Category: religious

  • जानिए आंखों को देखकर कौन है वफादार-कौन है धोखेबाज

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    आँखें आपकी शकसियत का आइना होती हैं। यह वह बात भी बोल देती हैं जो आप नहीं बोल पाते है। समुद्र शास्त्र में भी आंखों के बारे में जिक्र किया गया है और बताया गया है कि आप कैसे किसी से पहली बार मिलने पर ही उसके स्वभाव को अच्छे तरीके से जान सकते हैं।

    समुद्रशास्त्र के अनुसार, आंखों को देखकर हम पता लगा सकते हैं कि कौन वफादार और कौन धोखेबाज है। आइए आज हम आपको आंखों से जुड़े कुछ राज बताने जा रहे है जिनके माध्यम से आप दूसरों के बारे में सिर्फ उनकी आंखें देखकर पता लगा सकते हैं।

    नीली आंखें
    समुद्र शास्त्रों के अनुसार नीली आंखों वाले लोगों को बहुत चालाक कहा गया है। इन लोगों पर ज्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये लोग किसी भी तरह अपना मतलब निकालते है।

    भूरी आंखें
    समुद्रशास्त्र में भूरी आंखों वालों को स्वार्थी कहा गया है। कहते हैं जनि व्यक्तियों की आंखें भूरी होती है वह अपने मतलब से वास्ता रखने वाले होते हैं।

    आंखें टिकाए रखना
    ज्योतिष के अनुसार बात करते वक्त अगर कोई व्यक्ति आपके चेहरे पर आंखें टिकाए रखता हैं तो समझ लीजिए कि वह व्यक्ति अहंकारी है। ऐसे लोगों में बहुत आत्मविश्वास होता है और यह लोग सामने वाले पर अपना प्रभाव जताने की कोशशि करते हैं।

    काली आंखें
    काली आंखों वाले लोगों को समुद्रशास्त्र में गुणवान और ज्ञानी कहा गया है। ऐसे लोग अपने पार्टनर को जीवन में कभी भी धोखा नहीं देते है।

    बड़ी आंखें
    समुद्रशास्त्र में बताया गया है कि बड़ी आंखों वाले लोग बहुत वफादार होते हैं। इन्हें परोपकारी और अच्छे दिल वाले माना गया है। ऐसे लोगों से जरूरत के समय सहयोग मांगने पर कभी मना नही करते। मदद के लिए ये हमेशा तत्पर रहते हैं।

    गोलाकार आंखें
    गोलाकर आंखों वाले लोग समझदार तथा दूरदर्शी होते हैं। ये लोग अपना फैसला सोच-समझकर और जांच परखकर करते हैं। ऐसे व्यक्ति किसी भी चीज पर जल्दी यकीन नहीं करते हैं।

  • हैप्पी मकर संक्रांति 2021! गुड़ की मिठास, पतंगों की आस, आज मनाओ जमकर उल्लास…

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    हर पौष मास में आज 14 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाती है। इस त्यौहार को फेस्टिवल ऑफ काइट्स के नाम से जाना जाता है। इस दिन स्नान का महत्व बहुत अधिक होता है। कहा जाता है कि इस दिन अगर व्यक्ति गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, शिप्रा या नर्मदा नदियों में स्नान करे तो यह बेहद शुभ होता है। ऐसा करने से व्यकित को जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के दुष्चक्र से मोक्ष प्राप्त होता है। सूर्यदेव को समर्पित यह त्यौहार सूर्य के पारगमन के पहले दिन का संकेत देता है। इसी दिन सूर्य उत्तरायण हो जाता है। इस दिन हर कोई एक-दूसरे को शुभकामना देता है। ऐसे में अगर आप भी अपने दोस्तों और परिजनों को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं देना चाहते हैं तो हम आपको इस लेख में मकर संक्रांति के शुभकामना संदेश दे रहे हैं जिन्हें आप अपने दोस्तों को भेज सकते हैं।

    मकर संक्रांति पर भेजें ये शुभकामना संदेश:

