Category: religious

  • पैतृक अनुष्ठान करते समय इन बातों का रखें ध्यान

    पैतृक अनुष्ठान करते समय इन बातों का रखें ध्यान

    इस वर्ष पितृ पक्ष श्राद्ध (02 सितंबर दिन बुधवार) से प्रारंभ हो गए है, जो 17 सितंबर तक चलेंगे। इन दिनों में पितरों को पिंडदान करते हैं, जिससे वे तृप्त होते हैं। इससे परिवार में सुख, समृद्धि और शांति आती है। पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म के भी नियम होते हैं, जिसका पालन करना आवश्यक माना गया है। इन नियमों से श्राद्ध कर्म को पूरा करने से पितर तृप्त होते हैं।

    हिंदू धर्म में देवों के समान ही पितरों को भी बहुत विशेष स्थान देते हैं। ऐसे में पौराणिक मान्यताओं को माना जाए तो देवों से पहले पितरों की पूजा अर्चना का विधान है। ऐसी मान्यता है कि इन 16 दिन हमारे पितृ पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। इन दिनों में पितरों को पिण्ड दान तथा तिलांजलि कर उन्हें संतुष्ट करना चाहिए।

    तर्पण या पिंडदान…
    अपने पितरों को तृप्त करने की क्रिया तथा देवताओं, ऋषियों या पितरों को काले तिल मिश्रित जल अर्पित करने की प्रक्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण ही पिंडदान कहलाता है। पितरों को तृप्त करने के लिए श्रद्धा पूर्वक जो प्रिय भोजन उनको दिया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है।

    श्राद्ध के नियम…
    पितरों के श्राद्ध के लिए कुछ नियम हैं, जिनका अनुसरण करना जरूरी है। आइए उन नियमों के बारे में जानते हैं।

    1. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितर लोक दक्षिण दिशा में होता है। इस वजह से पूरा श्राद्ध कर्म करते समय आपका मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।

    2. पितर की तिथि के दिन सुबह या शाम में श्राद्ध न करें, यह शास्त्रों में वर्जित है। श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर में करना चाहिए।

    3. पितरों को तर्पण करने के समय जल में काले तिल को जरूर मिला लें। शास्त्रों में इसका महत्व बताया गया है।

    4.
     पितरों को जो भी भोजन दें, उसके लिए केले के पत्ते या मिट्टी के बर्तन का इस्तेमाल करें। जो लोग इन नियमों का पालन करते हुए श्राद्ध कर्म को पूरा करते हैं, वे स्वर्ग के भागी बनते हैं।

    5. 
    श्राद्ध कर्म के पूर्व स्नान आदि से निवृत्त होकर व्यक्ति को सफेद वस्त्र धारण करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करें, मांस-मदिरा का सेवन न करें। मन को शांत रखें।

  • काशी के इस अनोखे मंदिर में राम-जानकी संग विराजमान रहेंगे मानस के सभी पात्र

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    वाराणसी। भगवान भोलेनाथ की नगरी काशी में एक ऐसा मंदिर बनने जा रहा है, जिसमें श्रीराम व जानकी सहित कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां विराजमान की जाएंगी। शुरुआत नवरात्र के पहले दिन श्रीगणेश एवं दत्तात्रेय के मंदिर निर्माण के लिए शिला और भूमि पूजन से हो चुकी है।

    महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही स्थित सुभाष भवन के पास यह मंदिर बनने जा रहा है। इसमें भगवान श्रीराम के भाइयों, इनकी माताओं, पिता, हनुमान, जामवंत, नल-नील, जटायु, विभीषण आदि की मूर्ति रहेंगी। इस तरह रामचरित मानस से जुड़े प्रमुख पात्रों के साथ ही सहायक पात्रों का भी एक साथ दर्शन हो जाएगा।

    इसी कड़ी में गत दिनों विशाल भारत संस्थान एवं श्री इंद्रेश आश्रम के संयुक्त तत्वाधान में नौ दिवसीय हनुमान चालीसा हवनात्मक महायज्ञ भी शुरू हुआ। जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी परिषद के सदस्य इंद्रेश कुमार ने अयोध्यापति प्रभु श्रीराम के प्रति आस्था को जन-जन व कण-कण तक पहुंचाने के लिए श्रीरामपंथ का शुभारंभ किया। इसके लिए बीएचयू के प्रोफेसर डा. राजीव कुमार श्रीवास्तव ने वैदिक ब्राह्मणों के मंत्रोचार के बीच विधि-विधान के साथ संत दीक्षा एवं गुरु मंत्र प्राप्त किया है। समाजिक कार्यकर्ता व संस्थान के संस्थापक डा. राजीव कहते हैं ‘रामराज की स्थापना में जो देवी-देवता सहायक रहे उनका एक ही मंदिर में दर्शन होगा। मंदिर के बनने में करीब एक करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है। बताया कि प्रत्येक रविवार को श्रीराम की सभी दैवपुत्रों के साथ विशेष आरती की जाएगी।

