिंह- गुलाबी 
    कन्या- हरा
    तुला- लाल
    वृश्चिक- पीला
    धनु- नीला
    मकर – नीला
    कुम्भ- पीला
    मीन- पीला
     

  • क्‍या होता है मांगलिक दोष ? कैसे प्रभावित करता है ये आपके जीवन को

    ज्योतिषाचार्य सुमित तिवारी

    मांगलिक के विषय में आईये जानते है सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य सुमित तिवारी जी से अधिकांश लोग मांगलिक दोष का अभिप्राय ‘मंगला’ या ‘मंगली’ होने से ही लगा लेते हैं। ऐसा समझा जाता है कि किसी भी कुंडली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में मंगल की उपस्थिति जातक को मंगला या मंगली बना देती है और यह भी मान लिया जाता है कि उस कुंडली से संबंधित लड़के या लड़की का दांपत्‍य जीवन अति कष्टपूर्ण होगा। पर, वस्तुतः ऐसा होता नहीं है और यदि हम कुछ और बारीकियों में जाएं तो पाएंगे कि दिनभर में जन्म लेने वाले 60 फीसदी से अधिक लोग या तो मंगला होते हैं या मंगली। लेकिन क्या इतने सारे लोगों का वैवाहिक जीवन असफल होता है? शायद नहीं।

     

    अगर हम थोड़ी और गहराई में जाएं तो पाएंगे कि सिर्फ मंगल ग्रह के कारण मांगलिक दोष नहीं उत्पन्न होते हैं, बल्कि इस दोष में शनि, सूर्य, राहु एवं केतु का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। मंगली दोष का विचार सिर्फ लग्न से करने पर परिणाम हमेशा सही नहीं आते और यह विचार करने का उचित तरीका भी नहीं है। इस योग का विचार लग्न के साथ साथ चंद्र एवं शुक्र से भी करना जरूरी है। लग्न से बनने वाले दोष कम प्रभावी होते हैं, चंद्रमा से कुछ ज्यादा और शुक्र से पूर्ण प्रभावी होते हैं, इसी प्रकार शास्त्रों में पाप ग्रहों में मंगल, शनि, सूर्य, राहु एवं केतु उत्तरोत्तर कम पापी माने गए हैं।

    इसलिए यह कहा जा सकता है कि मंगल, शनि, सूर्य राहु एवं केतु इन ग्रहों से बनने वाले योगों का प्रभाव उत्तरोत्तर कम होता जाता है। गहन अध्ययन एवं अनुसंधान के बाद यह पाया गया कि सप्तम, लग्न या चतुर्थ स्थानों पर उपर्युक्त ग्रहों से विशेषकर मंगल एवं शनि से बनने वाला योग दांपत्‍य जीवन को प्रभावित करता है और शेष स्थिति में बनने वाले योग का बहुत कम या तात्कालिक प्रभाव पड़ता है। मांगलिक दोष का विचार कुंडली में स्थित ग्रहों और राशि की स्थितियों के आधार पर भी करके निर्णय लेना चाहिए।

    मांगलिक दोष के परिहार :-

    1.मंगली दोष स्वतः समाप्त हो जाता है, जब मंगली योगकारक ग्रह अपने स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या उच्च राशि में हो।

    2.सप्तमेश या शुक्र बलवान हो तथा सप्तम भाव इनसे युत दृष्ट हो तो उस कुंडली में मंगल दोष स्वतः समाप्त हो जाता है।

    3.वर या कन्या में से किसी एक की कुंडली में मंगली दोष हो और दूसरे की कुंडली में शनि यदि लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो दोष स्वतः समाप्त हो जाता है।

    4.बलवान गुरु या शुक्र के लग्न के होने पर या सप्तम में होने पर एवं मंगल के निर्बल होने पर मंगली दोष समाप्त हो जाता है।

    5.मेष लग्नस्थ मंगल, वृश्चिक राशि में चतुर्थ भावस्थ मंगल वृष राशि मे सप्तम भावस्थ मंगल कुंभ राशि अष्टम भावस्थ मंगल तथा धनु राशि में व्यय भावस्थ मंगल दोष उत्पन्न नहीं करते।

    6.मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र – त्रिकोण में हो तो मंगली दोष प्रभावहीन हो जाता है।