    1. तन में मस्ती, मन में उमंग,

    चलो आकाश में डाले रंग,

    हो जाये सब संग संग,

    उडाए पतंग.. हैप्पी मकर संक्रान्ति

    1. सपनों को लेकर मन में,

    उड़ायेंगे पतंग आसमान में,

    ऐसी भरेगी उड़ान मेरी पतंग,

    जो भर देगी जीवन में खुशियों की तरंग।

    1. सूरज की राशि बदलेगी,

    कुछ का नसीब बदलेगा,

    यह साल का पहला पर्व होगा,

    जब हम सब मिल कर खुशियां मनाएंगे

    हैप्पी मकर संक्रांति 2021

    1. मंदिर की घंटी, आरती की थाली,

    नदी के किनारे सूरज की लाली,

    ज़िन्दगी में आये खुशियों की बहार,

    आपको मुबारक हो संक्रांत का त्यौहार

    हैप्पी मकर संक्रांति

    1. तिल हम हैं और गुड़ आप

    मिठाई हम हैं और मिठास आप

    साल के पहले त्यौहार से हो रही है आज शुरुआत

    आपको हमारी तरफ से

    हैप्पी मकर संक्रांति

    1. गुड़ की मिठास,

    पतंगों की आस,

    संक्रांति में मनाओ जमकर उल्लास,

    हैप्पी मकर संक्रांति 2021!

    1. मीठी बोली, मीठी जुबान,

    मकर संक्रांति पर यही है पैगाम!

    मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं…

    1. काट ना सके कभी कोई पतंग आपकी,

    टूटे ना कभी डोर आपके विश्वास की,

    छू लों आप जिंदगी के सारे कामयाबी,

    जैसे पतंग छूती है ऊंचाइयां आसमान की..

    मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!!

     

  • माघ पूर्णिमा पर हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा में किया स्नान

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    माघ पूर्णिमा पर हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा में स्नान कर विधि विधान से पूजा अर्चना कर पुण्य को प्राप्त किया। गंगातट पर भोर पहर से ही श्रद्धालुओं का हुजुम एकत्रित होने लगा था। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु स्वंय गंगा नदी में स्नान करते है।
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    शनिवार को माघ पूर्णिमा पर दूर-दराज से आये लोगो ने गंगा में स्नान कर पूजा पाठ करके भगवान विष्णु की उपासना की। हिन्दू धर्म मे माघ पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। माघ पूर्णिमा के दिन गंगा में जो भी स्नान करता है उसको सभी तरह के पुण्य की प्राप्ति होती है। माघ पूर्णिमा पर गंगा में स्नान और दान करने वाले व्यक्ति के सारे पाप मिट जाते है। मान्यता है कि भगवान विष्णु इस दिन स्वयं गंगा नदी में स्नान करते है। बताया जाता है कि माघ पूर्णिमा के दिन शुभ मुहूर्त में पूजा करने से बैकुंठ की प्राप्ति होती है। पद्धपुराण के अनुसार भगवान विष्णु जप,तप और स्नान से बाकी महीनों में उतना प्रशन्न नही होते है। जितना कि माघ महीने में स्नान करने से प्रशन्न होते है। माघ मास में दान का विशेष महत्व है। इस महीने में कंबल, गुड़ और तिल का दान सर्वोत्तम माना गया है।

  • 14 से शुरू माह-ए-रमजान, नहीं दिखा कल रमजनुल मुबारक का चांद

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    लखनऊ। मरकजी चांद कमेटियों ने सोमवार की देर शाम रमजनुल मुबारक का चांद न दिखने का एलान किया। इसके साथ ही 14 अप्रैल से पहला रोजा शुरू होने और माह-ए-रमजान में तिलावत की घोषणा की। ऐशबाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली की ओर से पहली बार दो पारे की तिलावत ऑनलाइन करने का निर्णय लिया गया। मौलाना ने कहा कि सोमवार को रमजनुल मुबारक का चांद नहीं दिखा। 14 अप्रैल से रमजानपाक महीने की शुरुआत होगी। कोरोना संक्रमण के चलते हर दिन रात्रि आठ बजे से नौ बजे तक इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के फेसबुक एकाउंट पर दो पारों की तिलावत का लाइव प्रसारण किया जाएगा। रोजेदार घर में रहकर शारीरिक दूरी बनाते हुए अनलाइन कुरआन पाक के दो पारे सुने और इसके बाद 20 रकआत तरावीह अदा करें।

    मौलाना ने कहा कि रमजान के पाक महीने में सभी देश व समाज से कोरोना की मुक्ति के लिए घर में ही दुआ करें। इफ्तारी की रकम से गरीबों को मजलूमों को भोजन कराएं। शारीरिक दूरी को कायम रखने के लिए सभी लोग घरों में नमाज अदा करें। मरकजी शिया चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ अब्बास नकवी ने भी चांद ने भी चांद न दिखने का एलान किया है। वहीं माह-ए-रमजान के चांद से पहले ईद का एलान करने वाले शिया धर्मगुरु मौलाना कब्ले सादिक के स्थान पर शनिवार को ही उनके बेटे कल्बे सिब्तैन नूरी ने परंपरा का निर्वहन कर दिवंगत पिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 14 अप्रैल को पहला रोजा होने और 14 मई को ईद का एलान कर दिया था।