    यह देवी-देवता रहेंगे विराजमान

    प्रभु श्रीराम एवं माता जानकी के साथ भरत-माता मांडवी,  लक्ष्मण-उर्मिला, शत्रुघ्न-माता श्रुतकीर्ति, महाराज दशरथ- माता कौशल्या, माता कैकेयी, माता सुमित्रा, श्री इंद्र्रेशेश्वर महादेव, माता पार्वती, गणेश जी, नंदी, कार्तिकेय, केशरी-माता अंजनी, महर्षि वाल्मीकि, माता शबरी, पक्षीराज जटायु, संपाती, विभीषण, सुषेन वैद्य, माता त्रिजटा, राजा जनक, माता सुनयना, सुग्रीव, जामवंत, अंगद, नल, नील, सुमंत्र, निषाद राज, माता अहिल्या, दत्तात्रेय जी, गरुण, गिलहरी, मंदोदरी की मूर्ति रहेगी।

  • कब है इस साल खरना, जानें महापर्व छठ पर कब-क्या होगा

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    लखनऊ।पूर्वांचल के प्रसिद्ध सूर्य उपासना के महापर्व छठ को लेकर तैयारियां शुरू हो गईं हैं। मंगलवार को छठ घाट की सफाई के साथ ही छठ मइया के प्रतीक सुसुबिता को बनाने व रंगरोगन का काम शुरू हो गया। राजधानी के लक्ष्मण मेला घाट पर होने वाले मुख्य आयोजन को लेकर विशेष सतर्कता बरती जा रही है।

    अखिल भारतीय भोजपुरी समाज की ओर से पिछले 36 साल से होने वाले आयोजन में पहली बार सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होंगे। समाज के अध्यक्ष प्रभुनाथ राय ने बताया कि चार दिवसीय महापर्व की शुरुआत नहायखाय से 18 से होगी। 19 को छोटी छठ और मुख्य पर्व 20 और 21 नवंबर को होगा। कोरोना संक्रमण के चलते केवल पूजा होगी। एक व्रती के साथ सिर्फ एक व्यक्ति को ही सैनिटाइजेशन के बाद घाट पर जाने दिया जाएगा।

    सुरक्षा के साथ ही जिला प्रशासन आयोजन पर पैनी नजर रखेगा। किसी भी तरह का सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होगा। उन्होंने सभी से अपने घरों के पास पार्क में पूजन की अपील की है।

    यहां भी होगी पूजा

    मनकामेश्वर उपवन घाट पर 20 और 21 नवंबर को छठ पूजा होगी। महंत देव्या गिरि के सानिध्य में सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। ओम ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष धनंजय द्विवेदी के संयोजन में खदरा के शिव मंदिर घाट पर पूजन होगा। पक्कापुल स्थित छठ घाट, श्री खाटू श्याम मंदिर घाट, पंचमुखी हनुमान मंदिर घाट के अलावा महानगर पीएसी 35वीं बटालियन, मवैया रेलवे काॅलोनी, कृष्णानगर के मानसनगर स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर परिसर के साथ ही छोटी व बड़ी नहर के अलावा हर इलाके में घरों में पूजा होगी।

    बाजारों में दिखने लगी रौनक

    सूर्य उपासना के इस पर्व को लेकर बाजार में भी तैयारियां शूरू हो गई हैं। पूजन में मौसमी फल सरीफा केला, अमरुद, सेब, अनन्नास, सूथनी हल्दी, अदरक, सिंघाड़ा, सूप व गन्ने का प्रयोग होता है। बांस की टोकरी में व्रती के पति या बेटा बांस की टोकरी में 6, 12-, व 24 की संख्या में फल रखकर घाट तक जाते हैं। छठ गीतों के साथ परिवार के लोग भी व्रती के साथ जाते हैं। 36 घंटे के निर्जला व्रत का समापन 21 को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर होगा। कुछ स्थानों पर इसे डाला छठ भी कहते है। आलमबाग, निशातगंज, इंदिरानगर व राजाजपुरम सहित सभी बाजारों में दुकानदार तैयारियों में जुटे हैं।