    घर में ही करें अमन की दुआ

    कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते रमजान-ए-पाक महीने में घर में रहकर कोरोना से समाज को मुक्त करने और अमन की दुआ करें। यह ऐसा वक्त है कि हम सब मिलकर इस महीने में गरीबों और मजलूमों की मदत करें। शरीरिक दूरी बनाकर अल्लाह की इबादत करें।  -मौलाना कल्बे जवाद, इमाम-ए-जुमा, आसिफी मस्जिद 

    सुन्नत-ए-रसूल है खजूर से रोजा खोलना

    मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि रमजान में खजूर से रोजा खोलना सुन्नत-ए-रसूल है। ऐसे में रोजेदारों को रोजा खोलने के लिए खजूर बहुत मुश्किल से मिल पाएंगे। मौलाना ने सभी को संग्रमण को देखते हुए एहतियात बरतने की अपील की है।

     

  • ग्रहण कब और कहां पड़ेगा, जानिये इनके प्रभाव ।

    कोहिनूर तिवारी के साथ लव कौशिक की रिर्पोट 

    बलौदा , जांजगीर चांपा 

    2021 नया साल इस बार पुष्य नक्षत्र में शुरू हुआ है वहीं वर्ष 2021 में दो सूर्य और दो चंद्र ग्रहण पड़ेगे। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इनमें से कुछ ग्रहण भारत में दिखाई देंगे। वहीं, इस साल गुरु ग्रह के परिवर्तन से कुछ राशियों को फायदा भी हो सकता है।
    ऐसे में जहां इनकी दृश्यता नहीं होगी, वहां इनका सूतक काल भी प्रभावी नहीं होगा लेकिन जहां इनकी दृश्यता होगी, वहां ग्रहण का प्रभाव हर प्राणी के ऊपर किसी न किसी रूप से ज़रूर ही पड़ने वाला है। ।
    वर्ष 2021 में  10 जून और 4 दिसंबर को दो सूर्य ग्रहण होंगे। आने वाले वर्ष में धनु, मकर, कुंभ, राशि वालों पर साढ़ेसाती का प्रभाव बना रहेगा। मिथुन, तुला, राशि वालों को शनि की दृष्टि सताती रहेगी।

    सूर्य ग्रहण 2021 (Surya Grahan 2021)
    2021 में पहला सूर्य ग्रहण वर्ष के मध्य में, यानि 10 जून 2021 को घटित होगा तो वहीं साल का दूसरा सूर्य ग्रहण 4 दिसंबर 2021 को घटित होगा।

    : पहला सूर्य ग्रहण 2021
    यह ग्रहण आज 10 जून 2021  को 13:42 बजे से शुरु होकर 18:41 बजे तक रहेगा। इसका दृश्य क्षेत्र उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग, यूरोप और एशिया में आंशिक व उत्तरी कनाडा, ग्रीनलैंड और रुस में पूर्ण रहेगा।

    ये सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा। इसलिए भारत में इस सूर्य ग्रहण का धार्मिक प्रभाव और सूतक मान्य नहीं होगा।

    10 जून 2021 को लगने वाला सूर्य ग्रहण वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा। वलयाकार सूर्य ग्रहण उस घटना को कहते हैं, जब चंद्र पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए, सामान्य की तुलना में उससे दूर हो जाता है। इस दौरान चंद्र सूर्य और पृथ्वी के बीच होता है, लेकिन उसका आकार पृथ्वी से देखने पर इतना नज़र नहीं आता कि वह पूरी तरह सूर्य की रोशनी को ढक सके। इस स्थिति में चंद्र के बाहरी किनारे पर सूर्य काफ़ी चमकदार रूप से रिंग यानि एक अंगूठी की तरह प्रतीत होता है। इस घटना को ही वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते है।

    : दूसरा सूर्य ग्रहण 2021
    वर्ष 2021 का दूसरा व अंतिम सूर्य ग्रहण शनिवार,04 दिसंबर 2021 को 10:59 बजे से शुरु होकर 15:07 बजे तक रहेगा। यह ग्रहण अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका, अटलांटिक के दक्षिणी भाग, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका में दिखाई देगा।

    ये सूर्य ग्रहण भी भारत में नहीं दिखाई देगा। इसलिए भारत में इस सूर्य ग्रहण का धार्मिक प्रभाव और सूतक मान्य नहीं होगा।
    यह एक पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा। पूर्ण सूर्य ग्रहण उस स्थिति में होता है जब चंद्र,सूर्य और पृथ्वी के बीच में आकर सूर्य को ढक लेता है जिससे सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाता है।