    कब-क्या होगा

    18 को नहाय खाय: मानस नगर की कलावती ने बताया कि इस दिन व्रती महिलाएं पूजन में प्रयोग होने वाली सामग्री की खरीदारी के साथ सफाई करती हैं। रसोई पूरी तरह से साफ की जाती है। दिनभर व्रत रहती हैं और शाम को लौकी की सब्जी व रोटी का सेवन करती हैं।

    19 को रसियाव व छोटी छठ: पूर्वांचल की रंजना सिंह ने बताया कि इस दिन ठेकुआ बनाया जाता है। पूजन की पूरी तैयारी की जाती है। इसे छोटी छठ व खरना भी कहते हैं। कुछ महिलाएं इस दिन भी अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर उपासना करती हैं। शाम को व्रती साठी के चावल व गुड़ की बनी खीर रसियाव का सेवन करके 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू करती हैं।

    20 नवंबर को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य: उदय सिंह ने बताया कि इस दिन मुख्य पर्व होता है। व्रती नदी व तालाब तक जाकर पानी में खड़ी होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देती हैं। छठ गीतों से गुंजायमान वातावरण के बीच पूजन हाेता है। छठ मइया के प्रतीक सुसुबिता के पास बैठकर कलश स्थापित कर पूजन किया जाता है।

    21 नवंबर को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य: मानसनगर के अखिलेश सिंह ने बताया कि उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए भोर में ही व्रती उसी स्थान पर फिर जाती हैं और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देती हैं। छठ गीतों के साथ घाट से घर आती हैं। प्रसाद वितरण के बाद ही खुद व्रत तोड़ती हैं। इसी के साथ व्रत का समापन होता है।

    ऋगवेद में लिखा है सूर्य उपासना का महत्व

    आचार्य शक्तिधर त्रिपाठी ने बताया कि आरोग्य के देवता सूर्य की पूजा सूर्य षष्ठी को होती है। सूर्य देव की उपासना के इस पर्व के महत्व के बारे में ऋगवेद में भी बताया गया है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार चंद्र और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर से होती हुई सूर्य की किरणें विशेष प्रभाव धारण करके अमावस्या के छठें दिन पृथ्वी पर आती हैं । इसीलिए छठ को सूर्य की बहन भी कहा जाता है। प्रकृति,जल व वायु का पूजन करके उनसे समृद्धि की कामना की जाती है।

     

  • Gopashtami: कब है गोपाष्टमी, जानें क्या है गायों की पूजा किए जाने वाले इस पर्व का महत्व

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    Gopashtami: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह प्रव 22 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन गायों की पूजा की जाती है। यह त्यौहार गायों को ही समर्पित है। गोपाष्टमी के दिन लोग गायों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान दर्शाते हैं। गायों को जीवन देने वाला कहा गया है। इन्हें गौ माता भी कहा जाता है। इनकी पूजा ठीक उसी तरह की जाती है जिस तरह किसी देवी की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं गोपाष्टमी का महत्व और शुभ मुहूर्त।

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    Gopashtami कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह प्रव 22 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन गायों की पूजा की जाती है। यह त्यौहार गायों को ही समर्पित है।

    गोपाष्टमी 2020 शुभ मुहूर्त: 

    22 नवंबर 2020

    गोपाष्टमी तिथि प्रारंभ- 21 नवंबर, शनिवार, रात 21 बजकर 48 मिनट से

    गोपाष्टमी तिथि अंत- 22 नवंबर, रविवार रात 22 बजकर 51 मिनट तक

    गोपाष्टमी का महत्व:

    हिंदू धर्म की संस्कृति और आत्मा गायों को माना गया है। इनकी पूजा देवी-देवताओं की तरह ही की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मान्यता है कि एक गाय के अएंदर कई देवी-देवता निवरास करते हैं। ऐसे में हिंदू धर्म में गाय की पूजा करना बेहद जरूरी होता है। साथ ही इसका महत्व भी बहुत ज्यादा होता है। गाय को आध्यात्मिक और दिव्य गुणों का स्वामी भी कहा गया है। मान्यताओं के अनुसार, जो लोग गोपाष्टमी की पूर्व संध्या पर गाय की विधिवत पूजा करते हैं उन्हें खुशहाल जीवन का आशीर्वद प्राप्त होता है। साथ ही अच्छे भाग्य का आशीर्वाद भी मिलता है। यह गोपाष्टमी के दिन पूजा करने वाले व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती हैं।