  • आज लगेगा साल का पहला सूर्य ग्रहण, गलती से भी न करें 4 काम, हो सकते हैं गंभीर नुकसान

    इस साल का पहला सूर्य ग्रहण (Surya Grahan) 10 जून को लगेगा. यह वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा। यह खगोलीय घटना तब होती है जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि सूर्य ग्रहण की घटना को सीधे देखने से आंखों को नुकसान हो सकता है। इतना ही नहीं इससे सेहत पर भी कई प्रभाव पड़ते हैं। चलिए जानते हैं आपको किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

    कहां दिखाई देगा सूर्य ग्रहणइस सूर्य ग्रहण को भारत में केवल अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के कुछ हिस्सों में ही सूर्यास्त से कुछ समय पहले देखा जा सकेगा। एमपी बिरला तारामंडल के निदेशक देबीप्रसाद दुरई ने बताया कि सूर्य ग्रहण भारत में अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के कुछ हिस्सों से ही दिखाई देगा।

    सूर्य ग्रहण 2021 का समयअरुणाचल प्रदेश में दिबांग वन्यजीव अभयारण्य के पास से शाम लगभग 5:52 बजे इस खगोलीय घटना को देखा जा सकेगा। वहीं, लद्दाख के उत्तरी हिस्से में जहां, शाम लगभग 6.15 बजे सूर्यास्त होगा, शाम लगभग 6 बजे सूर्य ग्रहण देखा जा सकेगा। दुरई ने बताया कि उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया के बड़े क्षेत्र में सूर्य ग्रहण को देखा जा सकेगा।

    सूर्य ग्रहण के नुकसानमाना जाता है कि बिना सुरक्षा ग्रहण देखने से आंखों पर बुरा असर पड़ता है। इससे आंखों की रोशनी खत्म होने और पूरी तरह से अंधेपन होने का खतरा होता है।वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्य ग्रहण पर मून फुल मून की तुलना में चार लाख गुना ज्यादा चमकदार होता है, जो सीधे रूप से आंखों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि कुछ सावधानियां अपनाकर आप इस दृश्य का आनंद ले सकते हैं।

    नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) के अनुसार, हर किसी को ग्रहण के समय चश्मा पहनना चाहिए या आंशिक सूर्यग्रहण देखने पर अप्रत्यक्ष रूप से देखने की विधि का उपयोग करना चाहिए। सूरज की किरणों को सीधे देखना कभी भी सुरक्षित नहीं है, भले ही सूर्य आंशिक रूप से अस्पष्ट हो।नासा का यह भी मानना है कि यह नियम कुल ग्रहण (total eclipse) के दौरान भी लागू होता है जब तक कि सूरज पूरी तरह से अवरुद्ध न हो।

    अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी के अनुसार, बिना सुरक्षा थोड़े समय के लिए भी सूरज को देखना आपके रेटिना को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है।

  • यज्ञोपवीत संस्कार और इसका धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

    संकलन– पं.अनुराग मिश्र “अनु”, अध्यात्मिक लेखक व कवि

    सनातन धर्म में किये जाने वाले कुल संस्कारों की संख्या 16 है।उन्हें क्रमशः गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह एवं अंत्येष्टि कहा जाता है।

    हिंदू धर्म के अनुसार इन 16 संस्कारों का हमारे जीवन में  बहुत ही महत्व माना गया हैइन्हीं 16 संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार है यज्ञोपवीत संस्कार । यज्ञोपवीत का अर्थ है  यज्ञोपवीत = यज्ञ +उपवीत, अर्थात जिसे यज्ञ करने का पूर्ण रूप से अधिकार हो | संस्कृत भाषा में जनेऊ को यज्ञोपवीत‘ कहा जाता है। यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण किये बिना किसी को भी वेद पाठ या गायत्री जप का अधिकार प्राप्त नहीं होता | जनेऊ सूत से बना एक पवित्र धागा होता है, जो यज्ञोपवीत संस्कार‘ के समय पुरोहित के द्वारा पूजन व मंत्रों के द्वारा अभिमंत्रित करके धारण कराया जाता है। । ब्राह्मणक्षत्रिय और वैश्य समाज में  यज्ञोपवीत संस्कार‘ की परंपरा है। बालक की आयु 10-12 वर्ष का होने पर उसका यज्ञोपवीत  किया जाता है। प्राचीन काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलता था। यह प्राचीन परंपरा न केवल धर्म के अनुसार वरन वैज्ञानिक कारणों से भी बहुत महत्व रखती है।

    यज्ञोपवीत (जनेऊ) को ब्रह्मसूत्रयज्ञ सूत्रव्रतबन्ध और बलबन्ध भी कहते हैं। वेदों में भी जनेऊ धारण करने की आज्ञा दी गई है। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं।उपनयन‘ का अर्थ हैपास या निकट ले जाना। जनेऊ धारण करने वाला व्यक्ति ब्रह्म (परमात्मा) के प्रति समर्पित हो जाता है | जनेऊ धारण करने के बाद व्यक्ति को विशेष नियम आचरणों का पालन करना पड़ता है |

    यज्ञोपवीत (जनेऊ) तीन धागों वाला सूत से बना पवित्र धागा होता है | जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है, यानी इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

    कौन कर सकता है जनेऊ धारण?

    सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है कि वो जनेऊ धारण करे और उसके नियमों का पालन करे ।

    यज्ञोपवीत (जनेऊ)  के प्रकार :-

    तीन धागे वाले, छह धागे वाले जनेऊ |

    किस व्यक्ति को कितने धागे वाले यज्ञोपवीत (जनेऊ)  धारण करना चाहिए ?

    ब्रह्मचारी के लिए तीन धागे वाले यज्ञोपवीत (जनेऊ) का विधान है, विवाहित पुरुष को छह धागे वाले यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करना चाहिए | यज्ञोपवीत (जनेऊ) के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे उसकी अर्धांगिनी अर्थात पत्नी के बताये गए हैं। आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली कन्या को भी जनेऊ धारण का अधिकार है।

    यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने वाले के लिए नियम :-

     1. यज्ञोपवीत (जनेऊ) को मल-मूत्र त्यागने से पहले दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि यज्ञोपवीत (जनेऊ) कमर से ऊंचा रहे और अपवित्र न हो।

    2. यज्ञोपवीत (जनेऊ) का कोई धागा टूट जाए या मैला हो जाएतो उसे तुरंत बदल देना चाहिए।

    3. परिवार में किसी के जन्म-मरण के सूतक के बाद भी इसे बदल देना चाहिए।

    4. यज्ञोपवीत (जनेऊ) शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता इसे साफ करने के लिए उसे गले में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेना चाहिए। एक बार यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करना चाहिए।

     यज्ञोपवीत (जनेऊ) में तीन सूत्र क्यों ?

    यज्ञोपवीत में मुख्‍यरूप से सूत्र तीन होते हैं हर सूत्र में तीन धागे होते हैं। पहला धागा इसमें उपस्थित तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा,विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं जो यज्ञोपवीत धारण करने वाले पर हमेशा कृपा करते है । दूसरा धागा देवऋणपितृऋण और ऋषिऋण को  दर्शाता हैं और तीसरा सत्वरज और तम इन तीनो गुणों की सगुणात्मक रूप से बढ़ोतरी हो । जनेऊ केवल धार्मिक नजरिए से ही नहींबल्कि सेहत के लिए भी अत्यंत लाभकारी है I जनेऊ पहनने के लाभों की यहां संक्षेप में चर्चा की गई है I

    यज्ञोपवीत (जनेऊ) पहनने के लाभ –

    कब्ज से बचाव : जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता हैजिसका संबंध सीधे आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की शिकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मनदोनों ही सेहतमंद रहते हैं।

    गुर्दे की सुरक्षा : यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए। उक्त दोनों नियमों का पालन करने से किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता। जनेऊ धारण करने से यह दोनों ही नियम अनिवार्य हो जाते हैं।

    लकवे से बचाव : जनेऊ धारण करने वाला आदमी को लकवे मारने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दांत पर दांत बैठा कर रहना चाहिए। मल मूत्र त्याग करते समय दांत पर दांत बैठाकर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।

    स्मरण शक्ति की रक्षा : कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्ति का क्षय नहीं होता है। इससे स्मृति कोष बढ़ता रहता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें प्रभावी हो जाती हैंजिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल गलतियां करने पर बच्चों के कान पकड़ने या ऐंठने के पीछे भी मूल कारण यही होता था।

    जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव : जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैंवे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।

    शुक्राणुओं की रक्षा : दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैंजिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैंजिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्धि होती है।

    आचरण की शुद्धता से बढ़ता मानसिक बल : कंधे पर जनेऊ हैइसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है। पवित्रता का अहसास होने से आचरण शुद्ध होने लगते हैं। आचरण की शुद्धता से मानसिक बल बढ़ता है।

    हृदय रोग व ब्लड प्रेशर से बचाव : शोधानुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लड प्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है। चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता हैक्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।

    बुरी आत्माओं से रक्षा :- ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला खुद पवित्र आत्म रूप बन जाता है और उसमें स्वत: ही आध्यात्मिक ऊर्जा का विकास होता है।

    जनेऊ संस्कार के 10 महत्व:
    यह अति आवश्यक है कि हर हिन्दू परिवार धार्मिक संस्कारों को महत्व दे I घर में बड़े बुजुर्गों का आदर व आज्ञा का पालन होअभिभावक  बच्चों  के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन समय पर करते रहे। धर्मानुसार आचरण करने से सदाचारसद्बुद्धिनीति-मर्यादासही – गलत का ज्ञान प्राप्त होता है और घर में सुख शांति रहती है।

    1. जनेऊ यानि दूसरा जन्म (पहले माता के गर्भ से दूसरा धर्म में प्रवेश से) माना गया है।
    2. उपनयन यानी ज्ञान के नेत्रों का प्राप्त होनायज्ञोपवीत यानी यज्ञ – हवन करने का अधिकार प्राप्त होना।
    3. जनेऊ धारण करने से पूर्व जन्मों  के बुरे कर्म नष्ट हो जाते हैं।
    4. जनेऊ धारण करने से आयुबलऔर बुद्धि में वृद्धि होती है।
    5. जनेऊ धारण करने से शुद्ध चरित्र और जपतपव्रत की प्रेरणा मिलती है।
    6. जनेऊ से नैतिकता एवं मानवता के पुण्य कर्तव्यों को पूर्ण करने का आत्मबल मिलता है।
    7. जनेऊ के तीन धागे माता-पिता की सेवा और गुरु भक्ति का कर्तव्य बोध कराते हैं।
    8. यज्ञोपवीत संस्कार बिना विद्या प्राप्तिपाठपूजा अथवा व्यापार करना सभी निरर्थक है।
    9. जनेऊ के तीन धागों  में लड़ होती हैफलस्वरूप जनेऊ पहनने से ग्रह प्रसन्न रहते हैं।
    10. शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण बालक 09 वर्षक्षत्रिय 11 वर्ष और वैश्य के बालक का 13 वर्ष के पूर्व संस्कार होना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में विवाह योग्य आयु के पूर्व अवश्य हो जाना चाहिये।

    जनेऊ धारण करने का मंत्र है

    यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
    आयुष्यमग्रं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ।।

    (पारस्कर गृह्यसूत्रऋग्वेद२/२/११)

    छन्दोगानाम्:

    ॐ यज्ञो पवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीतेनोपनह्यामि।।

    यज्ञोपवीत उतारने का मंत्र-

    एतावद्दिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया।
    जीर्णत्वात्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम्।।

     

     

     

    संकलन– पं.अनुराग मिश्र “अनु”

    अध्यात्मिक लेखक व कवि

  • क्या होते है सदगुरु के सात लक्षण, गुरु पूर्णिमा पर विशेष

    सनातन परंपरा में गुरु पूर्णिमा का पवित्र पर्व उन सभी आध्यात्मिक गुरुओं को समर्पित है जिन्होंने कर्म योग के सिद्धांत के अनुसार स्वयं व अपने शिष्यों के साथ ही सदैव संपूर्ण जगत के कल्याण की ही कामना की। गुरु पूर्णिमा का पर्व भारत, नेपाल और भूटान में हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायी बड़े ही उत्साह व हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। यह पर्व  अपने आध्यात्मिक गुरुओं के सम्मान और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का एक दुर्लभ क्षण है । हिन्दू पंचांग के अनुसार  आषाढ़  मास की पूर्णिमा को ही ‘गुरु पूर्णिमा’ कहा जाता है । हिन्दू परम्परा के अनुसार ‘गुरु पूर्णिमा’ का पर्व वेदों के रचयिता ‘महर्षि वेदव्यास’ के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है इसलिए इसका एक प्रचलित नाम ‘व्यास पूर्णिमा’ भी है ।

    गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है,प्रायः इसी दिन से ‘चातुर्मास’ या ‘चौमासा’ का भी प्रारंभ माना जाता है,इस वर्ष चातुर्मास 20 जुलाई से प्रारंभ हुआ है । चातुर्मास को ऋतुओं का संधिकाल भी कहा जाता है इस दिन से चार माह तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं क्योंकि इन चार महीनों में न ही अधिक गर्मी और न ही अधिक सर्दी होती है अतः ये माह अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गये हैं जिस प्रकार सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

    हिन्दू धर्म शास्त्रों में गुरु का दुर्लभ लक्षण भी बताया गया है जिसके अनुसार ‘गु’ का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और ‘रु’ का अर्थ है- उसका निरोधक अर्थात नष्ट करने वाला ।
    अर्थात जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की प्राप्ति की ओर ले जाये उसे ही ‘गुरु’ कहा जाता है ।
    “अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया, चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवे नमः”
    सनातन परम्परा में गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान प्राप्त है इसीलिए कहा गया है –