    डिसक्लेमर

    ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी। ‘  

  • कब मनाई जाएगी देवउठनी एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

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    Dev Uthani Ekadashi 2020: हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत बेहद महत्वपूर्ण होता है। पूरे वर्ष में चौबीस एकादशी होती हैं। लेकिन अगर किसी वर्ष मलमास है तो इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इन्हीं में से एक एकादशी होती है देवउठनी। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी होती है। कहा जाता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देव-शयन हो जाते हैं और फिर चातुर्मास के समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन देवउठनी-उत्सव होता है। इस एकादशी को ही देवउठनी कहा जाता है। आइए जानते हैं इस वर्ष कब मनाई जाएगी देवउठनी एकादशी। साथ ही किस तरह करें देवउठनी एकादशी की पूजा।

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    Dev Uthani Ekadashi 2020 हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत बेहद महत्वपूर्ण होता है। पूरे वर्ष में चौबीस एकादशी होती हैं। लेकिन अगर किसी वर्ष मलमास है तो इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इन्हीं में से एक एकादशी होती है देवउठनी।

    देवउठनी एकादशी का शुभ मुहूर्त:

    देवउठनी एकादशी 25 नवंबर, बुधवार को पड़ रही है। एकादशी तिथि प्रारम्भ- नवंबर 25, 2020 को 02:42 बजे से

    एकादशी तिथि समाप्त- नवंबर 26, 2020 को 05:10 बजे तक

  • स्वास्तिक बनाएं घर की इन जगहों पर, मिलेंगे कई तरह के फायदे!

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    प्राचीन काल से स्वास्तिक हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है और इसे मंलग प्रतीक भी माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वास्तिक चिन्ह जरूर बनाया जाता है और इसका पूजन भी किया जाता है। इसके शाब्दिक अर्थ की बात करें तो यह सु+अस+क से बना है अर्थात् ‘सु’- अच्छा, ‘अस’- सत्ता या अस्तित्व और ‘क’- कर्त्ता या करने वाले है। ऐसे में स्वास्तिक का अर्थ अच्छा या मंगल माना जाता है। इस चिन्ह को गणेश जी का प्रतीक भी माना गया है। इसकी उत्पत्ति आर्यों द्वारा मानी जाती है। केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि इसका महत्व वास्तु में भी है। तो आइए जानते हैं घर में किन जगहों पर स्वास्तिक का निशान बनाना शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं कि स्वास्तिक को घर पर बनाने के क्या फायदे होते हैं।

    1. वास्तु शास्त्र में घर के मुख्य द्वार की दोनों दिवारों पर अगर स्वास्ति चिह्न बनाया जाए तो यह घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। घर के किसी भी तरह के वास्तु दोष के गलत प्रभावों से राहत प्राप्त होती है और सुख-समृद्धि आती है।

    2. वास्तु शास्त्र के अनुसार, अगर घर के आंगन के बीचों-बीच मांडने के रूप में स्वास्तिक बनाया जाए तो यह बेहद ही शुभ माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान अगर घर के आंगन में गोबर द्वारा स्वास्तिक बनाया जाए तो इससे पितरों की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही घर में सुख-समृद्धि आती है।

    3. घर में जहां आप पूजा करते हैं उस मंदिर में स्वास्तिक का चिन्ह बनाने से भी कई लाभ मिलते हैं। इस चिन्ह के ऊपर देवताओं की मूर्ति स्थापित करने से भगवान की कृपा व्यक्ति पर बरसती है।

  • पूजा के दौरान जरूर पढ़ें शिव जी,विष्णु जी की यह कथा…

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    कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को वैकुंठ चतुर्दशी मनाई जाती है। इस वर्ष यह चतुर्दशी 29 नवंबर को है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। विष्णु जी वैकुंठ के अधिपति हैं। ऐसे में अगर इस दिन सच्चे मन से विष्णु जी की पूजा की जाए तो व्यक्ति को वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। इस दिन केवल विष्णु जी की ही नहीं बल्कि शिव जी की भी पूजा होती है। यह दिन भगवान शिव और विष्णु जी के मिलन को भी दर्शाता है। यही कारण है कि इस चतुर्दशी को हरिहर का मिलन भी कहा जाता है। वैकुंठ चतुर्दशी के दिन पूजा करते समय कथा जरूर पढ़नी चाहिए। आइए पढ़ते हैं वैकुंठ चतुर्दशी की कथा।