    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
    गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

    श्रीरामचरितमानस के रचयिता और परम श्रीराम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी नें श्रीरामचरितमानस को सद्गुरु की उपाधि दी है और श्रीरामचरित मानस के सात कांडों को सद्गुरु के सात लक्षण बताया है I गोस्वामी जी ने हमें हर कांड के माध्यम से ये बताने व समझाने का दुर्लभ प्रयत्न किया है कि एक सच्चे गुरु में कौन कौन से दिव्य लक्षण होने चाहिये,अतः हम श्रीरामचरितमानस के सातो कांड के माध्यम से सदगुरु के उन सात दिव्य लक्षणों को समझने का प्रयास करते हैं –
    १- बालकाण्ड – बाल अर्थात बालक अर्थात निर्मल व शुद्ध ह्रदय I द्वेष,जलन,छल,कपट,राग-वैराग्य,झूँठ-पाखंड,ऊँच-नीच से मुक्त ह्रदय Iये सद्गुरु का पहला लक्षण है I
    २- अयोध्या कांड – यह अध्याय श्रीरामचरितमानस के सभी पात्रों के त्याग का विलक्षण उदाहरण है इस अध्याय में महाराजा दशरथ,भगवान श्रीराम,माता सीता जी,लक्ष्मण जी,कौशल्या जी,भरत जी,समस्त अयोध्यावासियों व अन्य सभी लोगों के द्वारा जो त्याग किया गया है उसकी महिमा अपरम्पार है I यह है सद्गुरु का दूसरा लक्षण अर्थात त्याग भावना I
    ३- अरण्यकांड- इस अध्याय में प्रभुश्रीराम अपने रथ को त्याग कर अपने पिता को दिए वनवास के वचन को निभाने हेतु पैदल यात्रा करते हुए बिना किसी जातिगत भेदभाव के सभी वर्णों के लोगों के यहाँ गए जैसे निषादराज गुह,केवट,भारद्वाज ऋषि, महर्षि वाल्मीकि,अत्रिमुनि,सती अनुसूया,शबरी इत्यादि I यह अध्याय हमें सिखाता है कि सद्गुरु वो है जो निरंतर गतिशील रहे उसके ह्रदय में जाति,पंथ व पद का कोई भी भेद ना हो फिर चाहे उसका शिष्य किसी राजा का पुत्र हो या सामान्य दास पुत्र I
    ४- किष्किन्धा कांड- इस अध्याय में प्रभुश्रीराम ने वानरराज सुग्रीव को अपना सखा बना कर उसका  खोया हुआ राजसिंहासन पुनः वापस दिलाया है I यही सद्गुरु के लक्षण हैं कि वो अपने शिष्य से मित्रवत व्यवहार रखकर सफलतापूर्वक उसका मार्गदर्शन करते हुए उसको धर्म व सदमार्ग के रास्ते पर लेकर जाये I भगवतगीता में भगवान ने कभी भी अर्जुन को शिष्य न कहकर अपना “सखा” ही कहा है, हे अर्जुन तुम मेरे “सखा” हो I
    ५- सुन्दरकाण्ड – सम्पूर्ण श्रीरामचरितमानस में “सुन्दरकाण्ड” ही एक ऐसा अध्याय है जिसकी इस  कलिकाल में सबसे अधिक महत्ता है I “सुन्दरकाण्ड” में महाबली हनुमान जी के द्वारा लंका-दहन किया गया है ! पूज्य संतों द्वारा लंका-दहन का तात्पर्य यह बताया गया है कि हमारे जीवन में जो काम-क्रोध-मद-लोभ नामक चार विकार हैं उनका पूर्णतया दहन कर देना I जो गुरु साधक के इन चार विकारों का सफलतापूर्वक दहन करवा दे वही सच्चा सदगुरु है I
    ६- लंकाकांड – इस अध्याय में लंकापति रावण का वध प्रभुश्रीराम ने उसकी नाभि में बाण मारकर किया इसका अर्थ ये है कि जो गुरु शिष्य के मनरुपी नाभि के विकारों को छेद दे और मोहरूपी रावण का वध कर दे वही सच्चा सद्गुरु है I
    ७- उत्तरकाण्ड – उत्तर अर्थात समाधान अर्थात निष्कर्ष I शिष्य के मन-मस्तिष्क में उठ रहे प्रत्येक प्रश्न का समुचित उत्तर देकर उसका समुचित समाधान करना ही सद्गुरु का सातवां व अंतिम लक्षण व कर्तव्य है I
    इस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के सातों अध्याय के माध्यम से ‘सद्गुरु’ के सात लक्षणों को परिभाषित किया गया है I हिन्दू मान्यता के अनुसार गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें अंधकार से प्रकाश अर्थात अज्ञान से ज्ञान के मार्ग पर प्रशस्त करने का एक सुगम व सरल मार्ग दिखाता है I

      लेखक-पं. अनुराग मिश्र ‘अनु’
    स्वतंत्र पत्रकार व आध्यात्मिक लेखक

     

  • सावन के पहले सोमवार पर नागेश्वरनाथ के अभिषेक को लगी लंबी कतार

    पवन कुमार की रिपोर्ट

    अयोध्या

    सावन का पहले सोमवार पर भगवान नागेश्वरनाथ महोदव के अभिषेक के लिए भक्तों की लंबी कतार हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु सरयू स्नान कर नदी के जल से नागेश्वरनाथ का पूजन रहे हैं। कोरोना कॉल को देखते हुए प्रशासन छोटे समूहों में लोगों को पूजन की अनुमति दे रहा है। सावन के पवित्र माह में सरयू स्नान व नागेश्वरनाथ के अभिषेक का विशेष महत्व है। सरयू को भगवान विष्णु के नेत्र से पैदा होने के कारण उनका एक नाम नेत्रजा भी है। भगवान विष्णु व शिव दोनों एक दूसरे की भक्ति में लीन रहते हैंl इस कारण सरयू जल से नागेश्वरनाथ के अभिषेक को बहुत ही फलदायक माना गया हैं नागेश्वरनाथ मंदिर के आसपास भक्तों की भीड़ के साथ चोरों का गिरोह भी सक्रिय रहा l

    यहां चोरी के आरोप मे कई महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में लिया है। आरोप है कि मंदिर में आने जाने वाले श्रद्धालुओं की पर्स और जेवरात यह गिरोह गायब कर देता था। नागेश्वर नाथ मंदिर के बाहर लगी श्रद्धालुओं की भीड़ के सीसीटीवी फुटेज और महिला पुलिस कर्मियों की सक्रियता के चलते आरोपी महिलाओं को पकड़कर थाने भिजवाया गया। महिला थानाध्यक्ष साधना सिंह ने बताया कि अयोध्या में सावन के पहले सोमवार पर लाखों श्रद्धालु अयोध्या पहुंचते हैं, जोकि सरयू में स्नान कर नागेश्वर नाथ मंदिर में दर्शन पूजन कर हनुमानगढ़ी व कनक भवन में भी दर्शन पूजन करते हैं l लेकिन इस बार महामारी को देखते हुए श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा लगाई गई है। जिसके लिए कई स्थानों पर बैरियर लगाए गए हैं। और भीड़ वाले स्थान पर लोग छोटे-छोटे टुकड़ियों में भेजे जा रहे हैं। जिससे मंदिरों में अधिक भीड़ न हो सके।

  • ‘श्रवण’ के चंद्र मास में ‘पूर्णामी’ को ‘झुलाना पूर्णिमा’ या ‘गम्हा पूर्णिमा’ कहा जाता है

    शुभ दिन भगवान बलभद्र के जन्मदिन का प्रतीक है। घटना को चिह्नित करने के लिए बदादेउला और मार्कंडा पुष्करणी (तालाब) के पास विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इस दिन देवताओं को ‘गाम्हा मांड’ नामक एक विशेष ‘भोग’ की पेशकश की जाती है। आज इस अवसर पर देवताओं के पास ‘भोग मंडप’ की समाप्ति के बाद श्री सुदर्शन एक पालकी पर चढ़कर मारकंडा तालाब तक जाते हैं। मार्कंडा तालाब में सेवक भगवान बलभद्र की मिट्टी की मूर्ति बनाते हैं और विशेष अनुष्ठान करते हैं। सेवक मंत्रों का जाप करते हैं और मूर्ति में प्राण फूंकते हैं। तत्पश्चात, तालाब में विसर्जित करने से पहले मूर्ति को ‘भोग’ चढ़ाया जाता है। आज पुरी के जगन्नाथ मंदिर में ‘राखी लागी नीति’ भी की जाती है। परंपरा के अनुसार, पतारा बिसोई सेवक ‘पटा राखी’ तैयार करते हैं, जिसे देवी सुभद्रा भगवान बलभद्र और भगवान जगन्नाथ से बांधती हैं। इस अवसर पर देवताओं को ‘गुआमाला’ (सुपारी की माला) भी चढ़ाया जाता है।