    कथा के अनुसार, विष्णु जी, महादेव के दर्शन के लिए काशी नगरी आए थे। यहां पर विष्णु जी ने मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया और उसके बाद एक हजार स्वर्ण कमलों से शिव जी का पूजन करने का संकल्प किया। शिव जी ने यह देख सोचा कि क्यों न विष्णु जी की परीक्षा ली जाए। उन्होंने उन स्वर्ण कमलों में से एक कमल कम कर दिया। ऐसे में संकल्प को पूरा करने और कमल की पूर्ति करने के लिए विष्णु जी ने अपने नयन कमल भोलेनाथ को अर्पित करने का विचार किया।

    विष्णु जी अपने नयन कमल अर्पित करने के लिए तैयार हुए तो शिव जी उनके समक्ष प्रकट हो गए। शिव जी ने विष्णु जी से कहा कि मेरे पास ऐसा कोई भक्त नहीं है जो ऐसा हो। फिर शिव जी ने कहा कि आज से कार्तिक मास की चतुर्दशी वैकुंठ चतुर्दशी के नाम से जाना जाएगा। साथ ही शिव जी ने विष्णु जी की भक्ति देख उन्हें सुदर्शन चक्र भी प्रदान किया।

     

  • काल भैरव जयंती कब है, जानें कैसे हुआ था इनका अवतरण

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    हर वर्ष मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि इस तिथि पर भगवान काल भैरव का जन्म हुआ था। इस वर्ष यह तिथि 7 दिसंबर, सोमवार के पड़ रही है। काल भैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा की जाती है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि काशी में रहने वाले हर व्यक्ति को यहां पर रहने के लिए बाबा काल भैरव की आज्ञा लेनी पड़ती है। मान्यता है कि भगवान शिव ने ही इनकी नियुक्ति यहां की थी। आइए जानते हैं भैरव जी के अवतरण की कथा-

    जानें कैसे हुआ काल भैरव जी का अवतरण:

    शिवपुराण के अनुसार, एक बार सबसे ज्यादा कौन श्रेष्ठ है इसे लेकर ब्रह्मा जी, विष्णु जी और भगवान शिव के बीच विवाद पैदा हो गया। इसी बीच ब्रह्माजी ने भोलेनाथ की निंदा की। इसके चलते शिव जी बेहद क्रोधित हो गए। शिव शंकर के रौद्र रूप से ही काल भैरव का जन्म हुआ था। काल भैरव ने अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए अपने नाखून से ब्रह्माजी के पांचवे सिर को काट दिया। क्योंकि इस सिर ने शिव जी की निंदा की थी। इसके चलते ही काल भैरव पर ब्रह्म हत्या का पाप लग गया था।

    ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए गए थे काशी:

    ब्रह्माजी का कटा हुआ शीष काल भैरव के हाथ में चिपक गया था। ऐसे में काल भैरव को ब्रह्म हत्या से मुक्ति दिलाने के लिए शिव शंकर ने उन्हें प्रायश्चित करने के लिए कहा। शिव जी ने बताया कि वो त्रिलोक में भ्रमण करें और जब ब्रह्रमा जी का कटा हुआ सिर हाथ से गिर जाएगा उसी समय से उनके ऊपर से ब्रह्म हत्या का पाप हट जाएगा। फिर जब वो काशी पहुंचे तब उनके हाथ से ब्रह्मा जी का सिर छूट गया। इसके बाद काल भैरव काशी में ही स्थापित हो गए और शहर के कोतवाल कहलाए।

    ऐसा कहा जाता है कि काशी के राजा भगवान विश्वनाथ हैं। वहीं, नगरी के कोतवाल काल भैरव हैं। बिना काल भैरव के दर्शन के बाबा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा माना जाता है।

    नोट:-

    ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं

     

  • काल भैरव अष्टमी पूजन से दूर होंगी व्याधियां , स्वान को खिलाएं पुआ दूर होंगे सभी दुख

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    लखनऊ। काल भैरव की पूजा करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन सात दिसंबर सोमवार को काल भैरव जयंती या कालभैरव अष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन शिव के पांचवे रुद्र अवतार माने जाने वाले कालभैरव की पूजा-अर्चना साधक विधि-विधान से करते हैं। सात दिसंबर को शाम 6:47 से 8 दिसंबर को शाम 5:17 बजे तक इसका मान रहेगा।

    आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि काल भैरव भगवान शिव का रौद्र, विकराल एवं प्रचंड स्वरूप है। तंत्र साधना के देवता काल भैरव की पूजा रात में की जाती है। इसलिए अष्टमी में प्रदोष व्यापनी तिथि का विशेष महत्व होता है। यह दिन तंत्र साधना के लिए उपयुक्त माना गया है। काल भैरव को दंड देने वाला देवता भी कहा जाता है इसलिए उनका हथियार दंड है। इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करने से भी उनकी विशेष कृषा प्राप्त होती है। उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए साधकों को भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति चौकी पर गंगाजल छिड़ककर स्थापित करना चाहिए। इसके बाद काल भैरव को काले, तिल, उड़द और सरसोंं का तेल अर्पित करना उत्तम होता है। भैरव जी का वाहन श्वान (कुत्ता ) है। भैरव के वाहन कुत्ते को पुआ खिलाना चाहिए। भैरव जी को काशी का कोतवाल भी माना जाता है। भैरव की पूजा से शनि, राहु व केतु ग्रह भी शान्त हो जाते है। बुरे प्रभाव और शत्रु भय का नाश होता है।

    ऐसे करें पूजन

    आचार्य शक्तिधर त्रिपाठी ने बताया कि दान करने से इस दिन आपके घर में आने वाली व्याधियों दूर होती हैं। काल भैरव सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए आपकी मदद करते हैं। यह भी कहा जाता है कि इस दिन पूजा करने से देवताओं की व्याधियों भी काल भैरव दूर करते हैं। आमजन के अंदर के मानसिक तनाव को दूर कर सात्विक विचार धारा का सूत्रपात होता है। हालांकि काल भैरव की मूर्ति घर में स्थापित करना तर्कसंगत नहीं लगता, लेकिन शास्त्रों में पूजन का विधान दिया गया है, आप मंदिर में भी पूजन कर सकते हैं।

    पूजन के दौरान स्थापित कलश में गंगाजल डालकर पूजन की समाप्ति पर उसका पूरे घर में छिड़काव करना चाहिए। शेष जल को सूर्य देव को अर्पित कर प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भैरवनाथ हमारे घर समाज और देश पर आने वाली व्याधियों दूर हो जाएं। वफादारी के प्रतीक स्वान को पुआ खिलाने से उसके अंदर भी आपके प्रति वफादारी बढ़ती है। आपके अंदर भी एक एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

     

  • माता लक्ष्मी के इन मंत्रों का आज शुक्रवार को करें जाप, मिलेगा धन, वैभव और समृद्धि

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    आज शुक्रवार का दिन धन, वैभव, समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी की पूजा करने के लिए समर्पित होता है। आज के दिन माता लक्ष्मी की विधि विधान से पूजा करनी चाहिए। इससे माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। आज शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करने से भी सुख और समृद्धि में बढ़ोत्तरी होती है। माता लक्ष्मी की पूजा करने के साथ प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की भी आराधना करें, वे आपके कार्यों को बिना बाधा पूरा करने में मदद करेंगे तथा शुभता प्रदान करते हैं। आज आपको माता लक्ष्मी के इन मंत्रों का जाप करना चाहिए।

    माता लक्ष्मी के मंत्र

    1. ॐ श्रींह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मी नम:।। यह माता लक्ष्मी का बीज मंत्र है। इसका जाप करने से सौभाग्य में वृद्धि होती है।

    2. ॐ श्रीं ल्कीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा।। यह माता लक्ष्मी का महा मंत्र है। इसका जाप करने से स्थिर धन, दौलत और वैभव प्राप्त होता है।

    3. ॐ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये, धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:। माता लक्ष्मी के इस मंत्र ​का जाप करने से आर्थिक समस्याएं दूर हो जाती हैं।

    4. जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नम: मंत्र का जाप करना चाहिए।

    5. पद्मानने पद्म पद्माक्ष्मी पद्म संभवे तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्। इस मंत्र का जाप करने से घर में धन और धान्य की कमी नहीं रहती है।

    6. ऊं ह्रीं त्रिं हुं फट। माता लक्ष्मी के इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को किसी कार्य में सफलता प्राप्त होती है और माता लक्ष्मी की कृपा उस पर बनी रहती है।

    7. लक्ष्मी नारायण नम:। माता लक्ष्मी के इस मंत्र में भगवान विष्णु का भी नाम है। इस मंत्र के जाप से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। पति और पत्नी के बीच संबंधों को मजबूत बनाने के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है। इससे सुख और समृद्धि भी प्राप्त होती है।